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________________ सप्तविंशः सर्गः हरिद्वती'सरिचण्डवेगा गजवतीति च । तथा कुसुमवत्यन्या या सुवर्णवतो च सा ॥१३॥ पञ्चानां सङ्गमे तासां प्रदोषसमये स तम् । स्थापयित्वा समं गत्वा प्रत्यूषेऽक्षोभयस्खगान् ॥१४॥ राक्षसोऽद्य महाकायः स्वप्नेऽदर्शि मया निशि । क्षयकृत्स किलास्माकं निहन्मस्तं खगा लघु ॥१५॥ इति प्रणोद्य तैः साकमुद्यतैर्विविधायुधैः । सोऽवधीनिर्ववौ तीर्थे शीतले शीतलस्य सः ॥१६॥ तच्छरीरस्य पूजार्थ धरणेन्द्रः समागतः । रुष्टो हृस्वाखिला विद्यास्तं हन्तं स समुद्यतः ॥१७॥ आदित्याभस्तमागत्य लान्तवेन्द्रो न्यवारयत् । मा मा प्राणिवधं कार्षीधरणेन्द्र ! फणीन्द्र ! मोः॥१८॥ स्वमहं च खगेन्द्रोऽयं संजयन्तश्च संसृतौ । बद्धवैरा वयं सर्वे यथा भ्रान्तास्तथा ऋणु ॥१९॥ अत्रास्ति भरतक्षेत्रे विषयः शकटश्रुतिः । पुरं सिंहपुरं तत्र सिंहसेनो नृपोऽमवत् ॥२०॥ रामदत्ता प्रिया तस्य कलागुणविभूषणा । धात्री निपुणमत्याख्या निपुणा निपुणेष्वपि ॥२१॥ सत्यवादी नरेन्द्रस्य श्रीभूत्याख्यः पुरोहितः। अलुब्ध इति स ख्यातः श्रीदत्ता तस्य माहनी ॥२२॥ माण्डशालाः समस्तासु दिशासु नगरस्य सः । कारयित्वा वणिग्वगविश्वासं कुरुतेतराम् ॥२३॥ वणिक सुमित्रदत्तोऽस्ति पद्मखण्डे पुरोधसि । रत्नानि पञ्च विन्यस्य यातः पोतेन तृष्णया ॥२४॥ भिन्नपात्रः स चागत्य याचित्वा तान्यलब्धवान् । पुरोहितप्रमाणश्च राजलोकैनिराकृतः ॥२५॥ पर्वतके दक्षिण भागके समीप वरुण नामक पर्वतपर उन्हें ले गया ॥१२॥ हरिद्वती, चण्डवेगा, गजवती, कुसूमवती और सूवर्णवती इन पाँच नदियोंका जहाँ समागम हआ है वहाँ सायंकालके समय उन्हें रखकर चला गया और प्रातःकाल उसने विद्याधरोंको यह कहकर क्षुभित कर दिया कि आज रात्रिको मैंने स्वप्न में एक महाकाय राक्षस देखा है। वह राक्षस हम लोगोंका क्षय करनेवाला होगा। इसलिए हे विद्याधरो! चलो उसे शीघ्र ही मार डालें ॥१३-१५॥ इस प्रकार विद्याधरोंको प्रेरित कर उसने नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले विद्याधरोंके साथ उन्हें मार डाला। मुनिराज संजयन्त भी अन्तिम समय केवलज्ञान प्राप्त कर श्री शीतलनाथ भगवान्के शान्तिदायक तीर्थमें निर्वाणको प्राप्त हुए ॥१६॥ तदनन्तर उनके शरीरकी पूजाके लिए जयन्तका जीव-धरणेन्द्र आया सो विद्युइंष्ट्र की इस करतूतसे वह बहुत ही रुष्ट हुआ। वह विद्युदंष्ट्रकी समस्त विद्याओंको हरकर उसे मारनेके लिए उद्यत हुआ ही था कि उसी समय आदित्याभ दिवाकर देव नामक लान्तवेन्द्रने वहाँ आकर 'हे धरणेन्द्र ! हे फणीन्द्र ! व्यर्थ हो जीव हिंसा न करो' इन शब्दों द्वारा उसे हिंसासे रोक दिया ॥१७-१८॥ तुम, मैं, यह विद्याधरोंका राजा विद्युइंष्ट्र और संजयन्त इस प्रकार हम सब वैर बांधकर संसारमें जिस तरह भटकते रहे हैं वह मैं कहता हूँ सो सुनो ||१९|| __ इसी भरत क्षेत्रमें एक शकट नामका देश है। उसके सिंहपुर नगरमें किसी समय सिंहसेन नामका राजा राज्य करता था ।।२०।। सिंहसेनको कला और गुणरूपी आभूषणोंसे सुशोभित रामदत्ता नामकी स्त्री थी तथा निपुणमति नामको एक धाय थी जो निपुण मनुष्योंमें भी अतिशय निपुण थी ॥२१॥ राजाका एक श्रीभूति नामका पुरोहित था जो अपनेको सत्यवादी प्रकट करता था तथा लोकमें अलुब्ध-निलोभ है इस तरह प्रसिद्ध था। उसको ब्राह्मणीका नाम श्रीदत्ता था ॥२२॥ वह श्रोभूति नगरको समस्त दिशाओंमें भाण्डशालाएँ-धरोहर रखनेके स्थान बनवाकर व्यापारी वर्गका बहुत विश्वासपात्र बन गया था ।।२३।। उसी समय पद्मखण्ड नामक नगरमें एक सुमित्रदत्त नामक वणिक् रहता था। वह किसी समय अपने पांच रत्न श्रीभूति पुरोहितके पास रखकर तृष्णावश जहाज द्वारा कहीं गया था ॥२४॥ भाग्यवश उसका जहाज फट गया। १. शरच्चन्द्रवेगा म. | २. 'लघु क्षिप्रमरं द्तम्' इत्यमरः । ३. निर्वाणं प्राप्तवान् । ४. महाथ ख. ग., ङ., माहाथं म. । ५. माहिनी म. ! ब्राह्मणी । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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