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________________ एकोनविंशः सर्गः २८५ मुक्तश्च दु:खिना खिन्नः स खे श्यामामियुक्तया । स्वपुरं नीयमानोऽसौ तया खावनिरुद्गतः ॥११॥ 'खेटेऽस्यैवात्र लाभोऽस्ति भविष्यो मुञ्च सांप्रतम् । मञ्चितो यादवेन्द्रोऽसौ तया श्यामलछायया ॥११२॥ समय तं स्वविद्याया जगाम स्वगृहं प्रति । विद्यया पर्णलध्वायं गां शनैः पर्णवल्लघुः ॥१३॥ बाह्योद्यानेऽथ चम्पायाः पतितोऽम्बुजसंगमे । सरस्थम्बुरुहच्छन्ने तदुत्तीर्य तटीमितः ।।११४॥ मानस्तम्भादिसंलक्ष्यं वासपूज्यजिनालयम् । परीत्य तत्र वन्दित्वा दीपिकोज्ज्वलितेऽवसत् ।।११५।। देवार्चनार्थमायातं प्रत्यूषे द्विजमत्र सः । अपृच्छद्विषयः कोऽयं पुरीयं चेति सोऽवदत् ।।११६।। अङ्गो जनपदश्चम्पापुरी त्रिभुवनश्रता । किं न वेसि किमाकाशात्पतितस्त्वं महामते ॥११७॥ सत्यमेतद् द्विज! ज्ञातं किमु ज्योतिषविद् भवान् । अस्ति संवादि ते ज्ञानं नान्यथा जिनशासनम्॥११८॥ हृतो यक्षकुमारीभ्यां रूपलोभान्नमस्तलात् । च्युतश्च पतितो भूमावन्योन्यकलहे तयोः ॥११९॥ इत्युत्तरमसौ दत्वा विप्रवेषधरोऽमवत् । पुरी विशन् विशालाक्षो गन्धर्वनगरीनिमाम् ॥१२॥ लोकं वीक्ष्य तु तत्रासौ वीणाहस्तमितोऽमुतः। अप्राक्षीद्विप्रमेकं हि बम्भ्रमीतीति किं जनः ॥१२१।। सोऽब्रवीचारुदत्ताख्यः कुबेरविमवः प्रभुः । पुर्यामिभ्यपतिस्तस्य तनया रूपगर्विता ॥२२॥ नाम्ना गन्धर्वसेनेति गान्धर्वपथपण्डिता । गान्धर्व योऽत्र मे जेता स भर्तेत्यवतिष्ठते ।।१२३॥ तदर्थमत्र लोकोऽयं मिलितो लोमनोदितः । वीणावादनविज्ञानो नानादेशसमागतः ॥१२४॥ अन्तमें दुःखी होकर अंगारकने कुमारको छोड़ दिया। नीचे गिरनेके भयसे कुमार कुछ खिन्न हुए परन्तु श्यामाके द्वारा नियुक्त श्यामलछाया नामको दासी उन्हें बीच में हो संभालकर अपने नगर ले जाने लगी। उस समय यह आकाशवाणी हुई कि कुमारको इसो ग्राममें लाभ होनेवाला है इसलिए इस समय यहीं छोड़ दो। आकाशवाणीके अनुसार श्यामलछाया कुमारको अपनी पर्णलध्वी नामक विद्याके लिए सौंपकर अपने घर चली गयी और कुमार उस पर्णलघ्वो विद्याके द्वारा पत्तेके समान लघु शरीर होकर धीरे-धीरे पृथिवीकी ओर आये ॥१११-११३।। तदनन्तर कुमार वसुदेव, चम्पानगरीके बाह्योद्यानमें कमलोंसे ढंका हुआ जो कमल सरोवर था उसमें गिरे। तालाबसे निकलकर वे तटपर आये ।।११४|| सरोवरके तटपर मानस्तम्भ आदिसे युक्त श्रीवासुपूज्य भगवान्का मन्दिर था। वसुदेवने पास जाकर प्रदक्षिणा दी, वन्दना की और उसके बाद दीपिकाओंके प्रकाशसे प्रकाशित उसी मन्दिरमें वह बस गये ॥११५।। प्रात:काल भगवानकी पूजाके लिए एक ब्राह्मण आया तो वसुदेवने उससे पूछा कि यह कौन देश है ? तथा कौन नगरी है ? इसके उत्तरमें ब्राह्मणने कहा कि यह अंगदेश है और यह तीन लोक में प्रसिद्ध चम्पा नगरी है । इसे क्या तुम नहीं जानते ? अरे महाविद्वन् ! क्या तुम यहां आकाशसे पड़े हो ? ||११६-११७।। इसके उत्तरमें वसुदेवने कहा कि हे ब्राह्मण ! आपने बिलकुल ठीक जाना । क्या आप ज्योतिष जानते हैं ? आपका ज्ञान संवादीयथार्थज्ञान है। अहा ! जिनशासन अन्यथा नहीं हो सकता ।।११८॥ रूपके लोभसे दो यक्ष कुमारियां मुझे हरकर ले गयी थीं; उनका आपसमें झगड़ा होने लगा और मैं छूटकर आकाशसे पृथिवीपर गिरा हूँ !|११९|| यह उत्तर देकर विशाल नेत्रोंके धारक वसुदेवने ब्राह्मणका वेष रख गन्धर्वनगरीके समान उस चम्पापुरीमें प्रवेश किया ॥१२०॥ वहां उन्होंने जहां-तहाँ वीणा हाथमें लिये मनुष्योंको देखकर एक ब्राह्मणसे पूछा कि ये लोग इधर-उधर क्यों घूम रहे हैं ? ।।१२।। ब्राह्मणने कहा कि इस नगरीमें कुबेरके समान वैभववाला एक चारुदत्त नामका सेठ रहता है। उसकी गन्धर्वसेना नामकी पुत्री है। वह पुत्री सौन्दर्यके गर्वसे युक्त है, गन्धर्वशास्त्रमें अत्यन्त निपुण है तथा उसने यह नियम किया है कि जो मुझे गन्धर्वशास्त्र-संगीतशास्त्रमें जीतेगा वह मेरा पति होगा ।।१२२-१२३।। लोभसे प्रेरित, वीणा बजानेमें निपुण, तथा नाना देशोंसे आये हुए ये १. खेटस्यैवात्र म. । २. समर्पितः म., ग., ङ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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