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________________ चतुस्त्रिंशः सर्गः पूर्वे पञ्चदशान्तास्तु शिखरे षोडशाधिकाः । उस्कृष्ट तत्र ते वेद्याः षण्णवस्या चतुःशती ॥८॥ उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडित विधि-उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडित व्रतमें एकसे लेकर पन्द्रह तकके अंकोंका प्रस्तार बनाना चाहिए और उसके शिखरमें सोलहका अंक लिखना चाहिए। उसके बाद उलटे क्रमसे एक तकके अंक लिखना चाहिए। यहाँपर भी जघन्य और मध्यम सिंहनिष्क्रीडितके समान दो-दो अंकोंकी अपेक्षा एक-एक उपवासका अंक घटाना-बढ़ाना चाहिए। इस रीतिसे लिखे हुए समस्त अंकोंका जितना जोड़ हो उतने उपवास और जितने स्थान हों उतनी पारणाएं जाननी चाहिए। इस तरह इस व्रतमें चार सौ छियानबे उपवास और इकसठ पारणाएं होती हैं। यह व्रत पाँच सौ सत्तावन दिनमें पूर्ण होता है। इसका प्रस्तार इस प्रकार है---||८|| १ २ १ ३ २ ४ ३ ५ ४ ६ ५ ७ ६ ८ ७ ९ ८१० ९ ११ १० १२ ११ १३ १२ १४ १३ १५ १४ १५ १६ १५ १४ १५ १३ १४ १२ १३ ११ १२ १० ११ ९ १० ८ ९ ७ ८ ६ ७ ५ ६ ४ ५ ३ ३ २ ३ १ २ १ विशेष-७८, ७९, ८०वें श्लोकोंका एक सीधा-साधा अथं इस प्रकार भी हो सकता है विद्वज्जन इसपर विचार करें जघन्य सिंहनिष्क्रीडित विधिमें एकसे लेकर पांच तकके अंक दो-दोकी संख्यामें लिखें और उसके बाद उलटे क्रमसे पांचसे एक तक के अंक दो-दोको संख्यामें लिखें। दोनों ओरके सब अंकोंका जोड़ कर देनेपर साठ उपवास और बीस पारणाएं होती हैं ॥७८॥ मध्यम सिंहनिष्क्रीडितमें एकसे लेकर आठ तकके अंक दो-दोकी संख्यामें लिखें और उनके ऊपर शिखरस्थानपर नौका अंक लिखे फिर उलटे क्रमसे एक तकके अंक दो-दोकी संख्या में लिखे। सब अंकोंका जोड़ करनेपर एक सौ त्रेपन उपवास और तैंतीस पारणाएं आती हैं ॥७९।। उत्कृष्ट सिंहनिष्क्रीडितमें एकसे लेकर पन्द्रह तकके अंक दो-दोकी संख्यामें लिखे और उसके ऊपर शिखरस्थानपर सोलहका अंक लिखे फिर उलटे क्रमसे एक तकके अंक दो-दोकी संख्या में लिखे सब अंकोंका जोड़ करनेपर चार सौ छियानबे उपवास और इकसठ पारणाएं होती हैं। इनके प्रस्तार इस कमसे जानना चाहिए जघन्य सिंहनिष्क्रीडित ११२२३३४४५५ ५५४४३३२२११ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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