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________________ ३०२ हरिवंशपुराणे तं छलव्यवहारस्थमविनेयमनार्जवम् । दुष्टाहिमिव दुःशीलं वशीकत्तं प्रचक्रमे ॥५१॥ मिनोमि पाप ! पश्य त्वं पदत्रयमितीरयन् । व्यजम्मत महाकायो ज्योतिःपटलमास्पृशन् ॥५२॥ मेरावेकक्रमो न्यस्तो द्वितीयो मानुषोत्तरे । अलाभादवकाशस्य तृतीयोऽभ्रमदम्बरे ॥५३॥ तदा विष्णोः प्रभावेण क्षुभिते भुवनत्रये । किमेतदितिध्वाना जाताः किंपुरुषादयः ॥५४॥ अनुकर्ण मुनेस्तस्य वीणावंशादिवादिनः । मदुगीताः सनारीकाः जगुर्गन्धर्वपूर्वकाः ॥५५॥ तस्य रक्ततलः पादो भ्रमन् स्वैरं नभस्यभात् । संगीतकिन्नरादिस्त्रीमुखाब्जनखदर्पणः ॥५६॥ संक्षोभ मनसो विष्णो प्रमो संहर संहर । तपःप्रभावतस्तेऽद्य चलितं भुवनत्रयम् ॥५॥ देवविद्याधरैवीं रैः श्रव्यगान्धर्ववीणिभिः । सिद्धान्तगीतिकागानरुच्चराकाशचारणः ॥५॥ इति प्रसाद्यमानोऽसौ शनैः संहृत्य विक्रियाम् । स्वभावस्थोऽभवद्भानुयथोत्पातशमेस्थितः ॥५१॥ उपसर्ग विनाश्याशु वलिं बद्ध्या सुरास्तदा। विनिगृह्य दुरात्मानं देशाद् दूरं निराकिरन् ॥६॥ वीणाघोपोत्तरश्रेणी खगानां किन्नरैः कृता । सिद्धकूटे महाघोषा सुघोषा दक्षिणे तटे ॥६॥ कृत्वा शासनवात्सल्यमुपसर्गविनाशनात् । विष्णुः स्वगुरुपादान्ते विक्रियाशल्यमुजहौ ॥१०॥ वचनसे च्युत हो जाता है। अपने वचनका पालन करनेवाला मनुष्य लोकमें कभी आपत्तियुक्त नहीं होता ।।५०|| ___ तदनन्तर जो कपट-व्यवहार करने में तत्पर था, शिक्षाके अयोग्य था, कुटिल था और दुष्ट साँपके समान दुष्ट स्वभावका धारक था ऐसे उस वलिको वश करनेके लिए विष्णुकुमार मुनि उद्यत हुए ॥५१।। 'अरे पापी! देख, मैं तोन डग भूमिको नापता हूँ' यह कहते हुए उन्होंने अपने शरीरको इतना बड़ा बना लिया कि वह ज्योतिष्पटलको छूने लगा ॥५२।। उन्होंने एक डग मेरुपर रखी दूसरी मानुषोत्तरपर और तीसरी अवकाश न मिलनेसे आकाशमें ही घूमती रही ।।५३॥ उस समय विष्णुके प्रभावसे तीनों लोकोंमें क्षोभ मच गया। किम्पुरुष आदि देव 'क्या है ? क्या है ?' यह शब्द करने लगे ॥५४॥ वीणा-बाँसुरी आदि बजानेवाले कोमल गीतोंके गायक गन्धर्वदेव अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ उन मुनिराजके समीप मनोहर गीत गाने लगे ॥५५॥ लाल-लाल तलुएसे सहित एवं आकाश में स्वच्छन्दतासे घूमता हुआ उनका पैर अत्यधिक सुशोभित हो रहा था और उसके नख संगीतके लिए इकट्ठी हुईं किन्नरादि देवोंकी स्त्रियोंको अपना-अपना मुख-कमल देखनेके लिए दर्पणके समान जान पड़ते थे ॥५६|| 'हे विष्णो ! हे प्रभो ! मनके क्षोभको दूर करो, दूर करो, आपके तपके प्रभावसे आज तीनों लोक चल-विचल हो उठे हैं' इस प्रकार मधुर गीतोंके साथ वीणा बजानेवाले देवों, धीर-वीर विद्याधरों तथा सिद्धान्त शास्त्रको गाथाओंको गानेवाले एवं बहुत ऊंचे आकाशमें विचरण करनेवाले चारण ऋद्धिधारी मुनियोंने जब उन्हें शान्त किया तब वे धीरे-धीरे अपनी विक्रियाको संकोच कर उस तरह स्वभावस्थ हो गये-जिस तरह कि उत्पातके शान्त होनेपर सूर्य स्वभावस्थ हो जाता है-अपने मूल रूपमें आ जाता है ॥५७-५९|| उस समय देवोंने शीघ्र ही मुनियोंका उपसर्ग दूर कर दुष्ट वलिको बांध लिया और उसे दण्डित कर देशसे दूर कर दिया ॥६०|| उस समय किन्नरदेव तीन वीणाएँ लाये थे उनमें घोषा नामकी वीणा तो उत्तरश्रेणी में रहनेवाले विद्याधरोंको दी। महाघोषा सिद्धकूटवासियोंको और सुघोषा दक्षिणतटवासी विद्याधरोंको दो ॥६१।। इस प्रकार उपसर्ग दूर करनेसे जिनशासनके प्रति वत्सलता प्रकट करते हुए विष्णुकुमार मुनिने सीधे गुरुके पास जाकर प्रायश्चित्त द्वारा विक्रियाको शल्य छोड़ी ॥६२।। १. यथोत्पातः समोत्थितः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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