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________________ ३८६ हरिवंशपुराणे साधुसाधितकार्या सा तामाश्लिष्य प्रमावतीम् । सखीं प्रागसमां श्रव्यैर्वचनैरभ्यनन्दयत् ॥२६॥ रूपं नाम च तस्यासौ निजं कृत्वा प्रभावती। आपृच्छय दम्पती मुक्त्वा ययावात्मीयमास्पदम् ॥२७॥ धाम्नि मानसवेगस्य परावर्तितरूपभृत् । सोमश्रिया सहाहानि न्यवसत्कतिचिद् यदुः ॥२८॥ एकदा प्राग विबुद्धासौ प्रकृतिस्थाकृतिं पतिम् । दृष्ट्वारुदविषद्मीत्या प्रमादपरिशङ्किनी ॥२९॥ अपृच्छच्च विबुद्धोऽसौ किमर्थ रोदिषि प्रिये । आह 'रूपपरावृत्तिमपश्यन्ती तवेत्यसौ ॥३०॥ मा भैषीरेष विद्यानां स्वभावः स्वपतां वपुः । अपसृत्यावतिष्ठन्ते संश्रयन्ते सुजाग्रताम् ॥३१॥ इत्युक्त्वा सुपरावृत्यरूपं पूर्ववदेव सः । वसुदेवोऽवसत्तत्र यथेष्टं प्रियया युतः ॥३२॥ ततो मानसवेगेन कथंचिदुपलक्षिनः । वैजयन्तीपति पत्न्या बलसिंहमसौ श्रितः ॥३३॥ तस्य न्यायपरस्याग्रे व्यवहारे पराजितः। मायो मानसवेगोऽसौ विलक्षो योदधुमुत्थितः ॥३४॥ शौरिपक्षतया केचित् खचराः समवस्थिताः । ततोऽभू दुग्रसंग्रामः शौरिमानसवेगयोः ॥३५॥ वेगान वेगवतीमात्रा जामात्रे धनुरर्पितम् । दिव्यं दिव्यशरापूर्ण शरधिद्वयसंयुतम् ॥३६॥ प्रज्ञप्तिश्च प्रभावत्या विज्ञाय लधु योजिता । तत्प्रभावादसौ संख्ये बबन्ध रिपुखेचरम् ॥३७॥ तन्मात्रा याचितः शौरिः पुत्रभिक्षां दयापरः । सोमश्रीदर्शनं नीत्वा मुमोच खचराधिपम् ॥३८॥ रहे थे ऐसे दोनोंने परस्पर गाढ़ आलिंगन किया, उस समय आलिंगनको प्राप्त हुए दोनों ऐसे जान पड़ते थे मानो पुनः विरह न हो जाये इस भयसे एकरूपताको ही प्राप्त हो गये थे ॥२५।। अच्छी तरह कार्य सिद्ध करनेवाली प्राणतुल्य प्रभावती सखीका आलिंगन कर सोमश्रीने मनोहर वचनों द्वारा उसका अभिनन्दन किया-मीठे-मीठे वचन कहकर उसे प्रसन्न किया ॥२६॥ वसुदेवके आनेका रहस्य प्रकट न हो जाये इस विचारसे प्रभावती वसुदेवको अपना रूप तथा अपना नाम देकर दोनों दम्पतीसे पूछकर एवं उनसे विदा लेकर अपने स्थानपर चली गयो। भावार्थ-प्रभावतीने अपनी विद्याके प्रभावसे वसुदेवको प्रभावती बना दिया ॥२७॥ इस प्रकार परिवर्तित रूपको धारण करनेवाले कुमार वसुदेवने मानसवेगके घर सोमश्रीके साथ कितने ही दिन निवास किया ॥२८॥ एक दिन सोमश्री पहले जाग गयी और पति-वसुदेवको अपने स्वाभाविक वेषमें देख शत्रुके भयसे किसी विपत्तिकी आशंका करती हुई रोने लगी ॥२९।। इतने में कुमार भी जाग गये और उसे रोती देख पूछने लगे कि हे प्रिये ! किस लिए रोती हो ? सोमश्रीने उत्तर दिया कि आपका रूप परिवर्तित नहीं देख रही हूँ यही मेरे रोनेका कारण है ॥३०॥ कुमारने कहा कि डरो मत, विद्याओंका यह स्वभाव है कि वे सोते हुए मनुष्योंके शरीरको छोड़कर पृथक् हो जाती हैं और जागनेपर पुनः आ जाती हैं ॥३१॥ इस प्रकार कहकर तथा पहलेके ही समान रूप बदलकर कुमार वसुदेव प्रिया सोमश्रीके साथ वहाँ रहने लगे ॥३२॥ तदनन्तर एक दिन मानसवेगने किसी तरह कुमार वसुदेवको देख लिया जिससे 'कमार • वसुदेव हमारी स्त्री सोमश्रीके साथ रूप बदलकर रहता है' यह शिकायत लेकर वह पत्नीके साथ वैजयन्ती नगरीके राजा बलसिंहके पास गया ॥३३॥ राजा बलसिंह न्यायपरायण पुरुष था इसलिए जब उसने इस शिकायतकी छानबीन की तो मानसवेग हार गया। हार जानेसे मानसवेग बहुत ही लज्जित हुआ और वसुदेवके साथ युद्ध करनेके लिए उठ खड़ा हुआ ॥३४॥ यह देख कितने ही विद्याधर वसुदेवका पक्ष लेकर खड़े हो गये। तदनन्तर वसुदेव और मानसवेगका युद्ध हुआ ॥३५॥ वेगवतीकी माताने जमाई वसुदेवके लिए एक दिव्य धनुष तथा दिव्य बाणोंसे भरे हुए दो तरकस दे दिये और प्रभावतीने युद्धका समाचार जानकर शीघ्र ही प्रज्ञप्ति नामकी विद्या दे दी। उसके प्रभावसे कुमारने मानसवेगको युद्धमें शीघ्र ही बांध लिया ॥३६-३७॥ तदनन्तर १. सुपरावृत्ति रूपं म., ग. । २. -दुपलक्षितम् ग. । ३. पत्या ग, । ४. वेदात् म. । ५. युद्धे । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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