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________________ त्रयोविंशः सर्गः ३३९ स्त्रीवस्त्रमनवस्यानां निम्नं वक्त्रं च निश्चितम् । ह्रस्वं कृपणमर्त्यानां दीर्घमद्रव्य भागिनाम् ॥ १०० ॥ शङ्कुकर्णाः महीपालाः रोमकर्णाश्विरायुषः । ऋज्वी समपुटा नासा स्वल्पच्छिद्रा च भोगिनाम् ॥ १०१ ॥ सुकृत्क्षुतं' धनेशानां द्विह्निः शास्त्रवतां विदुः । संहतं च प्रमुक्तं च विदितं चिरजीविनाम् ॥१०२॥ रक्तान्तैः पद्मपत्रामैत्रः श्रीधनभागिनः । गजेन्द्रवृषनेत्रास्तु भवन्ति वसुधाधिपाः ॥ १०३ ॥ अमङ्गलदृशः पापाः पिङ्गलासंगसंगिनः । असंमान्याः सदा पुंसामदृश्याश्च विशेषतः || १०४ || मानसैर्वाचिकैः कायैः पापैः संचर्चिताः सदा । दुर्जना दुर्भगाः क्रूराः पापा मार्जारलोचनाः ॥१०५॥ लक्षणानां समस्तानां गुणदोषविचिन्तने । चक्षुर्लक्षणमेवात्र पर्याप्तं फलसाधने ।। १०६ ।। मानोन्मानस्वरं देहं गतिसंहतिमन्वयम् । सारं वर्ण बुधो दृष्ट्वा प्रकृतिं च वदेत्फलम् ||१०७ || इति प्रवाच्यमानेऽसौ पुस्तके मधुपिङ्गलः । नेत्रदोषकृताशङ्को निर्गत्य सद्सोऽगमत् ||१०८ || सुलसां च परित्यज्य प्रव्रज्य नवयौवनः । मुनिचर्याश्रितो देशान् पर्यटन्मधुपिङ्गलः ॥ १०९ ॥ इतः सुलसदम्भोजलोचनां सुलसां स्वयम् । प्राप्तः स्वयंवरे दक्षः सगरः सुखमन्वभूत् ॥ ११० ॥ तदात्वेऽभ्येति शब्दश्चेद् वैदग्ध्यमभिकथ्यते । नातिगूढतया जन्तुरायस्यां तु दुरन्तताम् ॥ १११ ॥ सामुद्रिकोऽन्यदाद्वाक्षीन्निःसंगमधुपिङ्गलम् । मध्याह्नो पुरि कस्यांचित्पारणार्थं मुपागतम् ॥। ११२ ।। होते हैं ||१९|| सन्तान - रहित मनुष्योंका मुख स्त्रीके समान तथा नीचा होता है । कंजूस मनुष्यों का मुख छोटा और निर्धन मनुष्योंका मुख लम्बा होता है ॥१००|| जिनके कान कीलाके समान हों वे राजा होते हैं, जिनके कानोंपर रोम होते हैं वे दीर्घायु होते हैं, जिनकी नाक सीधी समान पुटवाली एवं छोटे छिद्रोंसे युक्त होती है वे भोगी होते हैं ॥ १०१ ॥ जिनको एक छींक आवे वे धनाढ्य, जिनको दो-तीन छींकें एक साथ आवें वे विद्वान् तथा जिनको लगातार अनेक खुली छींकें आवें दीर्घायु होते हैं || १०२ || जिनके नेत्र अन्तमें लाल और कमलपत्रके समान हों वे लक्ष्मीमान् और जिनके गजेन्द्र एवं बेलके समान 'वे राजा होते हैं ।। १०३ ॥ जो मनुष्य पिंगलवर्णके नेत्रोंसे युक्त हैं वे अमांगलिक और पापी हैं उनके साथ न कभी बात करना चाहिए और न उनकी ओर खासकर देखना चाहिए || १०४ || जिनके नेत्र मार्जारके नेत्रोंके समान रहते हैं वे सदा मानसिक, वानिक और कायिक पापोंसे युक्त होते हैं तथा दुर्जन, अभागे, क्रूर और पापी माने गये हैं ||१०५|| समस्त लक्षणोंके गुण और दोषका विचार करते समय चक्षुके लक्षणका पूर्ण विचार करना चाहिए क्योंकि फलकी सिद्धिके लिए यही पर्याप्त कारण है || १०६ ।। विद्वान्को चाहिए कि वह मनुष्य के मान, उन्मान, देह, चाल-ढाल, वंश, उत्तमवर्ण और प्रकृतिको देखकर फलका प्रतिपादन करे || १०७॥ इस प्रकार पुस्तक बाँचे जानेपर मधुपिंगलको यह आशंका हो गयी कि हमारे नेत्रमें दोष है इसीलिए वह सभासे निकलकर चला गया || १०८ । । यद्यपि मधुपिंगल नवयौवन से युक्त था तथापि सुलसाको छोड़कर दीक्षित हो गया और मुनिचर्याको धारण कर अनेक देशों में विहार करने लगा ||१०९ || इधर राजा सगर बड़ा चतुर था इसलिए वह कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली सुलसाको स्वयंवरमें स्वयं प्राप्त कर सुखका उपभोग करने लगा ||११०|| आचार्य कहते हैं कि ऐसी प्रवृत्ति तत्काल तो चतुराई कही जाती है परन्तु वह सदा छिपी नहीं रहती इसलिए इसका करनेवाला प्राणी आगामी कालमें अवश्य ही दुष्परिणामको प्राप्त होता है - उसका खोटा फल भोगता है ।१११ ॥ तदनन्तर एक दिन मध्याह्न के समय पारणाके लिए किसी नगर में आये हुए दिगम्बर मुद्रा १. कृतं म । २. सुलसतो सुशोभमाने अम्भोजलोचने यस्याः सा ताम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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