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________________ चतुस्त्रिशः सर्गः ४२१ जीयेत येन कन्येयं गतियुद्धेऽतिवेगिना । परिणेया तेन वीरेण मन्मनोरथपूरिणा ॥२५॥ श्रत्वेति खेचरास्तस्थुर्जात्वा विद्याधिकाममूम् । विद्यावेगोद्यता बोद्धमुत्तस्थुर्धारिणीसुताः ॥२६॥ ततः परिकरं बद्ध्वा चेतसा च समं तदा । करमास्फाल्य लोकेन मुक्ता माध्यस्थ्यमीयुषा ॥२७॥ अहंयवो दधावुस्ते सार्द्धम पथं पथा । मरुतां मेरुमुद्दिश्य हरन्तो मरुतां स्यम् ॥२८॥ अतिक्रम्य तथा कन्या परीत्य सुरपर्वतम् । भद्रशालवनेऽभ्यर्च्य जिनार्चाः प्राइन्यवर्तत ॥२१॥ वेगश्रमागतस्वेदलवमुक्ताफलाचिंता । प्राप्य नत्वा ददो पित्रे सिद्धशेषां प्रमोदिने ॥३०॥ ततोलमधजया पित्रा मुक्ता मुक्तहिकस्पृहा । 'निर्वृत्त्यन्ते प्रववाज व्रतवातविभूषिता ॥३॥ गतियुद्धे जितास्तेऽपि चिन्तागत्यादयस्तया । दीक्षा दमवरस्यान्ते प्रयोऽपि भ्रातरो दधुः ॥३२॥ अन्ते माहेन्द्रकल्पान्ते प्राप्तसप्ताब्धिजीविनः । सामानिकास्त्रयोऽप्यत्र दिव्यं बुभुजिरे सुखम् ॥३३॥ प्रच्यत्य पुष्कलावत्यामुदकश्रेण्यां ततो नृप । मध्यमावरजी जातौ पुरे गगनवल्लभे ॥३०॥ सुतौ गगनसुन्दयाँ गगनेन्दोः क्रमेण तौ। प्रथमोऽमितवेयाख्योऽमिततेजास्ततोऽनुजः ॥३५॥ दीक्षित्वा पुण्डरीकिण्यां स्वयंप्रमजिनान्तिके। श्रुत्वा पूर्वभवांस्तस्मात्तावावामिह पार्थिव ॥३६॥ पूर्व प्रच्युत्य माहेन्द्रास्प्रजातमपराजितम् । ज्यायांसं द्रष्टुमायातौ त्वां चिन्तागतिपूर्वकम् ॥३७॥ जिनेन्द्र देवकी पूजा कर सबसे पहले वापस आ जावेगा उसी एककी जीत समझो जावेगी ॥२४|| इस प्रकार अत्यन्त वेगसे गमन करनेवाले जिस वीरके द्वारा गतियुद्ध में यह कन्या जोती जावेगी मेरे मनोरथको पूर्ण करनेवाले उसी वीरके द्वारा यह कन्या विवाहने योग्य है ।। २५ ॥ यह सुनकर अन्य विद्याधर उसे अधिक विद्यावती जान चुप-चाप बैठे रहे परन्तु विद्याके वेगसे उद्यत धारिणीके पुत्र चिन्तागति, मनोमति और चपलगति गतियुद्ध करनेके लिए उठकर खड़े हो गये ।। २६ ।। तदनन्तर मनके साथ-साथ परिकर बाँधकर जब सव तैयार हो गये तब मध्यस्थता को प्राप्त हुए लोगोंने हाथ हिलाकर उन्हें छोड़ा ।। २७ ।। अहंकारसे वे चारों व्यक्ति अपने वेगसे वायुके वेगको रोकते हुए, मेरुको लक्ष्य कर आकाशमें दौड़े और आधे मार्ग तक तो साथ-साथ दौड़ते रहे परन्तु उसके बाद कन्याने उन्हें पीछे छोड़ दिया और वह मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा देकर तथा भद्रशालवनमें विद्यमान जिन-प्रतिमाओंकी पूजा कर पहले वापस लौट आयी ।।२८-२९ ।। वेगके श्रमसे उत्पन्न पसोनाके कणोंसे जो मोतियोंके समान सुशोभित हो रही थी ऐसी कन्याने आकर पिताके लिए नमस्कार किया एवं पूजाके शेषाक्षत भेंट किये। पुत्रोको विजयसे पिताको अधिक हर्ष हुआ ॥ ३० ॥ तदनन्तर गतियुद्धमें जिसे विजय प्राप्त हुई थी और इस लोक सम्बन्धी भोगोंकी इच्छा जिसकी छूट चुकी थी ऐसी कन्या प्रीतिमतीके लिए पिताने तप धारण करने की अनुमति दे दी जिससे उसने व्रतोंके समूहसे सुशोभित हो निर्वृत्ति नामक आर्यिकाके समीप दीक्षा धारण कर ली ॥३१॥ गतियुद्ध में प्रीतिमतीके द्वारा पराजित चिन्तागति आदि तीनों भाइयोंने भी दमवर मुनि राजके समीप दीक्षा धारण कर ली ॥३२॥ आयुके अन्तमें तीनों भाई माहेन्द्र स्वर्गके अन्तिम पटलमें सात सागरको आयु प्राप्त कर सामानिक जातिके देव हुए और वहाँके दिव्य सुखका उपभोग करने लगे ॥३३।। तदनन्तर हे राजन् ! पुष्कलावती देशके विजयार्ध की उत्तर श्रेणी में जो गगनवल्लभ नामका नगर है उसमें राजा गगनचन्द्र रहते हैं और स्वीका नाम गगनसुन्दरी है। मध्यम तथा छोटे भाईके जीव माहेन्द्र स्वगंसे च्युत होकर उनके क्रमसे हम अमितवेग और अमिततेज नामक पुत्र हुए हैं ॥३४-३५।। पुण्डरीकिणी नगरीमें स्वयंप्रभ जिनेन्द्र के समीप दीक्षा लेकर उनसे हमने अपने पूर्व भव सुने । हे राजन् ! हमें स्वयंप्रभ जिनेन्द्र ने बताया कि तुम्हारे बड़े भाई चिन्तागतिका जीव माहेन्द्र स्वर्गसे पूर्व ही च्युत होकर १. मरुतां पथा = आकाशेन । २. निर्वृत्तिनामिकार्यिकासमीपे। ३. नृपः म. ग. । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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