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________________ ३२ हरिवंशपुराणे विषय पृष्ठ विषय सुन जरासन्ध बहुत कुपित हुआ और उनका साथ ले कुण्डिनपुर पहुँचे और नागदेवकी वध करनेके अभिप्रायसे सौर्यपुरकी ओर चल पूजाके बहाने उद्यानमें आयी हुई रुक्मिणीको पड़ा। जब यादवोंको पता चला तब वे हरकर ले आये। युद्धमें शिशुपालको मार परस्पर मन्त्रणा कर सौर्यपुरसे पश्चिम दिशा- गिराया और रुक्मिणीके भाई रुक्मीर्का बन्दी की ओर चल दिये । विन्ध्याचलके वनमें एक बना लिया। रुक्मिणीके साप विधिवत देवीने कृत्रिम चिताएँ जलाकर तथा यादवोंके विवाह कर सुखसे रहने लगे ५०७-५१३ नष्ट होनेका मिथ्या समाचार सुनाकर जरा त्रिचत्वारिंशत्तम सर्ग सन्धको वापस लौटा दिया: ४९४-४९७ सत्यभामा और रुक्मिणीके सपत्नीभावका एकचत्वारिंशत्तम सर्ग वर्णन ५१४-५१६ समुद्र विजय आदिके द्वारा समुद्रकी शोभाका रुक्मिणी और सत्यभामाके गर्भका वर्णन अवलोकन ४९८-४९९ तथा दोनोंके पुत्रोंकी उत्पत्तिका निरूपण ५१६-५१७ कृष्णने अष्टमभक्त कर पंचपरमेष्ठीका ध्यान रुक्मिणीके पुत्रको पूर्वभवका वैरी 'धूमकेतु' किया। इन्द्र की आज्ञासे गौतम देवने समुद्र नामका असुर हरकर ले गया और खदिराको शीघ्र ही दूर हटा दिया और उस स्थल टवीमें तक्षशिलाके नीचे दबा आया। मेघकूट पर कुबेरने द्वारिकानगरीकी रचना कर दी। नगरका राजा कालसंवर विद्याधर अपनी श्रीकृष्णको नारायण और रामको बलभद्र स्त्री के साथ वहाँसे निकला और उस बालकस्थापित कर कुबेर अपने स्थानपर चला को लेकर अपने घर गया। उसका प्रद्युम्न गया । द्वारिकाका सुन्दर वर्णन ५००-५०३ नाम रखा ५१७-५१९ रुक्मिणीका विलाप, कृष्णके द्वारा दो गयी द्वाचत्वारिशत्तम सर्ग सान्त्वना, नारदका आगमन और सीमन्धर 'द्वारिकामें नारदका आगमन ५०४-५०५ स्वामी द्वारा पद्मरथ चक्रवर्तीके प्रश्नोत्तरमें नारदकी उत्पत्तिका वर्णन ५०५ प्रद्युम्नके पूर्व भवोंका वर्णन, नारदका मेघकूट नारद कृष्णके अन्तःपुरमें गये परन्तु सत्यभामा जाकर कालसंवरके यहाँ प्रद्युम्नको स्वयं अपनी साज-सजावटमें लीन थी अतः उठकर देखना और लौटकर कृष्ण तथा रुक्मिणीको उनका सत्कार नहीं कर सकी। नारदजीका सब समाचार सुनानेका वर्णन ५१८-५३२ मनोभाव बदल गया जिससे वे सत्यभामाका चतुश्चत्वारिंशत्तम सर्ग मान भग्न करनेके लिए किसी अन्य सुन्दर सत्यभामाके पुत्रका नाम भानुकुमार रखा कन्याकी खोज करनेके लिए चल पड़े ५०५-५०७ गया। श्रीकृष्णका जाम्बवती, लक्ष्मणा, अब वे कुण्डिनपुरमें स्थित राजा भीष्मके सुसीमा, गौरी, पद्मावती और गान्धारीके अन्तःपुरम पहुँचे। वहाँ रुक्मिणीको देख 'तू साथ विवाह हुआ ५३३-५३७ द्वारिकाधीश श्रीकृष्णकी पटराज्ञो हो' यह आशीर्वाद दे उसका मन श्रीकृष्णकी ओर पञ्च चत्वारिंशत्तम सर्ग आकृष्ट कर चल दिये और रुक्मिणीका चित्र- किसी समय यादवोंके भानेज युधिष्ठिर, भीम, पट ले श्रीकृष्णके पास पहुँचे. श्रीकृष्णका अर्जुन, सहदेव और नकुल द्वारिका आये। अनुराग बढ़कर चरम सीमापर पहुँच यादवोंने उनका अच्छा सत्कार किया। कुरुरहा था, उसो समय रुक्मिणीकी बुआका वंशके राजाओंका वर्णन करते हुए पाण्डवोंकी गप्त पत्र उन्हें मिला। कृष्ण बलभद्रको उत्पत्ति, पाण्डु के बाद दुर्योधनादि कौरवों और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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