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________________ त्रिंशः सर्गः ३८७ तेन मानसवेगेन बन्धुभावमुपेयुषा । सपत्नीको विमानेन प्रापितः स महापुरम् ॥३९॥ सोमश्रीबन्धुमिस्तत्र जाते तस्य समागमे । गतो मानसवेगोऽपि स्वस्थानं तद्वचःस्थितः॥४०॥ श्रुतानुभूतवार्तादिप्रश्नप्रकथनात्मनोः । याति कामरसक्षिप्तचेतसोः समयस्तयोः ॥४॥ अश्वरूपधरेणासावेकदा सूर्पकारिणा । हरता नभसः क्षिप्तो गङ्गायामतपद् यदुः॥४२॥ स तामुत्तीर्य संप्राप्तस्तापसाश्रममत्र च । निरीक्ष्योन्मादिनी नारी नरास्थिमयशेखराम् ॥४३॥ पप्रच्छ तापसं कंचित् कस्येयं युवतिर्वरा । परिभ्रमति विभ्रान्ता महोन्मादवशा वशा ॥४४॥ तस्मै सोऽकथयद् राज्ञो जरासन्धस्य देहजा । नाम्ना केतुमतीयं च जितशत्रनृपप्रिया ॥४५॥ मन्त्रवादिपरिवाजा वराकी स्ववशीकृता। हतस्यास्यास्थिमालां च मालीकृत्याटति क्षितिम् ॥४६॥ इत्याकर्ण्य कृपायुक्तो महामन्त्रप्रभावतः । आवेशपूर्वकं तस्याः स चक्र ग्रहनिग्रहम् ॥४७॥ शौरिस्तदा नियुक्तस्तु जरासन्धस्य मानवैः । पुरं राजगृहं नीतः परिवार्योपकार्यपि ॥४८॥ तानवोचदसौ राज्ञः कोऽपराधो मया कृतः । ब्रत मे येन नीयेऽहं तद्राजपुरुषाः रुषा ॥४९॥ इत्युक्ता इत्यवोचस्ते यो राजदुहितुग्रहम् । व्युदस्यति मवेत्सोऽत्र राजारिजनकः किल ॥५०॥ इत्यावेद्य वधस्थानं नीतो नीचैन रैर्वृतः। खमुक्षिप्यापनीतः प्राक् केनचित्खचरेण सः ॥५१॥ उक्तश्च वीर! विद्धि त्वं प्रमावस्याः पितामहम् । मां मगोरथनामानं स्वन्मनोरथपूरकम् ॥५२॥ मानसवेगकी माताने कुमारसे पुत्र भिक्षा मांगो जिससे दयायुक्त हो कुमारने उसे सोमश्रीके पास ले जाकर छोड़ दिया ॥३८|| इस घटनासे मानसवेग कुमारका गहरा बन्धु हो गया और विमान द्वारा सोमश्री सहित वसुदेवको उनके अभीष्ट स्थान महापुर नगर तक पहुँचाने गया ॥३९॥ वहाँ पहुंचनेपर वसुदेवका सोमश्रीके बन्धुओंके साथ समागम हो गया और मानसवेग भी उनका आज्ञाकारी हो अपने स्थानपर वापस चला गया ॥४०॥ तदनन्तर सनी एवं अनुभवी बातोंके प्रश्नोत्तर करना ही जिनका काम शेष था और जिनके चित्त कामरसके आधीन थे ऐसे उन दोनों दम्पतियोंका समय सुखसे व्यतीत होने लगा ॥४१।। ___ अथानन्तर एक समय कुमारका शत्रु राजा त्रिशिखरका पुत्र सूर्पक अश्वका रूप रखकर कुमारको हर ले गया और आकाशसे उसने नोचे गिरा दिया जिससे वे गंगा नदीमें जा गिरे।॥४२॥ गंगा नदीको पारकर कुमार वसुदेव तापसोंके एक आश्रममें पहुंचे। वहां उन्होंने मनुष्योंको हड्डियोंका सेहरा धारण करनेवाली एक पागल स्त्रोको देखकर किसी तापससे पूछा कि यह सुन्दरी युवती किसकी स्त्री है जो मदोन्मादके वश हो पागल हस्तिनीके समान इधर-उधर घूम रही है ।।४३-४४॥ तापसने कहा कि यह राजा जरासन्धकी पुत्री केतुमती है और राजा जितशत्रुको विवाही गयी है ।।४५|| इस बेचारीको एक मन्त्रवादी परिव्राजकने अपने वश कर लिया था वह मर गया इसलिए उसकी हड्डियों के समूहकी माला बनाकर यह पृथिवीपर घूमती रहती है ।।४६।। यह सुनकर वसुदेवको दया उमड़ पड़ी और उन्होंने महामन्त्रोंके प्रभावसे शीघ्र ही केतुमतीके पिशाचका निग्रह कर दिया ।।४७।। वहाँ वसुदेवकी खोजमें जरासन्धके आदमी पहलेसे ही नियुक्त थे इसलिए यद्यपि कुमार उपकारी थे तथापि वे उन्हें घेरकर राजगृह नगर ले गये ॥४८॥ उनको ले जानेवाले लोगोंसे वसुदेवने पूछा कि हे राजपुरुषो ! बताओ तो सही मैंने राजाका कौन-सा अपराध किया है जिससे मैं इस तरह क्रोधपूर्वक ले जाया जा रहा हूँ ॥४२।। इस प्रकार कहनेपर राजपुरुष बोले कि जो राजपुत्रीके पिशाचको दूर करेगा वह राजाको घात करनेवाले शत्रुका पिता होगा ॥५०॥ इस प्रकार कहकर नीच मनुष्योंसे घिरे वसुदेव वधस्थान पर ले जाये गये परन्तु वध होनेके पहले हो कोई विद्याधर उन्हें झपटकर आकाशमें ले गया ॥५१॥ उस विद्याधरने १. कामरसाक्षिप्तचेतसोः म. । २. क्षिप्रो म. । ३. नीयेयं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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