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________________ २४८ विषय सूची विषय पृष्ठ विषय का पुत्र हुआ और दक्षकी इला नामक रानीसे आयु, इनका आकार, अवगाहना, जीवसमास, ऐलेय नामक पुत्र और मनोहरी नामकी इन्द्रियोंका आकार तथा उनके विषय क्षेत्र कन्या हुई। आदिका वर्णन २६४-२६९ राजा दक्षने अपनी पुत्री मनोहरीकी सुन्दरता- अन्धकवृष्णिके भवान्तरका वर्णन २६९-२७० से रीझकर उसे अपनी स्त्री बना लिया। अन्धकवृष्णिके समुद्रविजय आदि दस पुत्रोंके इस घटनासे राजा दक्षकी स्त्री इला पतिसे भवान्तरोंका निरूपण २७०-२७५ सम्बन्ध विच्छेद कर अपने ऐलेय पुत्रको ले सुप्रतिष्ठ केवलीका विहार और समुद्रविजयअन्यत्र चली गयी । वहाँ उसने इलावर्धन को राज्यप्राप्तिका वर्णन २७५ नगर बसाकर ऐलेयको राजा बनाया। ऐलेय एकोनविंश सर्ग के पुत्र कुणिमने विदर्भ देशमें एक कुण्डिन नामका नगर बसाया। काल-क्रमसे इसी राजा समद्रविजयने अपने आठ छोटे भाइयों के विवाह किये। वसुदेव अत्यन्त सुन्दर थे । वंशमें अन्य अनेक पुत्र उत्पन्न हुए। २४८-२५० राजा वसु, क्षीरकदम्बकका पुत्र पर्वत और जब वे नगर में क्रीडार्थ निकलते थे तब नगरनारदका वर्णन तथा उनके 'अजैर्यष्टव्यम्' की स्त्रियाँ उन्हें देख कामसे विह्वल हो उठती वाक्यके अर्थको लेकर शास्त्रार्थका वर्णन थीं। इसलिए नगरके प्रतिष्ठित लोग राजा समुद्रविजयके पास गये। उन्होंने लोगोंको और राजा वसु द्वारा मिथ्या अर्थका समर्थन, वसूका पतन और नरक गमनका निरूपण २५०-२६१ सान्त्वना देकर विदा किया और तत्काल घूम कर आये हुए वसुदेवको बड़े प्रेमसे अपने अष्टादश सगं महलमें रख छोड़ा तथा उनके बाहर जानेपर राजा वसुके बृहद्ध्वज नामक पुत्रसे मथुरामें पाबन्दी लगा दी २७८-२७९ सुबाहु पुत्र हुआ। इसे आदि लेकर अनेक एक दिन कुब्जा दासीके द्वारा कुमार वसुदेवराजाओंके हो जानेपर इक्कीसवें तीर्थकर को अपने कैद होनेका पता लग गया, जिससे नमिनाथ हुए । उनके मोक्ष जानेके बाद इसी वे रात्रिके समय एक सेवकको साथ ले बाहर हरिवंशमें यदु नामका राजा हुआ जो यादवों निकल गये । श्मशानमें जाकर उन्होंने उस की उत्पत्तिका कारण हुआ। इसी वंशमें सेवकको यह प्रत्यय करा दिया कि वसुदेव अन्धकवृष्णिकी सुभद्रा स्त्रीसे समुद्रविजय चितामें जलकर मर गये और आप शीघ्रआदि दस भाई हुए। २६२-२६३ गामी घोड़ेपर सवार हो वहाँसे अन्यत्र चल राजा भोजक वृष्णिकी पद्मावती नामक पत्नी- दिये । सेवकने समुद्रविजयको खबर दी, इस से उग्रसेन, महासेन आदि पुत्र हुए। राजा घटनासे सब लोग बहुत दुःखी हुए २७९-२८० वसुके सुवसु पुत्रको सन्तति में अनेक राजा वसुदेवका भारतवर्ष एवं विजयाध पर्वतकी हुए । राजगृह नगरमें राजा जरासन्ध तथा दोनों श्रेणियोंमें परिभ्रमण कर अनेक विद्याधर उसके कालयवन आदि पुत्रोंका वर्णन २६३-२६४ और भूमिगोचरी कन्याओंके साथ विवाह कदाचित सौर्यपरके गन्धमादन पर्वतपर सुप्र करना २८०-२८५ तिष्ठ मुनिराजको उपसर्गके बाद केवलज्ञान- उसी परिभ्रमणके समय वसुदेव चम्पापुरीमें को प्राप्ति हुई आये और सेठ चारुदत्तकी गन्धर्वसेना पुत्रीसुप्रतिष्ठ केवलीके द्वारा धर्मका विस्तृत उप की संगीतज्ञताकी प्रशंसा सुन उसे परास्त देश, जिसमें मुनि तथा श्रावकोंके व्रतोंका करनेके लिए सुग्रीव नामक संगीताचार्यके पास वर्णन, कुल कोटियाँ, एकेन्द्रियादि जीवोंकी संगीत विद्या सीखने लगे । तदनन्तर उन्होंने For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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