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________________ २८४ हरिवंशपुराणे स्वं बुद्ध्वा हियमाणं खे खेचरं स निरीक्षितम् । कस्त्वं हरसि मां पाप मुञ्च मुञ्चेति भाषणः ॥१९॥ बुद्ध्वाप्यङ्गारकं शत्रु श्यामया कथिताकृतिम् । नावधीद् बद्धमुष्टिः खादधःपतनशङ्कया ॥१०॥ तावच्च सहसा बुद्ध्वा खड गखेटकहस्तया । वेगिन्या प्राप्तया रुद्धः शौरिबध्वा स शूरया ॥१०१॥ तिष्ठ तिष्ठ दुराचार चौरखेचर निघृण । हरसि प्राणनाथं मे जीवन्त्यां मयि भोः कथम् ॥१.२॥ राज्यस्थोऽपि न संतुष्टः सदास्मदुःखचिन्तकः' । चिरेणाद्य मया दृष्टः क्व प्रयासि मृतोऽधुना ॥१०३॥ इति व्याहृत्य रुद्ध्वाग्रे खड गमुद्गीर्य तां स्थिताम् । बमाण 'रिपुरात्मानं रक्षन् राक्षसरूक्षवाक् ॥१०४॥ श्यामिके स्त्रीवधो लोके गर्हितोऽपसराधमे । स्वसापि मे कथं हस्तो हन्तुमुद्यच्छतु त्वकाम् ॥१०५॥ का स्त्री का वा स्वसा भ्राता को 4 कार्याभिलाषिणः । वैरिणो ननु हन्तारो हन्तव्या नात्र दुर्यशः ॥१०६॥ सिंही व्याघ्री च किं पुंसां मारयन्ती न मार्यते । वृथा न्यायविचारोऽयं जहि यद्यस्ति पौरुषम् ॥१०७॥ विद्याशाखाबलेनोत्था रुद्धमागां जघान सः । खड गधाराशिलाघातैः श्यामामङ्गारकोत्करः ॥१०८॥ प्रतिघातमनेकाभूत्खड्गखेटकसंकटा । खड गस्यूतस्फुलिङ्गाङ्गमङ्गारकमथाकरोत् ॥१०९॥ मायायुद्धमिदं दृष्ट्वा तयोः स हृदये रिपुम् । दृढमुष्टिप्रहारेण प्राणसंदेहमावहत् ॥१०॥ हुआ जानकर वसुदेवने आकाशमें उस विद्याधरसे कहा कि अरे पापी! तू कौन मझे हरे लिये जा रहा है छोड़-छोड़ ॥९१॥ यद्यपि वसुदेवने उसे जान लिया था कि यह श्यामाके द्वारा बताये हुए आकारको धारण करनेवाला शत्रु अंगारक है फिर भी आकाशसे नीचे गिरनेकी आशंकासे उन्होंने उसे मुट्ठियोंकी मारसे मारा नहीं ॥१००।। इतनेमें ही सहसा जागकर तथा तलवार और ढाल थमें ले वीरांगना श्यामाने बड़े वेगसे जाकर उसे रोका ॥१०१ श्यामाने ललकारते हए कहा कि ठहर, ठहर. अरे दराचारी.निर्दय! चोर विद्याधर ! त मेरे जीवित रहते हए मेरे प्राणनाथको कैसे हर सकता है ? ॥१०२॥ तू राज्यपर बैठकर भी सन्तुष्ट नहीं हुआ। सदा हमारे दुःखका ध्यान रखता है ! तू आज मुझे चिरकाल बाद दिखा है, कहाँ जाता है ? तू अभी मारा जाता है ॥१०३।। यह कहकर श्यामाने उसका मार्ग रोक लिया और तलवार उभारकर वह उसके आगे खड़ी हो गयी। तदनन्तर राक्षसके समान रुक्ष वचनोंका प्रयोग करनेवाला शत्रु अपनी रक्षा करता हुआ श्यामासे बोला ॥१०४॥ अरी नीच श्यामा ! संसारमें स्त्रीका मारना निन्दित समझा जाता है इसलिए तू सामनेसे हट जा । तू मेरी बहन भी है अतः तुझे मारनेके लिए मेरा हाथ कैसे उठे ?॥१०५॥ अथवा कार्यके इच्छुक मनुष्योंके लिए क्या स्त्री ? क्या बहन ? क्या भाई ? उन्हें तो जो वैरी अपना घात करे उसका अवश्य ही घात करना चाहिए इसमें कुछ भी अपयश नहीं है ।।१०६॥ क्या पुरुषोंको मारनेवाली सिंही और व्याघ्री नहीं मारी जाती? इसलिए न्यायका विचार करना व्यर्थ है । यदि तुझमें पौरुष है तो मार ॥१०७॥ तदनन्तर जिसने विद्यारूपी शाखाके बलसे उठकर अंगारकका मार्ग रोग रखा था ऐसी श्यामाको अंगारोंके समूहके समान उग्र अंगारक, तलवारको धार और पत्थरोंकी चोटसे मारने लगा ॥१०८।। प्रत्येक चोटके समय तलवार और ढालकी करारी टक्कर होती थी। कुछ समय बाद श्यामाने तलवारसे निकले हुए तिलंगोंके द्वारा अंगारकके शरीरको आच्छादित कर दिया ॥१०९॥ श्यामा और अंगारकके इस माया युद्धको देखकर कुमार वसुदेवने भी शत्रुके हृदयपर अपनी मुट्टियोंसे इतना दृढ़ प्रहार किया कि उसे प्राणोंका सन्देह उत्पन्न कर दिया ॥११०।। १. दुःखचिन्तक म.। २. रिपुमात्मानं म.। ३. -मुद्यत्कृतित्विकाम् म. । ४. अङ्गारकस्य उत् ऊर्ध्वः करो हस्त: अङ्गारकोत्करः अन्यत्र अङ्गारकसमूहः । ५. घातं घातं प्रति, प्रतिघातम् । अन्योऽन्यप्रतिघातोऽभूत्खड़गखेटकसंकट: म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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