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________________ विषय सूची विषय पृष्ठ विषय के पूर्वभवोंका सविस्तर वर्णन किया। इसी आया तो कृष्णने उसे भी पथिवीपर पछाड़ प्रकरणमें उन्होंने सर्वतोभद्र आदि अनेक उप कर समाप्त कर दिया ४५५-४६५ वासव्रतोंका स्वरूप वर्णन किया ४१९-४४७ कृष्ण अपने माता-पिता तथा समुद्रविजय पञ्चत्रिंशत्तम सगं आदिसे मिलकर प्रसन्न हुए। सुकेतु विद्या धरने कृष्णको अपनी पुत्री 'सत्यभामा' दी। अतिमुक्तक मुनिके मुखसे भगवान् नेमिनाथके जीवद्यशाके करुण विलापसे द्रवीभूत हो पूर्वभव सुनकर वसुदेव बहुत प्रसन्न हुए, क्रम जरासन्धने यादवोंको नष्ट करने के लिए अपने क्रमसे देवकीने मथुरामें तीन युगलके रूपमें भाई अपराजितको भेजा। जिसे कृष्णने अपने छह पुत्र उत्पन्न किये। जिन्हें इन्द्रकी आज्ञा बाणोंसे धराशायी कर दिया ४६६-४७० से नैगमदेव सुभदिल नगरके सुदृष्टि सेठके घर पहुँचाता रहा और उसके मृत पुत्रोंको देवकी सप्तत्रिंशत्तम सर्ग के पास छोड़ता रहा । सेठके यहाँ छहों पुत्रों भगवान् नेमिनाथके गर्भमें आनेके छह माह का लालन-पालन होता रहा ४४८-४४९ । पूर्वसे समुद्रविजयके घर रत्नोंकी वर्षा होने तदनन्तर देवकीने स्वप्न-दर्शनपूर्वक कृष्ण लगी। माता शिवा देवीने ऐरावत हाथी को गर्भमें धारण किया। भाद्रपद मास शुक्ला आदि सोलह स्वप्न देखे ४७१-४७४ द्वादशीको सात मासमें कृष्ण का जन्म हुआ। राजा समद्रविजयने स्वप्नोंका फल बतलाते वसुदेव उसे गुप्तरूपसे अपने विश्वासपात्र हुए कहा कि 'तुम्हारे तीर्थंकर पुत्र होगा' ४७४-४७७ नन्दगोपको सौंप आये और उसकी स्त्री अष्टत्रिंशत्तम सर्ग यशोदाकी पुत्रीको ले आये। पता चलनेपर देवोंने भगवान्के माता-पिताका अभिषेक कर कंसने उस पुत्रीकी नाक चपटी कर उसे छोड़ वस्त्राभूषणोंसे उनकी पूजा की । शिवा देवीदिया ४५०-४५२ का गूढ गर्भ वृद्धिको प्राप्त होने लगा । वैशाख श्रीकृष्ण नन्द और यशोदाके यहाँ बढ़ने शुक्ल त्रयोदशीको चित्रा नक्षत्र में भगवानका लगे । निमित्तज्ञानीके कथनसे शंकित हो जन्म हुआ। तीनों लोकोंमें हर्ष छा गया । कंस गुप्त रूपसे बढ़ते हुए अपने शत्रुकी खोज जन्म महोत्सव के लिए देवोंकी सात प्रकारकी करने लगा ४५२-४५४ सेना सौर्यपुर आयी ४७८-४८२ देवकी उपवासके बहाने कृष्णको देखनेके देवियोंके द्वारा जातकर्मका वर्णन ४८२-४८३ लिए गयी । कृष्णकी बालक्रीड़ा और लोको सौर्यपुरकी अद्भुत शोभा हो रही थी। इन्द्र त्तर पराक्रमका वर्णन भगवान्को ऐरावत हाथीपर विराजमान षट्त्रिंशत्तम सर्ग कर सुमेरु पर्वतकी ओर चला। इसी प्रसंगमें ऐरावत हाथीका वर्णन । हर्पमय वातावरणशरद् ऋतुका साहित्यिक वर्णन, श्रीकृष्णको में भगवानका जन्माभिषेक प्रारम्भ हुआ ४८३-४८६ मारनेके लिए कंसके विविध प्रयत्न, एकोनचत्वारिंशत्तम सर्ग मल्लयुद्ध के लिए कंसने कृष्णको मथुरा इन्द्र द्वारा भगवान्का स्तवन बुलाया, इससे शंकित वसुदेवने सौर्यपुरसे ४८७-४८९ देवों द्वारा शंखादि बादित्रांका वादन और समुद्रविजय आदि नौ भाइयोंको मथुरा बुला भगवान की परिचर्याका वर्णन .४९०-४९३ लिया। बलभद्र और श्रीकृष्णका कंसके मल्लोंके साथ युद्ध हुआ, जिसमें उन्होंने उन चत्वारिंशत्तम सर्ग मल्लोंको यमलोक पहुँचा दिया। कंस सामने यादवों द्वारा अपने भाई अपराजितका वध पा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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