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________________ द्वाविंशतितमः सर्गः ३२९ श्यामयाशनिवेगस्य दुहित्राङ्गारकः खगः । युद्ध खण्डितविद्योऽत्र विद्यासिद्धिं प्रतिस्थितः ॥१४४॥ दर्शनेन तवास्याशु किल विद्या प्रसिद्धयति । तदास्यानुग्रहेच्छा चेद्देहि देहि स्वदर्शनम् ॥१४५॥ इत्युक्तो विदितश्यामाक्षेमवार्त्तः स तोषवान् । जगाद किमनिष्टेन दृष्टेनाङ्गारकेण मे ॥१४६॥ कालातिपातिभिर्व्यथैः क्रीडितैरिह किं कृतैः । प्रयामो वयमास्स्व त्वं पश्यामः इवासुरं पुरम् ॥१४॥ एवमस्त्विति नीत्वासौ स्थापितोऽसितपर्वते । कृत विद्याधरीरक्षो बाह्योद्याने मनोहरे ॥१४॥ प्रविष्टा तुष्टचित्ता च निजं नीलयशाः पुरम् । शौरिसंकथया तस्थौ तत्समागमकाङ्क्षया ॥१४९॥ सुस्नातोऽलंकृतो भूत्या महत्या स रथस्थितः । प्रवेशितः पुरं वीरः खेचरैः स्वर्गसंनिमम् ॥१५॥ दृष्टः सप्रश्रयं श्रीमानवितृप्तविलोचनैः । जनैः ससिंहदंष्ट्रः स तुष्टान्तःपुरपूर्वकैः ॥१५१॥ ततः पुण्यदिने पुण्यपूर्ण योः पूर्णरूपयोः। विधिपूर्व तयोवृत्तं पाणिग्रहणमङ्गलम् ॥१५२॥ स नीलयशसा शौरि गरेऽसितपर्वते । रत्येव सहितः कामः कामभोगानसेवत ॥१५॥ शार्दूलविक्रीडितम् . नीलं नीलयशोयशो न जनितं स्त्रीभिर्यतः स्वर्गुणैः शौरेः शौर्यशरीरिणो हि न यशः कृष्णीकृतं खेचरैः । उस शोभासम्पन्न पर्वतको लोग ह्रीमन्त गिरि कहते हैं। यह पर्वत लज्जासे युक्त मनुष्यको भी तपरूपी लक्ष्मीसे युक्त कर देता है ॥१४२-१४३।। यहाँ अशनिवेगकी पुत्री श्यामाने युद्ध में जिसकी विद्या खण्डित कर दी थी ऐसा अंगारक नामका विद्याधर विद्या सिद्ध करनेके लिए स्थित है। आपके दर्शनसे इसे शीघ्र विद्या सिद्ध हो जावेगी इसलिए यदि इसका उपकार करनेकी आपकी इच्छा है तो इसे अपना दर्शन दें ॥१४४-१४५॥ हिरण्यवतीके इस प्रकार कहनेपर प्रियतमा श्यामाके कुशल समाचार जानकर कुमार बहुत सन्तुष्ट हुए और कहने लगे कि अंगारक तो हमारा शत्रु है इसको देखनेसे क्या लाभ है ? ॥१४६।। इस पर्वतपर की हुई समयको बितानेवाली व्यर्थकी क्रीड़ाओंसे मुझे क्या प्रयोजन है ? यदि तुम्हें रहना इष्ट है तो रहो मैं तो जाता हूँ और श्वसुरके नगरको देखता हूँ ॥१४७।। कुमारके ऐसा कहनेपर हिरण्यवतीने 'एवमस्तु' कहा अर्थात् जैसा आप चाहते हैं वैसा ही करती हूँ। यह कह उसने असितपर्वत नगर ले जाकर उन्हें नगरके बाहर एक सुन्दर उद्यानमें ठहरा दिया तथा रक्षाके लिए विद्याधरियोंको नियुक्त कर दिया ॥१४८।। कुमारी नीलंयशा प्रसन्नचित्त हो अपने नगरमें प्रविष्ट हुई और कुमारके समागमकी आकांक्षा तथा उन्हींकी कथा करती हुई रहने लगी ॥१४९॥ तदनन्तर बड़े वैभवके साथ जिन्हें स्नान कराया गया था तथा उत्तमोत्तम आभूषण पहनाये गये थे ऐसे वीर कुमार वसुदेवको रथपर बैठाकर विद्याधरोंने स्वर्ग तुल्य नगर में प्रविष्ट कराया ।।१५०|| वहाँ कुमारका मनोहर रूप देखदेखकर जिसके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे ऐसे नीलंयशाके पिता सिहदंष्ट्रा तथा सन्तोषसे युक्त अन्त:पुरको आदि लेकर समस्त लोगोंने बड़े विभवके साथ श्रीमान् बसुदेवको देखा ।।१५१॥ तदनन्तर जो पुण्यसे परिपूर्ण थे और जिनका रूप चरम सीमाको प्राप्त था ऐसे कुमार वसुदेव और नीलयशाका पाणिग्रहण मंगल किसी पवित्र दिन विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ ॥१५२।। तत्पश्चात् जिस प्रकार कामदेव अपनो स्त्री रतिके साथ इच्छानुसार भोगोंका सेवन करता है उसी प्रकार कुमार वसुदेव असितपवंत नगरमें नीलंयशाके साथ इच्छानुसार भोगोंका सेवन करने लगे ॥१५३।। गौतम स्वामी कहते हैं कि चूंकि वहाँकी स्त्रियां अपने गुणोंसे नीलंयशाके यशको मलिन नहीं कर सकी थीं और न विद्याधर ही पराक्रमी वसुदेवके यशको कलंकित कर सके थे इसलिए वहाँ प्रेम१. तवास्या- म.। २. श्वसुरस्येदम् श्वासुरम् म.। ३. रथः स्थितः म. । ४. -जितः म.। ४२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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