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________________ एकोनविंशः सर्गः २७७ अन्यदा पुरवृद्धास्ते समुद्र विजयं नृपम् । नत्वा व्यजिज्ञपग्निस्थमुपांशु 'पिशुनान्तराः ॥१४॥ अभयं नः प्रदाय त्वं शृणु विज्ञापनं विमो । युक्तं वा यदि वायुकं बालस्येव वचः पिता ॥१५॥ नृपस्त्वं रक्षणाक्षणां भूपो रक्षणतो भुवः । त्वमेव जगतो राजा राजन् ! प्रकृतिरञ्जनात् ॥१६॥ स्वयि राजनि राजन्ते जनितप्रमदाः प्रजाः । अक्षुद्रोपद्वाः पूर्व पितरीव तवाधुना ॥१७॥ उर्वरा सर्वसस्यौपः शालिग्रीह्यादिभिर्वरैः । अवग्रहोज्झितैर्धत्ते प्रतिवर्षमवन्ध्यताम् ॥१॥ यथा कृषिस्तथास्यर्थ वणिज्या फलति प्रभो । क्रय विक्रयबाहुल्याद् वणिजां राज्यमूर्जितम् ॥१०॥ घटोऽन्यो घटपूरं हि गोमहिष्युद्घधेनवः । दुहन्ति सततं दुग्धं प्रभूताः सुहितास्तृणैः ॥२०॥ गृहार्थमन्नमस्यल्प प्रसाधितमयत्नतः । नान्तमेति दिनान्तेऽपि दानधर्मात्मभुक्तिभिः ।।२१।। स्वस्वभावविभक्तान्यभावे षष्टेयब्दवस्तुनि' । त्वत्प्रमावाचिरस्थैर्यः कालो दुन्दुभिरेव नः ॥२२॥ एवं सति सुख दुःखं स्वल्पं तदपि भूपते । न प्रकाशयितुं शक्यं यथात्मोदरपाटनम् ॥२३॥ ऐसा समस्त नगर उस समय भीतर-बाहर उद्भ्रान्त हो गया था तथा जहां-तहाँ एक वसुदेवको ही कथा सुनाई देती थी ॥१३॥ तदनन्तर किसी समय जिनके हृदय मात्सर्यसे परिपूर्ण थे ऐसे वृद्धजन राजा समुद्रविजयके पास जाकर तथा नमस्कार कर एकान्तमें इस प्रकार निवेदन करने लगे ॥१४॥ उन्होंने कहा कि हे प्रभो ! जिस प्रकार बालकके वचन चाहे युक्त हों चाहे अयुक्त, उन्हें पिता सुनता ही है उसी प्रकार आप हम लोगोंको अभय देकर हमारे वचन सुनिए। हमारे वे वचन भले ही युक्त हों अथवा अयुक्त हों ।।१५।। हे नाथ ! आप मनुष्योंकी रक्षा करते हैं इसलिए नृप हैं, पृथिवीकी रक्षा करते हैं इसलिए भूप हैं और प्रजाको अनुरंजित करते हैं इसलिए आप ही राजा हैं ॥१६॥ जिस प्रकार पहले आपके पिताके राज्य-कालमें प्रजा सानन्द तथा क्षुद्र उपद्रवोंसे रहित थी उसी प्रकार इस समय आपके राज्य-कालमें भी प्रजा सानन्द तथा क्षुद्र उपद्रवोंसे रहित है ॥१७॥ यहाँको उपजाऊ भूमि वर्षाके प्रतिबन्धसे रहित शालि, ब्रीहि आदि सब प्रकारके उत्तमोत्तम धान्योंके समूहसे प्रतिवर्ष सफलताको धारण करती है ।॥१८॥ हे प्रभो! जिस प्रकार खेतो सफल रहती है उसी प्रकार वाणिज्य भी सफल रहता है। आपका राज्य व्यापारियों के क्रय-विक्रयकी अधिकतासे अत्यधिक सम्पन्न हो रहा है ॥१९॥ घटके समान बड़े-बड़े स्तनोंको धारण करनेवाली एवं हरे-भरे तृणोंसे सन्तुष्ट बहुत-सी गायें, भंसे और उत्तम जातिको धेनुएँ निरन्तर घड़े भरभरकर दूध देती हैं ॥२०॥ घरके उपयोगके लिए साधारण रीतिसे तैयार किया हुआ थोड़ा-सा अन्न भी, दानके समय धर्मात्माओंके भोजनमें आनेसे सायंकालतक भी समाप्त नहीं होता ॥२१॥ हे नाथ ! साठ संवत्सरी रूप जो वस्तु है उसमें स्वभाववश ही अन्यथा परिणमन होता रहता है परन्तु आपके प्रभावसे हमलोगोंका तो दुन्दुभि नामक काल ही चिरकालसे स्थिर है । भावार्थज्योतिष-शास्त्रके अनुसार साठ संवत्सर होते हैं जो क्रमसे परिवर्तित होते रहते हैं, उनमें हानिलाभ सभी कुछ होते हैं। परन्तु उन संवत्सरोंमें एक दुन्दुभि नामका संवत्सर भी होता है जिसमें प्रजाका समय आनन्दसे बीतता है। प्रजाके लोग राजा समुद्रविजयसे कह रहे हैं कि यद्यपि संवत्सर परिवर्तनशील हैं परन्तु हमारे लिए आपके प्रभावसे दुन्दुभि नामक संवत्सर ही चिरस्थायी होकर आया है ।।२२।। हे राजन् ! इस प्रकार सुखके रहते हुए थोड़ा-सा दुःख भी है परन्तु जिस १. पिहितान्तरा: म. । २. विज्ञापनां म. । ३. प्रमदाः सफलाः म.। ४. वृष्टिप्रतिबन्धरहितः । ५. सुतप्ताः । ६. क्षयकृन्नास्ति षष्टिसंवत्सरीरूपे काले सत्यपि इति ख. पुस्तकं विहाय सर्वत्र टिप्पणी। ७. 'सर्वसस्ययुता धात्री पालिता धरणीधरैः। पूर्वदेशविनाशः स्यात्तत्र दुन्दुभिवत्सरे'॥ इति वर्षप्रबोधे । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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