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________________ षट्त्रिंशः सर्गः मालिनीच्छन्दः अथ विरुवदलिज्यारूढबाणासनायां कलरवकलहंसीशङ्कशय्याश्रितायाम् । रिपुशिखिमदपक्षक्षोदपक्षोदयायां शरदि हरिनवश्रीलीलयाध्यासितायाम् ॥१॥ धननिवहविधातायौरमाञ्चन्द्रहासा विघटितघनपङ्का मेदिनी काशहासा । कतिपयदिनभाविप्रौढकंसाभिवातप्रकटितहरिहासाकारविद्योततीव ( वद्योतने सा) ॥२॥ विपुलपुलिनफेनव्याजतः स्वच्छनद्यः सहजजलसरस्यः पुण्डरीकापदेशात् । सितकुसुमनिभेन स्वैर्वनान्तैश्च शैला हरियश इव शुभ्रं दाग्दधाना विरेजः ॥३॥ फलकु चगुरुभाराकान्तिराक्रान्त सस्यप्रचुररुचिरकासत् कन्जुकोद्रासमाना। प्रमदवशविकासिन्युर्वरा सर्वतोऽभादभिनवहरिकण्ठाश्लेषणोत्कण्ठितेव ॥४॥ प्रसवभरविभूति व्यग्रताव्यग्रगर्मग्रहणसमयहृष्यद्गोवृषोद्घोषघोषाः । शरदि हृदयतोषं पोषयन्तिस्म विष्णोः प्रसभमिह रिपूर्णा पेषर्ण घोषयन्तः ॥५॥ विदितहरिसमीहश्चापि कंसस्तदानीं पुनरपि तदपायोपायधीगोपवर्गम् । कमलहरणहेतोर्दुर्गमभ्यङ्गभौजां हृदमपि विषमाहि प्राहिणोधामुनं सः ॥६॥ अथानन्तर गूंजते हुए भ्रमररूपी प्रत्यंचासे युक्त बाणासन जातिके वृक्षरूपी धनुषसे सुशोभित, कबूतररूपी शंख और कलहंसरूपी शय्यासे सहित तथा शत्रुरूपी मयूरोंके मद और पंखोंको नष्ट करनेवाली शरद् ऋतु आयो सो ऐसी जान पड़ती थी मानो कृष्णकी नवीन लक्ष्मीकी लोलासे ही सहित हो। भावार्थ-जिस प्रकार कृष्णने उज्ज्वल नागशय्यापर आरूढ़ हो शंख बजाया था और धनुष धारण किया था उसी प्रकार वह शरद् ऋतु भी कलहंसरूपी नागशय्यापर आरूढ़ हो कबूतररूपी शंखको बजा रही थी तथा बाणासन वृक्षरूपी धनुषको धारण कर थी ॥१॥ उस समय आकाशमें मेघोंका समह नष्ट हो गया था तथा चन्द्रमाका प्रकाश फैलने लगा था इसलिए वह अत्यधिक सुशोभित हो रहा था। इसी प्रकार 'पृथिवीकी विपुल कीचड़ नष्ट हो गयी थी तथा उसपर काशके फूल-फूल उठे थे इसलिए वह ऐसी जान पड़ती थी मानो कुछ दिन बाद जो अतिशय बलवान् कसका घात होनेवाला है उससे प्रकट होनेवाले कृष्णके अट्टहासको ही पहलेसे धारण करने लगी हो ॥२॥ उस समय स्वच्छ नदियोंमें विशाल पुलिनोंको टक्करसे फेन निकल रहा था, स्वाभाविक जलसे भरे सरोवरोंमें सफेद-सफेद कमल फूल रहे थे और पर्वतोंके अपने वनोंमें सफेद-सफेद फूल खिल उठे थे उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उन सबके बहाने श्रीकृष्णके शुक्ल यशको ही शोघ्र धारण कर रहे हों ॥३॥ फलरूपी स्तनोंके भारी भारसे आक्रान्त, सर्वत्र व्याप्त धानकी सातिशय कान्तिरूपी चोलीसे सुशोभित और हर्षातिरेकसे सब ओर विकसित-नये-नये अंकुरों को धारण करनेवाली उपजाऊ भूमिरूपी रमणी उस समय नये राजा श्रीकृष्णके कण्ठालिंगनके लिए उत्सुकके समान जान पड़ती थी ॥४॥ उस शरद् ऋतुमें सन्ततिके भाररूप विभूतिसे प्राप्त होनेवाली व्यग्रतासे व्यग्र एवं गर्भधारणके योग्य समय पाकर हर्षित होने वाली गायों और बैलोंके जोरदार शब्द श्रीकृष्णके हृदय सम्बन्धी सन्तोषको मानो इसलिए ही बरबस पुष्ट कर रहे थे कि वे उनके शत्रुओंके नष्ट होने की घोषणा कर रहे थे ।।५।। यद्यपि कंस, श्रीकृष्णकी चेष्टाको जान चुका था तथापि उनके नष्ट करनेके उपायोंमें बुद्धि लगानेवाले उस दुष्टने फिर भी उस समय कमल लानेके लिए समस्त गोपोंके समूहको यमुनाके १. भासा ग, घ, ङ.। २. केन म.। ३. शोभमान । ४. तोष-म.। ५. तदपायेपापधी-म.. ६. मत्यङ्ग-म.। ७. विषमा अहयो यस्मिन् । ८. प्रेषयामास । ९. यमुनाया इर्द यामुनम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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