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## Chapter Nineteen **295** The work is the independent path, the placement and the removal, and the rules for the Gandhara and the Odicya are all mentioned there. || 240 || In the Madhyama, there are six parts, excluding the Gandhara and the Saptama. There is only one removal and one placement, which is the Madhyama. || 241 || The Pancha-svayam is performed, excluding the Gandhara and the Saptama. Sometimes, the Shat-svayam is also performed, excluding the Gandhara. || 242 || Here, the work is to give prominence to the Shadja and the Madhyama, and the users should always avoid the Gandhara. || 243 || In the Madhyama-Odicya, there is only one Madhyama part, and the rest of the rules should be followed as in the Madhyama. || 244 || There are two parts in the Panchama, the Rishabha and the Panchama. There is one removal, which is the Panchama, and one placement, which is also the Panchama. || 245 || The rules of the Madhyama should be known here, as well as the Shadava and the Odavita. The Shadja, Gandhara, and Panchama should be made weak here. || 246 || The movement of the Panchama and the Rishabha should be done here. The movement of the Gandhara with the Panchama can also be done. || 247 || One Panchama part of the Gandhara-Panchama is mentioned, and the Panchama and the Rishabha are mentioned as its removals. || 248 || The Gandhara is the placement here, and it takes its previous note. The movement between the Panchama and the Gandhari is also done. || 249 || The Rishabha, Panchama, Gandhara, and Nishad are the four parts of the Andhri, and these are also the four removals. || 250 || The Gandhara is the placement, and the Shadava, which is without the Shadja, is the Shat-svayam. The movement between the Gandhara and the Rishabha takes place here. || 251 || Sometimes, the movement of the Shashta and the Saptama also takes place according to the movement of the placement. There is no avoidance of the Shadja here, and the Odavita is also present. || 252 ||
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________________ एकोनविंशः सर्गः २९५ कार्यः स्वन्तरमार्गश्च न्यासोऽपन्यास एव च । गान्धारोदीच्यवायास्तु तत्र सर्वो विधिः स्मृतः || २४०॥ मध्यमायाः भवेदंशौ विना गान्धारसप्तमौ । एक एव ह्यपन्यासो न्यासश्चैव तु मध्यमः || २४१॥ गान्धारसप्तमापेतं पञ्चस्वयं विधीयते । षट्स्वरं चाप्यगान्धारं कर्त्तव्यं तु प्रयोगतः ॥ २४२ ॥ षडजमध्यमयोश्चाऽत्र कार्य बाहुल्यमेव हि । गान्धारलङ्घनं चात्र नित्यं कार्यं प्रयोक्तृभिः ॥ २४३ ॥ मध्यमोदीच्यवायाः स्यादेको ह्यंशस्तु मध्यमः । शेषो विधिश्व कर्त्तव्यो मध्यमायास्तु यो भवेत् ॥ २४४॥ 'द्वावंशावथ पञ्चम्यामृषभः पञ्चमस्तथा । अपन्यासो भवेदेको न्यासश्चैव तु पञ्चमः ॥२४५॥ मध्यमाया विधिर्योत्र पाडवोडविते तथा । दौर्बल्यं चात्र कर्त्तव्यं षड जगान्धारपञ्चमैः ॥ २४६॥ कुर्यादत्र त संचारं पञ्चमस्यर्षभस्य च । । गान्धारगमनं चैव कुर्यादपि च पञ्चमैः ॥ २४७ ॥ अथ गान्धारपञ्चम्याः पञ्चमोऽशः प्रकीर्त्तितः । पञ्चमश्चर्षभश्चैव ह्यपन्यासः प्रकीर्त्तितः ॥२४८|| न्यासश्चैवात्र गान्धारः स च पूर्वस्वरो भवेत् । पञ्चम्यास्त्वथ गान्धार्याः संचरः संविधीयते ।। २४९ ।। ऋषभः पञ्चमश्चैव गान्धारोऽथ निषादवान् । चत्वारोऽशास्तथा ह्यान्ध्रया अपन्यासास्त एव च ॥ २५० ॥ गान्धारश्च तथा न्यासः षड जापेतश्च षाडवः । गान्धारर्षभयोश्वापि संचरस्तु परस्परम् || २५१|| सप्तमस्य च षष्ठस्य न्यासगत्यनुपूर्वशः । षड जस्य लङ्घनं चात्र नास्ति चौडवितं तथा ।। २५२ ।। ४ अंश जानना चाहिए। इसमें ऋषभके बिना छह स्वर होते हैं ॥ २३९ ॥ | इसमें अन्तरमार्ग, न्यास और अपन्यास करना चाहिए तथा उनमें गान्धारोदीच्यवाकी सब विधि स्मरणमें रखना चाहिए || २४०|| मध्यमामें गान्धार और सप्तमको छोड़कर षड्ज, ऋषभ, मध्यम, पंचम और धैवत ये पाँच अंश होते हैं। इसमें एक मध्यम ही अपन्यास तथा न्यास रहता है || २४१ || यहाँ गान्धार और सप्तमसे रहित पंचस्वयं किया जाता है और कभी प्रयोगवश गान्धारको छोड़कर षट्स्वयं भी किया जाता है || २४२ || इसमें प्रयोक्ताओं को षड्ज और मध्यम स्वरकी बहुलता करनी चाहिए तथा गान्धार स्वरका लंघन निरन्तर करना चाहिए - उसे छोड़ते रहना चाहिए || २४३ || मध्यमोदीच्यवा में एक ही मध्यम अंश होता है और शेष विधि जो मध्यमामें होती है वह इसमें करनी चाहिए || २४४ || पंचमी जातिमें ऋषभ और पंचम ये दो अंश होते हैं तथा ये ही दो अपन्यास होते हैं परन्तु न्यास एक पंचम ही होता है || २४५ || मध्यमाकी जो विधि बता आये हैं वह तथा षाडव और ओडवित इसमें भी जानना चाहिए तथा इसमें षड्ज गान्धार और पंचम स्वरको दुर्बल करना चाहिए ॥ २४६ ॥ | यहाँ पंचम और ऋषभ स्वरका संचार करना चाहिए तथा पंचम स्वर के साथ गान्धार स्वरका भी संचार किया जा सकता है || २४७॥ गान्धार पंचमीका एक पंचम अंश ही कहा गया है तथा पंचम और ऋषभ ये दो उसके अपन्यास कहे गये हैं || २४८ ॥ इसमें गान्धार न्यास होता है और वह अपने पूर्व स्वरको लिये हुए होता है। पंचमी और गान्धारी जातिका परस्पर संचार भी किया जाता है || २४९ || आन्ध्री जातिके ऋषभ, पंचम, गान्धार और निषाद ये चार अंश हैं तथा ये ही चार अपन्यास हैं || २५० ॥ गान्धार न्यास है, तथा षड्जसे रहित षाडव - षड्स्वयं है । यहाँ गान्धार और ऋषभ स्वरका परस्पर संचार होता है ।। २५१ ॥ कभी-कभी न्यासकी गतिके अनुसार षष्ठ और सप्तम स्वरका भी संचार होता है। इसमें षड्ज १. द्वादशावथ म. । द्वावंशावय पञ्चम्या भवतः पञ्चमर्षभो । अपन्यासो निषादश्च पञ्चमर्षभसंयुतः ॥ १२३ ॥ न्यासः पञ्चम एव स्यात् मध्यमर्षभहीनता । दुर्बलाश्चात्र कर्त्तव्या षड्जगान्धारमध्यमाः ||१२४॥ कुर्याच्चाप्यत्र संचारं मध्यमस्यर्षभस्य च । गान्धारगमनं चापं सप्तमात् संप्रयोजयेत् ॥ १२५ ॥ - ना. शा. अध्याय २८ । कैशिक्यास्तु भवन्त्यंशाः सर्वे चर्षभवर्जिताः । एत एवं ह्यपन्यासा न्यासो गान्धारसप्तमौ ॥१३७॥ धैवतेंऽशे निषादे च न्यासः पञ्चम इष्यते । - ना. शा. २८ अ । २. पञ्च दोषाः प्रकीर्तिताः म. ग. । ३. न्यासश्चैवानुगान्धारः म., ग. । ४. चैते ह्युपन्यासा ग । चैव ह्युपन्यासा म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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