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________________ एकविंशतितमः सर्गः रुद्रदत्तः पितृव्यो मे बहुव्यसनसक्तधीः । संमान्य योजितो मात्रा कामुक व्यवहारवित् ॥ ४० ॥ आसीत्कलिङ्गसेनात्र गणिका गणनायिका । सुता वसन्तसेनास्या वसन्तश्रीरिव श्रिया ॥ ४१॥ कन्यासी नृत्यगीतादिकलाकौशलशालिनी । सौरूप्यस्य परा कोटियौंवनस्य नवोन्नतिः ॥ ४२ ॥ नृत्यारम्भेऽन्यदा तस्या रुद्रदत्तेन संगतः । ससाहित्यजनाकीर्णे स्थितोऽहं नृत्यमण्डपे ॥ ४३ ॥ सूचनाटकच्या जातिमुकुलाञ्जलिम् । व्यकिरत् प्रविकासं च प्राप्तेषु मुकुलेषु च ॥४४॥ सुष्ठुकारे प्रयुक्तेऽस्याः कैश्चित्साहित्यवर्त्तिभिः । मया विकासकालज्ञमालाकारस्य योजिते ॥ ४५॥ तस्या दत्ते बुधैस्तस्मिन्नङ्गुष्ठेऽभिनये कृते । नापितस्य मया दत्त े नखमण्डलशोधिनः ॥ ४६ ॥ कुक्षेगर्मक्षिकायाश्च व्युदासामिनये कृते । पूर्ववत् तैः कृते प्राप्तगोपालस्य मया पुनः ॥ ४७ ॥ रसभावविवेकस्य व्यञ्जिका सा च संप्रति । सुष्ठुकारमदात्प्रीता स्वाङ्गुलिस्फोटकारिणी ॥ ४८ ॥ ततः सर्वस्य लोकस्य पश्यतो मम संमुखम् । ननाट नाटकं हारि सानुरागवशा च सा ॥ ४९ ॥ उपसंहृतनृत्या च निजप्रासादवर्त्तिनी । स्वमात्रेऽकथयद्भावमिति साकल्पकातुरा ॥५०॥ दह जन्मनि मे मातश्चारुदत्तात्परस्य न । संकल्पस्तेन तेनारं मां योजयितुमर्हसि ॥ ५१ ॥ माता ज्ञात्वा सुताचित्तं चारुदत्तस्य योजने । दानमानादिनाभ्यर्च्य रुद्रदत्तमयोजयत् ॥५२॥ तेन चाहमुपायेन पृष्ठतश्चाग्रतः पथि । गजौ प्रयोज्य तद्वेश्यावेश्म जातु प्रवेशितः ॥५३॥ मेरी कुछ भी रुचि नहीं थी सो ठीक ही है क्योंकि शास्त्रका व्यसन अन्य व्यसनोंका बाधक है ||३९|| मेरा एक रुद्रदत्त नामका काका था जो अनेक व्यसनोंमें आसक्त था तथा कामीजनोंके समस्त व्यवहारको जाननेवाला था । मेरी माताने उसे मेरे साथ लगा दिया ||४०|| इसी चम्पा नगरी में एक कलिंगसेना नामकी वेश्या थी जो समस्त वेश्याओं की शिरोमणि थी और उसकी वसन्तसेना नामकी पुत्री थी जो शोभामें वसन्तकी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी || ४१ ॥ वह वसन्तसेना नृत्य-गीत आदि कलाओं सम्बन्धी कौशलसे सुशोभित थी, सौन्दर्यकी परम सीमा थी और यौवनकी नूतन उन्नति थी ॥ ४२ ॥ किसी एक दिन वसन्तसेनाका नृत्य प्रारम्भ होनेवाला था । उसके लिए मैं भी रुद्रदत्तके साथ साहित्यिक जनोंसे भरे हुए नृत्य-मण्डपमें बैठा था ||४३|| वह सूची नृत्य करना चाहती थी। उसके लिए उसने सुइयोंके अग्रभागपर अंजलि भरकर जाति पुष्पों की बोंड़ियाँ बिखेर दीं और गायनके प्रभावसे जब सब बोंड़ियाँ खिल गयीं तो सभा में बैठे हुए कितने ही लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। मैं जानता था कि पुष्पोंके खिलनेसे कौन-सा राग होता है, इसलिए मैंने उसे मालाकार रागका संकेत कर दिया । सूची नृत्यके बाद उसने अंगुष्ठ नृत्य किया तो सभाके विद्वान् उसकी प्रशंसा करने लगे । परन्तु मैंने नखमण्डलको शुद्ध करनेवाले नापित रागका संकेत कर दिया । तदनन्तर उसने गो और मक्षिकाकी कुक्षिका अभिनय किया तो अन्य लोग उसकी प्रशंसा करने लगे । परन्तु मैंने गोपाल रागका संकेत कर दिया। इस प्रकार रस और भाव के विवेकको प्रकट करनेवाली उस वसन्तसेनाने प्रसन्न हो अपनी अंगुलियां चटकातो हुई मेरी बहुत प्रशंशा की । तदनन्तर अनुरागसे भरी हुई उक्त वेश्याने सब लोगोंके देखते-देखते मेरे सामने सुन्दर नृत्य किया ||४४-४९ || नृत्य समाप्त कर वह अपने घर गयी और तीव्र उत्कण्ठा से आतुर हो अपनी माता से कहने लगी कि हे माता ! इस जन्ममें मेरा चारुदत्त के सिवाय किसी दूसरेके साथ समागमका संकल्प नहीं है इसलिए मुझे शीघ्र ही चारुदत्तके साथ मिलानेके योग्य हो ||५०-५१ || माताने पुत्रोका अभिप्राय जानकर चारुदत्त के साथ मिलाने के लिए दान-सम्मान आदिसे सन्तुष्ट कर रुद्रदत्तको नियुक्त किया अर्थात् इस कार्यका भार उसने रुद्रदत्त के लिए सौंप दिया || ५२ || किसी दिन में रुद्रदत्तके साथ मार्ग में जा रहा था कि उसने उपाय कर मेरे आगे १. प्रविकासात्प्राकू ग. | Jain Education International ३०७ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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