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________________ सप्तविंशः सर्गः गोतमोऽत्रान्तरे पृष्टः स्वस्थेन मगधेशिना । विद्युदंष्ट्रो मुने ! कोऽसौ कीदृगाचरणोऽपि वा ॥ १ ॥ इत्युक्तो सोऽवदद्वंशे नमेर्गगनवल्लभे । विद्युदंष्ट्रोऽभवद् भर्त्ता श्रेण्योरद्भुतविक्रमः ॥२॥ अपरेभ्यो विदेहेभ्यः सोऽन्यदानीय योगिनम् । संजयन्तमिहोदारमुपसर्गमकारयत् ॥३॥ हेतुना केन नाथेति प्रश्नितः कौतुकाद् गणी । पुराणं संजयन्तस्य जगौ पापविनाशनम् ॥४॥ इहापरविदेहेऽस्ति विषयो गन्धमालिनी । वीतशोका पुरींहात्र वैजयन्तोऽभवन्नृपः ॥५॥ सर्वश्रीरिति भार्यास्य स्वयं श्रीरिव रूपिणी । संजयन्तजयन्ताख्यौ तस्याश्च तनयौ शुभौ ॥ ६ ॥ विहरन्नन्यदा यातः स्वयंभूस्तीर्थं कृत्ततः । धर्मं श्रुत्वा पिता पुत्रौ ते त्रयोऽपि प्रवव्रजुः ॥७॥ तेषां विहरतां सार्धं पिहितास्रवसूरिणा । संजातं वैजयन्तस्य केवलं घातिघातिनः ॥ ८ ॥ चतुर्णिकाय देवेषु वन्दमानेषु तं मुनिम् । जयन्तो वीक्ष्य धरणं निदानी' धरणोऽभवत् ॥९॥ स्वपुर्याश्च मनोहर्याः श्मशाने भीमदर्शने । सप्ताहप्रतिमो योगी संजयन्तोऽन्यदा स्थितः ॥१०॥ भद्राले वने स्त्रीभिर्विद्युदंष्ट्रोऽन्यदा चिरम् । रन्त्वा गच्छत्पुरं दृष्ट्वा संजयन्तं यदृच्छया ॥११॥ पूर्ववैरवशात्कुद्धस्तमानीयात्र भारते । वैताढ्यदक्षिणोपान्ते गिरौ वरुणनामनि ॥ १२ ॥ अथानन्तर इसी बीच में निश्चिन्ततासे बैठे हुए राजा श्रेणिकने गौतम स्वामीसे पूछा कि हे मुनिनाथ ! विद्युद्दंष्ट्र कौन था ? और उसका आचरण कैसा था ? ||१|| इस प्रकार पूछनेपर गौतम स्वामी कहने लगे कि नमिके वंश में गगनवल्लभ नामक नगर में एक विद्युद्दंष्ट्र नामका विद्याधर हो गया है जो दोनों श्रेणियोंका स्वामी था तथा अद्भुत पराक्रमसे युक्त था || २ || एक समय वह पश्चिम विदेह क्षेत्र से संजयन्त नामक मुनिराजको अपने यहां उठा लाया और उनपर उसने घोर उपसर्ग कराया ||३|| यह सुन राजा श्रेणिकने कौतुकवश फिर पूछा कि हे नाथ! विद्युद्दंष्ट्रने संजयन्त मुनिराजपर किस कारण उपसगं कराया था ? इसके उत्तरमें गणधर भगवान् संजयन्त मुनिका पापनाशक पुराण इस प्रकार कहने लगे ||४|| हे राजन् ! इसी जम्बू द्वीपके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें एक गन्धमालिनी नामका देश है । उसमें वीतशोका नामकी नगरी है। उस नगरीमें किसी समय वैजयन्त नामका राजा राज्य करता था || ५ | उसकी सर्वश्री नामकी रानी थी जो ऐसी जान पड़ती थी मानो शरीरको धारण करनेवाली साक्षात् लक्ष्मी हो। इन दोनोंके संजयन्त और जयन्त नामके दो उत्तम पुत्र थे ||६|| किसी एक समय विहार करते हुए स्वयम्भू तीर्थंकर वहाँ आये। उनसे धर्म श्रवण कर पिता और दोनों पुत्र - तीनोंने दीक्षा धारण कर ली ||७|| अपने पिहितास्रव नामक आचार्य के साथ वे तीनों मुनि विहार करते थे । कदाचित् घातिया कर्मोंको नष्ट करनेवाले वैजयन्त मुनिको केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ||८|| केवलज्ञानके उत्सव में जब चारों निकायके देव मुनिराज वैजयन्तकी वन्दना कर रहे थे तब धरणेन्द्रको देख जयन्त मुनिने धरणेन्द्र होनेका निदान किया और उसके फलस्वरूप वे मरकर धरणेन्द्र हो भी गये ||९|| किसी समय जयन्तके बड़े भाई संजयन्त मुनिराज अपनी वीतशोका नामक सुन्दर नगरीके भीमदर्शन - भयंकर श्मशान में सात दिनका प्रतिमा योग लेकर विराजमान थे ||१०|| उसी समय विद्युद्दंष्ट्र, भद्रशाल वनमें अपनी स्त्रियोंके साथ चिरकाल तक क्रीड़ा कर अपने नगरकी ओर लौट रहा था कि अचानक उसकी दृष्टि संजयन्त मुनिराजपर पड़ी ||११|| पूर्वं वैरके कारण कुपित हो वह उन्हें उठा लाया और भरत क्षेत्र सम्बन्धी विजया १. निदानधरणो ङ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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