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________________ २८० हरिवंशपुराणे संप्राप्य प्रातराक्रन्दमुखरो वीक्ष्य भस्मनि । कुमारामरणं तत्र रुदित्वा मृत इत्यसौ ॥५०॥ पात्तापहतो दुःखी स कृतोचिततक्रियः । निन्दन् मन्दोद्यमः स्वं च वञ्चितोऽहमिति स्थितः ॥५१॥ वसुदेवस्तु निःशङ्को गृहीत्वा पश्चिम दिशम् । द्विजवेषधरो धीरो योजनानि बहन्ययात् ॥५२॥ प्रापद् विजयखेटाख्यं पुरं खेटपुरोपमम् । क्षत्रियान्वयजेनात्र दृष्टो गन्धर्वसूरिणा ॥५३॥ सग्रीव इत्यनग्राही गान्धर्वाथिजनस्य सः । वीक्ष्यैवाकारमेतस्य वशीकृत इवामवत् ॥५४॥ कन्यानन्यसमा तस्य सोमा सोमसमानना । अन्या विजयसेनाख्या रूपपारमिते शभे ॥५५॥ गन्धर्यादिकलापारं प्राप्तयोः स तयोः पिता । गान्धर्व योऽनयोर्जेता स भत्तत्यमिमन्यते ॥५६॥ लक्ष्य योगेन यत्र यत्र तयोर्जयः । तत्र तत्र समामध्ये ते जिगाय स यादवः ॥५॥ सुगीवेण सतोषेण कन्ये दत्तं ततः शभे । परिणीय मुदा रेमे प्रासादवरभूमिषु ॥५४॥ सूनं विजयसेनायानुत्पाद्याक्रासंज्ञकम् । शौरिः शौर्यसहायोऽयादविज्ञातविनिर्गतः ॥५९॥ गच्छन्मार्गवशात् क्वापि प्रविवेश महाटवीम् । अपश्यच्च सरो रम्यं हंससारसवारिजैः ॥६॥ नाम्ना त स जलावर्तमवगाह्य महासरः । शीतं प्रपाय पानीयं सस्नौ तत्र चिरन्तनम् ॥११॥ जल गुरजनि?ष समवादयदुन्नतः । निशम्य रवमुत्तस्थौ तत्र सुप्तो महागजः ॥६॥ भाई तथा अन्य यदुवंशियोंके साथ श्मशान गये। उस समय सबके मुखसे रोनेकी ध्वनि निकल रही थी। जब प्रातःकाल राखमें कुमारके आभूषण देखे तब 'कुमार निश्चित ही मर गये हैं' यह जानकर सब रोने लगे। राजा समुद्रविजय पश्चात्तापसे पीड़ित हो बहुत दुःखी हुए। उन्होंने ___ मरणोत्तर कालको सब क्रियाएं कीं, अपने-आपकी बहुत निन्दा की और हम भाईसे वंचित हुए हैं इस खेदसे उनका उद्यम कुछ मन्द पड़ गया ॥४९-५१॥ इधर धोर-वीर वसुदेव निःशंक हो पश्चिम दिशाकी ओर चल पड़े और एक ब्राह्मणका वेष रखकर बहुत योजन दूर निकल गये ॥५२॥ चलते-चलते वे देवोंके नगरके समान सुन्दर विजयखेट नामक नगरमें पहुंचे। वहाँ क्षत्रियवंशमें उत्पन्न सुग्रीव नामका एक गन्धर्वाचार्य रहता था। वह गन्धर्वाचार्य संगीत विद्याके इच्छक मनुष्योंका बडा उपकारी था तथा वसदेवका रूप देखकर उनका वशीभूत जैसा हो गया ॥५३-५४॥ उस गन्धर्वाचार्यकी, रूपमें अपनी शानी न रखनेवाला चन्द्रमुखी सोमा और विजयसेना नामकी दो उत्तम पुत्रियाँ थीं। ये पुत्रियां सौन्दर्यको परम सोमाको प्राप्त हुई-सो जान पड़तो थीं ॥५५॥ ये कन्याएँ गन्धर्व आदि कलाओंकी परम सीमाको प्राप्त थीं इसलिए उनके पिता सुग्रोवने अभिमानवश ऐसा विचार कर लिया था कि जो गन्धर्व-विद्यामें इन दोनोंको जीतेगा वही इनका भर्ता होगा ॥५६॥ लक्ष्यलक्षणके योगसे अन्यत्र जिन-जिन विषयोंमें उन दोनों कन्याओं की जीत हुई थी उन्हीं-उन्हीं विषयोंमें सभाके बीच वसुदेवने उन कन्याओं को पराजित कर दिया ।।५७।। तदनन्तर सुग्रीवने सन्तुष्ट होकर अपनी दोनों कन्याएँ वसुदेवके लिए दे दी। वसुदेव उन्हें विवाह कर महलकी उत्तम भूमियोंमें आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करने लगे !।५८।। शूरवोरता ही जिनकी सहायक थी ऐसे वसुदेव, विजयसेना नामक स्त्रो में अक्रूर नामक पुत्र उत्पन्न कर अज्ञात रूपसे बाहर निकल गये ।।५९|| मार्गके अनुसार भ्रमण करते हुए उन्होंने एक बहुत बड़ी अटवीमें प्रवेश किया और वहाँ हंस, सारस तथा कमलोंसे सुशोभित एक सुन्दर सरोवर देखा ॥६०॥ जलावर्त नामके उस महासरोवर में प्रवेश कर वसुदेवने ठण्डा पानी पिया तथा चिरकाल तक स्नान किया ॥६१।। तदनन्तर अतिशय उन्नत शरीरके धा वहाँ जलको इस तरह बजाया कि जिससे मृदंगके समान शब्द निकलता था। उस शब्दको सुनकर वहाँ सोया हुआ एक बड़ा हाथी उठकर खड़ा हो गया ॥६२।। मारनेके लिए आनेवाले उस हाथीको - चन्द्रतुल्यवदना। २. नाम्नान्तः स- म. । ३. पीत्वा । ४. समबाहयदुन्नतः म. । सुदेवने Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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