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________________ २ हरिवंशपुराणे तीर्थं चतुर्थमन्वर्थं यश्चकारामिनन्दनः । लोकाभिनन्दनस्तस्मै जिनेन्द्राय नमस्त्रिधा ॥ ६ ॥ पञ्चमं प्रपञ्चार्थं तीर्थं वर्तयति स्म यः । नमः सुमतये तस्मै नमः सुमतये सदा ॥७॥ ककुभोsभासयद्यस्य जितपद्मप्रभा प्रभा । पद्मप्रभाय षष्टाय तस्मै तीर्थकृते नमः ॥ ८ ॥ यस्तोथं स्वार्थसंपन्नः परार्थमुदपादयत् । सप्तमं तु नमस्तस्मै सुपाश्र्वाय कृतात्मने ॥९॥ अष्टमस्येन्द्र जुष्टस्य क तीर्थस्य तायिने । चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय नमश्चन्द्रामकीर्तये ॥ १० ॥ देहदन्तप्रमाक्रान्तकुन्दपुष्पत्विषे नमः । पुष्पदन्ताय तीर्थस्य नवमस्य विधायिने ॥११॥ शुचिशीतलतीर्थस्य जन्तुसंतापनोदिनः । दशमस्य नमः कर्त्रे शीतलायापथाशिने ॥ १२ ॥ तीर्थं व्युच्छिन्नमुद्भाव्य मन्यानामाजवअवम् । चिच्छेदैकादशो योऽहंस्तस्मै श्रीश्रेयसे नमः ॥३३॥ कुतीर्थध्वान्तमुद्धूय द्वादशं तीर्थमुज्ज्वलम् । नमस्कृतवते मत्रै वासुपूज्यविवस्वते ॥ १४॥ विमलाय नमस्तस्मै यः कापथैमलाविलम् । त्रयोदशेन तीर्थेन चकार विमलं जगत् ॥१५॥ तस्मै नमः कुसिद्धान्ततमोभेदनमास्वते । चतुर्दशस्य तीर्थस्य यः कर्ताऽनन्त जिज्जिनः ॥ १६ ॥ अधर्मपथपातालपतदुद्धरणक्षमम् । कर्त्रे पञ्चदशं तीर्थं धर्माय मुनये नमः ॥ १७ ॥ सृष्टषोडशतीर्थाय कृर्तनानेतिशान्तये । चक्रेशाय जिनेशाय नमः शान्ताये' शान्तये " 119211 नमस्कार हो ॥५॥ लोगों को आनन्दित करनेवाले जिन अभिनन्दन नाथने सार्थक नामको धारण करनेवाले चतुर्थं तीर्थ की प्रवृत्ति की थी उन श्री अभिनन्दन जिनेन्द्रके लिए मन-वचन-कायसे नमस्कार हो ||६|| जिन्होंने विस्तृत अर्थसे सहित पंचम तीर्थको प्रवृत्ति की थी तथा जो सदा सुमति सद्बुद्धि धारक थे उन पंचम सुमतिनाथ तीर्थंकरके लिए नमस्कार हो ||७|| कमलों की प्रभाको जीतनेवाली जिनकी प्रभाने दिशाओंको देदीप्यमान किया था उन छठवें तीर्थंकर श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्र के लिए नमस्कार हो ||८|| जिन्होंने आत्महितसे सम्पन्न होकर परहित के लिए सप्तम तीर्थंकी उत्पत्ति की थी तथा जो स्वयं कृतकृत्य थे उन सुपार्श्वनाथ भगवान् के लिए नमस्कार हो ||९|| जो इन्द्रोंके द्वारा सेवित अष्टम तीर्थंके प्रवर्तक एवं रक्षक थे तथा जो चन्द्रमाके समान निर्मल कीर्तिके धारक थे उन चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र के लिए- नमस्कार हो ||१०|| जिन्होंने अपने शरीर तथा दांतों की कान्ति कुन्दपुष्पकी कान्तिको परास्त कर दिया था और जो नौवें तीर्थंके प्रवर्तक थे उन पुष्पदन्त भगवान् के लिए नमस्कार हो ||११|| जो प्राणियोंके सन्तापको दूर करनेवाले उज्ज्वल एवं शीतल दशवें तीर्थंके कर्ता थे उन कुमार्गके नाशक श्री शीतलनाथ जिनेन्द्रके लिए नमस्कार हो ||१२|| जिन्होंने श्री शीतलनाथ भगवान् के मोक्ष जानेके बाद व्युच्छित्तिको प्राप्त तीर्थको प्रकट कर भव्यrain संसार नष्ट किया था तथा जो ग्यारहवें जिनेन्द्र थे उन श्री श्रेयांसनाथ भगवान्‌ के लिए नमस्कार हो ||१३|| जिन्होंने कुतीर्थरूपी अन्धकारको नष्ट कर बारहवाँ उज्ज्वल तीर्थं प्रकट किया था तथा जो सबके स्वामी थे ऐसे उन वासुपूज्य भगवान् रूपी सूर्यको नमस्कार हो ||१४|| जिन्होंने कुमार्गं रूपी मलसे मलिन संसारको तेरहवें तीर्थंके द्वारा निर्मल किया था उन विमलनाथ भगवान्को नमस्कार हो ||१५|| जो चौदहवें तीर्थंके कर्ता थे तथा जिन्होंने अनन्त अर्थात् संसारको जीत लिया था और जो मिथ्या धर्मं रूपी अन्धकारको नष्ट करनेके लिए सूर्यके समान थे उन अनन्तनाथ जिनेन्द्रको नमस्कार हो ||१६|| जो अधर्मके मागंसे पाताल नरकमें पड़नेवाले प्राणियोंका उद्धार करने में समर्थं पन्द्रहवें तीर्थंके कर्ता थे उन श्री धर्मनाथ मुनीन्द्रके लिए नमस्कार हो ||१७|| जो सोलहवें तीर्थंके कर्ता थे, जिन्होंने अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि नाना ईतियोंको शान्त किया था, जो १. -मर्थ्य म. । २. सविस्तारार्थं । ३. सुष्ठु मतिर्ज्ञानं केवलं यस्य तस्मै । ४. दिश: । ५. पालकाय । ६. कापथस्फेटकाय । ७. कुमार्गमलिनम् । कषायमलाविलं ख., म. । ८. सृष्टे षोडशतीर्थस्य म, ख. । ९. कृता नानाप्रकाराणामातीनां शान्तिर्येन स तस्मै । १०. शान्तमूर्तये । ११. शान्तिनाथाय । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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