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________________ २७८ हरिवंशपुराणे इत्याकर्ण्य नृपः प्राह पौरप्राग्रहरानिति । ब्रूत वीतभया दुःखं यूयं मह्यं हिता यदि ॥२४॥ आधिाधिरिवाल्पोऽपि हृदये कृतसंनिधिः । प्राणकारणमप्यन्नं प्रतिहन्ति न संशयः ॥२५॥ इत्युक्तास्तेन ते प्रोचुरिति विस्रम्भमागताः । दुविज्ञप्तिमिमा राजन् निर्बुध्यस्व प्रजाहितम् ॥२६॥ वसुदेवकुमारस्य नित्यं निःसरतः पुरात् । रूपदर्शनविभ्रान्ता विस्मरन्ति वपुः स्त्रियः ॥२७॥ निर्गमे च प्रवेशे च कुमारस्यान्यदङ्गनाः । न पश्यन्ति न शृण्वन्ति भवन्ति विकलेन्द्रियाः ॥२८॥ तिष्ठन्तु तावदन्यानि स्वानुष्टेयानि योषिताम् । स्तनंधयस्तनादानं रागान्धानां सुविस्मृतम् ॥२९॥ अतिरूपतमो धीरः स्वभावस्वच्छमानसः । सर्वोपधाविशुद्धारमा कुमारः शीलशेखरः ॥३०॥ नृप ! कस्य न विज्ञातस्समस्ते वसुधातले । तथापि किं वयं कुर्मो चित्तोद्धान्तममृत्पुरम् ॥३१॥ यदत्र युक्तमाधातुं तत्त्वमेव निरूपय । यथास्वन्तं पुरस्येश ! कुमारस्य च जायते ॥३२॥ तन्निशम्य वचो राजा विचिन्त्य चिरमारमनि । तथेति प्रतिपद्यतान् विससर्ज ययुश्च ते ॥३३॥ पर्यट्य चिरमागत्य प्रणतं भ्रातरं नृपः । आलिङ्ग्याङ्क तमारोप्य स्नेहेनाघ्राय मस्तके ॥३४॥ श्रोन्तोऽत्यन्तं कुमार ! त्वं चिरं श्रान्त्वा वनान्तरम् । विवर्ण! क्षत्पिपासात ! किमित्येवं चिरायितम्॥३५॥ वातातपपरिम्लानः शिरःशेखरनीरुचिः । अगणय्य वपुःखेदं पर्यटस्यटनप्रियः ॥३६॥ प्रकार अपना पेट फाड़कर नहीं दिखाया जा सकता उसी प्रकार वह थोड़ा-सा दुःख भी नहीं प्रकट किया जा सकता ।।२३।। __इस प्रकार सुनकर राजा समुद्रविजयने नगरके वृद्धजनोंसे कहा कि यदि आप लोग हमारा हित चाहते हैं तो निर्भय होकर वह दुःख कहिए॥२४।। क्योंकि हृदयमें रहनेवाली छोटी-सी मानसिक व्यथा भी शारीरिक व्यथाके ही समान, प्राण-रक्षाका कारण जो अन्न है उसे भी छुड़ा देती है इसमें संशय नहीं है। भावार्थ-मानसिक पीड़ाके कारण मनुष्य खाना-पीना भी छोड़ देता है ।।२५।। इस प्रकार समुद्रविजयके कहनेपर प्रजाके लोग विश्वस्त हो कहने लगे। उन्होंने कहा कि हे राजन् ! हमारी विज्ञप्ति, विज्ञप्ति नहीं किन्तु दुर्विज्ञप्ति है परन्तु प्रजाके हितके लिए उसे अवश्य सुनिए ।॥२६॥ वसुदेवकुमार प्रतिदिन नगरसे बाहर निकलते हैं जिससे नगरकी स्त्रियाँ उनका रूप देखकर पागल-सी हो जाती हैं और अपने शरीरको सुध-बुध भूल जाती हैं ॥२७॥ कुमारके बाहर निकलने और भीतर प्रवेश करनेके समय स्त्रियाँ इन्द्रियोंसे रहित जैसी हो जाती हैं इसलिए वे न अन्य किसीको देखती हैं और न अन्य कुछ सुनती हो हैं ॥२८॥ स्त्रियोंके अपने करने योग्य दूसरे काम तो दूर रहें परन्तु रागान्ध होकर वे छोटे-छोटे बच्चोंके लिए स्तन देनादूध पिलाना भी भूल जाती हैं ।।२९।। हे राजन् ! यद्यपि कुमार वसुदेव, अत्यन्त सुन्दर, धीरवीर, स्वभावसे स्वच्छ हृदयके धारक, सर्वप्रकारसे विशुद्ध आत्मासे युक्त और शीलके शिरोमणि हैं ।।३०।। यह समस्तं पृथिवीतलपर किसे नहीं विदित है ? फिर भी हम क्या करें ? नगरवासियोंका चित्त उद्भ्रान्त हो रहा है ॥३१॥ हे स्वामिन् ! हम लोगोंने अपनी मनोव्यथा कही अब यहाँ जो कुछ करना उचित हो तथा जिससे नगर और कुमार दोनोंका परिणाम अच्छा हो वह आप ही कहिए ॥३२॥ राजा समद्रविजयने नगरवासियोंकी बात सुनकर चिरकाल तक अपने-आपमें उसका विचार किया, उसके बाद सबको आश्वासन देकर विदा किया और आश्वासन पाकर नगरवासी यथास्थान चले गये ॥३३।। उसो समय भाई वसुदेवने चिरकाल तक भ्रमण करनेके बाद आकर राजा समुद्रविजयको प्रणाम किया। समुद्रविजयने उनका आलिंगन कर गोदमें बैठाया और स्नेहसे मस्तक सूंघते हुए कहा कि कुमार! तुम चिरकाल तक वनके मध्य में भ्रमण करनेसे अत्यन्त थक गये हो। देखो, तुम्हारा वर्ण फीका पड़ गया है और तुम भूख-प्याससे पीड़ित जान पड़ते हो। १. शोभनपरिणामः । २. भ्रान्तोऽत्यन्तं म. । ३. परिम्लानशिरः -म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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