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________________ सप्तविंशः सर्गः श्रीधरापूर्वको देवः पृथिवीतिलके पुरे । प्रियंकरातिवेगाभ्यां रत्नमालाभवत्सुता ॥११॥ वज्रायुधाय सा दत्ता तस्यां रत्नायुधः सुतः । जातो यशोधरापूर्वः' सुरः पूर्वसुकर्मणः ।।१२।। चक्रायुधः श्रियं न्यस्य सुते वज्रायुधे तपः । पिहितास्रवपादान्ते कृत्वान् •। शिहितावदान्ते करवान्ते निर्वतिं श्रितः ॥२३॥ वज्रायुधोऽपि विन्यस्य राज्यं रत्नायुधे तपः । दधे राज्यमदोन्मत्तः स च मिथ्यात्वमागतः ॥९॥ जलावगाहनायास्य राजहस्त्यन्यदा गतः। मुनिदर्शनतः स्मत्वा जातिं नापः पिबत्यसौ ।।९५।। तस्य मेघनिनादस्य राज्ञा कृत्यमजानता । वज्रदत्तमुनिः पृष्टः कारणं प्रत्यभाषत ॥१६॥ चित्रकारपुरेऽत्राभूत्प्रीतिभद्रो नरेश्वरः । दयिता सुन्दरी तस्य पुत्रः प्रीतिकरस्तयोः ।।१७।। चित्रबुद्धिस्तथा मन्त्री कमला तस्य कामिनी । विचित्रमतिरित्यासीत्तनयः सनयोऽनयोः ॥९॥ अमात्यराजपुत्रौ तौ श्रुत्वा तु तपसः फलम् । श्रुतसागरपादान्ते युवानौ तपसि स्थितौ ॥१९॥ तौ च निर्वाणधामानि पश्यन्ती कान्तदर्शनौ । साकेतमन्यदा यातौ नानाविधतपोधनौ ।।१०।। गणिकां बुद्धिसेनाख्या तत्र दृष्ट्वातिरूपिणीम् । भग्नः कर्मवशालाग्न्यान्मन्त्रिपुत्रस्त्वपत्रपः ॥१.१॥ राज्ञः स गन्धमित्रस्य सूपकारपदे स्थितः । मांसपाकविशेषज्ञो लेभे तां गणिकां ततः ॥१०॥ स भुक्त्वामानया कामं सर्वतोऽविरतात्मकः । मांसाशनप्रियो मत्वा सप्तमी पृथिवीमितः ॥१०॥ जीव ) अकंप्रभ देव कापिष्ठ स्वगंसे च्युत हो वज्रायुध नामका पुत्र हुआ ॥८९-९०॥ श्रीधरा आयिकाका जीव जो कापिष्ठ स्वर्गमें देव हआ था. वहाँसे च्यत हो पथिवीतिलक नगर में राजा प्रियंकर और अतिवेगा रानीके रत्नमाला नामकी पुत्री हुआ ॥९१।। रत्नमाला वज्रायुधके लिए दी गयी और उसके आर्यिका यशोधराका जीव जो कापिष्ठ स्वर्गमें देव हुआ था वहाँसे च्युत हो पूर्व पुण्यके उदयसे रत्नायुध नामका पुत्र हुआ ॥९२॥ चक्रायुध, वज्रायुध पुत्रके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर पिहितास्रव मुनिके पादमूलमें तप करने लगा और अन्तमें निर्वाणको प्राप्त हुआ ||९३।। राजा वज्रायुधने भी राज्यका भार रत्नायुध पुत्रके लिए सौंपकर तप धारण कर लिया। परन्तु रत्नायुध राज्यके मदसे उन्मत्त हो मिथ्यादृष्टि हो गया ॥९४|| राजा रत्नायुधका एक मेघनिनाद नामका मुख्य हस्ती था। एक समय वह जलावगाहनके लिए गया था परन्तु बीचमें मुनिराजका दर्शन होनेसे उसे जाति स्मरण हो गया जिससे उसने पानी नहीं पिया ॥९५॥ राजा रत्नायुध मेघनिनादके इस कार्यको नहीं समझ सका इसलिए उसने वज्रदत्त नामक मुनिराजसे इसका कारण पूछा। उत्तरमें मुनिराज कहने लगे ॥१६॥ ___ इसी भरत क्षेत्रके चित्रकारपुर में एक प्रीतिभद्र नामका राजा रहता था। उसकी सुन्दरी नामकी स्त्री थी और दोनोंके प्रीतिकर नामका पुत्र था ।।९७।। राजा प्रीतिभद्रका एक चित्रबुद्धि नामका मन्त्री था । मन्त्रीकी स्त्रीका नाम कमला था और दोनोंके विचित्रमति नामका नीतिवेत्ता पुत्र था ||२८|| राजपत्र प्रीतिकर और मन्त्रिपुत्र विचित्रमति दोनोंने एक बार श्रुतसागर मुनिसे तपका फल सुना और दोनों ही युवावस्थामें उनके चरणोंके समीप रहकर तप करने लगे ॥१९॥ जो देखने में बहुत सुन्दर थे और नाना प्रकारका तपश्चरण ही जिनका धन था ऐसे वे दोनों मुनि एक समय सिद्ध क्षेत्रोंके दर्शन करते हुए साकेत नगर पहुँचे ॥१००। साकेतनगरमें एक बुद्धिसेना नामकी वेश्या बहुत सुन्दरी थी। उसे देखकर मन्त्रिपुत्र विचित्रमति कर्मोदयके कारण मुनिपदसे भ्रष्ट हो गया और उसने निर्लज्ज हो मुनिपद छोड़ दिया ॥१०१॥ विचित्रमति, मुनिपदसे भ्रष्ट हो राजा गन्धमित्रका रसोइया बन गया। वह मांस बनाने में अत्यन्त निपुण था। इसलिए अपनी कलासे राजाको प्रसन्न कर उसने वरस्वरूप वह वेश्या प्राप्त कर ली ॥१०२॥ जिसकी आत्मा समस्त पापोंसे अविरत थी-जिसे किसी भी पापके करने में संकोच नहीं था तथा जो मांस १. यशोधरापूर्व म. । २. मृत्वान्ते म. ग. । ३. अपगता त्रपा लज्जा यस्य सः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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