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________________ अष्टादशः सर्गः २६३ अभिचन्द्र इहाख्यातो वसुदेवश्च ते दश । 'दशार्हाः सुमहाभागाः सर्वेऽप्यन्वर्थनामकाः ॥१४॥ कुन्ती मद्री च कन्ये द्वे मान्ये स्त्रीगुणभूषणे । लक्ष्मीसरस्वतीतुल्ये भगिन्यौ वृष्णिजन्मनाम् ॥१५॥ राज्ञो भोजकवृष्णेर्या पत्नी पद्मावती सुतान् । उग्रसेनमहासेनदेवसेनानसूत सा ॥१६॥ सुवसोस्स्वभवत्सूनुः कुञ्जरावर्त्तवर्तिनः । बृहद्रथ इति ख्यातो मागधेशपुरेऽवसत् ॥१॥ तस्मादप्यङ्गजो जातस्ततो दृढेरथोऽङ्गजः । तस्मान्नरवरो जज्ञे ततो दृढ रथस्ततः ॥१८॥ जातः सुखरथस्तस्माद्दीपनः कुलदीपनः । सूनुः सागरसेनोऽस्मान्सुमित्रो वप्रथुस्ततः ॥१९॥ विन्दुसारः सुतस्तस्मादेवगर्भस्तदर्भकः । ततः शतधनुर्वीरो धनुर्धरपुरःसरः ॥२०॥ क्रमात् शतसहस्रेषु व्यतिक्रान्तेषु राजसु । जातो निहतशत्रुः स सुतः शतपतिनृपः ॥२१॥ जातो बृहद्रथो राजा ततो राजगृहाधिपः । तस्य सूनुर्जरासन्धो वशीभूतवसुंधरः ॥२२॥ स रावणसमो भूत्या त्रिखण्डमरताधिपः । नवमः प्रतिशत्रूणां सुरश्रीसदृशोजसाम् ।।२३॥ मध्ये कालिन्दसेनाख्या महिषी महिषीगणा । तनयाः सनयास्तस्य ते कालयवनादयः ॥२४॥ अपराजित इत्याद्या भ्रातरश्चक्रवर्तिनः । हरिवंशमहावृक्षशाखायाः फलितात्मनः ॥५॥ एकस्या एकवीरोऽयं धारको धरणीपतिः । बहुविद्याधरेन्द्रागां दक्षिणश्रेग्युपाश्रिताम् ॥२६॥ संहति नृपसिंहोऽसौ शास्ति राजगृहे स्थितः । उत्तरापथभूपालाः दक्षिणापथभूभृतः ॥२७॥ पूर्वापरसमुद्रान्ता मध्यदेशाश्च तद्वशाः । भूचरैः खेचरैः सर्वैः शेखरीकृतशासनः ॥२८॥ ९ अभिचन्द्र और १० वसुदेव । ये सभी पुत्र योग्य दशाके धारक, महाभाग्यशाली और सार्थक नामोंसे युक्त थे ॥१३-१४॥ उक्त पुत्रोंके सिवाय कुन्ती और मद्री नामको दो कन्याएँ भी थीं जो अतिशय मान्य थीं, स्त्रियोंके गुणरूपी आभूषणोंसे सहित थी, लक्ष्मी और सरस्वतीके समान जान पड़ती थीं और समुद्रविजयादि दश भाइयोंको बहनें थीं ॥१५॥ राजा भोजकवृष्णिकी जो पद्मावतो नामकी पत्नी थी उसने उग्रसेन, महासेन तथा देवसेन नामक तीन पुत्र उत्पन्न किये थे ।।१६।। राजा वसुका जो सुवसु नामका पुत्र, कुंजरावतपुर ( नागपुर ) में रहने लगा था उसके बृहद्रथ नामका पुत्र हुआ और वह मागधेशपुरमें रहने लगा।।१७। बृहद्रथके दृढ रथ नामका पुत्र हुआ। दृढ रथके नरवर, नरवरके दृढरथ, दृढ रथके सुखरथ, सुखरथके कुलको दीप्त करनेवाला दीपन, दीपनके सागरसेन, सागरसेनके सुमित्र, सुमित्रके वप्रथु, वप्रथुके विन्दुसार, विन्दुसारके देवगर्भ और देवगर्भके शतधनु नामका वीर पुत्र हुआ। यह शतधनु धनुर्धारियों में सबसे श्रेष्ठ था ॥१८-२०॥ तदनन्तर क्रमसे लाखों राजाओंके व्यतीत हो जानेपर उसो वंशमें निहतशत्रु नामका राजा हुआ। उसके शतपति और शतपतिके बृहद्रथ नामका पुत्र हुआ। यह राजगृह नगरका स्वामी था। बृहद्रथके पृथिवीको वश करनेवाला जरासन्ध नामका पुत्र हुआ ॥२१-२२॥ वह विभूतिमें रावणके समान था, तीन खण्ड भरतका स्वामी था और देवोंके समान प्रतापी प्रतिनारायणोंमें नौंवाँ नारायण था ॥२३॥ अनेक स्त्रियोंके बीच उसकी कालिन्दसेना नामकी पट्टरानी थी जो पट्टरानियोंके समस्त गुणोंसे सहित थी। राजा जरासन्धके कालयवन आदि अनेक नीतिज्ञ पुत्र थे॥२४॥ चक्रवर्ती जरासन्धके अपराजित आदि अनेक भाई थे जो हरिवंशरूपी महावृक्षकी शाखापर लगे हुए फलोंके समान जान पड़ते थे ।।२५॥ राजा जरासन्ध अपनी अद्वितीय माताका अद्वितीय वीर पुत्र था । वह राजसिंह, राजगृह नगरमें स्थिर रहकर ही दक्षिण श्रेणी में रहनेवाले समस्त विद्याधर राजाओंके समूहपर शासन करता था। उत्तरापथ और दक्षिणापथके समस्त राजा, पूर्व-पश्चिम समुद्रोंके तट तथा मध्यके समस्त देश उसके वशमें थे। समस्त भूमिगोचरी और समस्त विद्याधर उसकी आज्ञाको शेखरके समान शिरपर धारण करते १. दशया अर्हाः योग्याः पूज्याश्च । २. दृढरथोग्रजः म. । ३. नयेन सहिताः सनयाः । ४. भूभृताम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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