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________________ षोडशः सर्गः २४१ नम्रो भृशं फलमरेण सुगन्धिशालिः शालेयजा च विकचोत्पलजातिरुत्था । सौभाग्यगन्धवशवर्तितयाङ्गमङ्गमासाद्य जिघ्रतुरिवास्यमजनमेतौ ॥२६॥ धूलीः 'कदम्बमदधूलिगताङ्गरागाधाराः कदम्बमधुनो विधुराः स्मरन्तः । माद्यद्विपेन्द्रमदगन्धिषु षट्पदौघाः सप्तच्छदेषु विततेषु रतिं वितेनुः ॥२७॥ काले स तत्र मुनिसुव्रतराजहंसः कैलासशैलसदृशे स्थितवान् सुसौधे । लीलावधतरतिविभ्रमराजहंसीः व्रीडामयातिरुचिरामरणाः प्रपश्यन् ॥२८॥ पश्यन् दिशः सकलशारदसस्यशोभाः मेघं ददर्श शशिशुभ्रमदभ्रशोमम् । व्योमार्णवारमणतृष्णमिवावतीर्णमैरावणं भ्रमणविभ्रमवारणेन्द्रम् ॥२९॥ निःशेषनिर्गलितनीरनिजोत्तरीयमाशावधूविपुलपीनपयोधरं सः । प्रोत्तुङ्गपाण्डुपरिणाहिनमम्बरस्य भूषायमाणमवलोक्य तमाप तोषम् ॥३०॥ पश्चात्प्रचण्डतरमारुतवेगघातनिर्मूलितावयवमाशु विलीयमानम् । ज्वालोपनीतमिव तं नवनीतपिण्डमालोक्य लोकविभुरिस्थमचिन्तयत्सः ॥३१॥ शीर्णः शरजलधरः कथमेष शीघ्रमायुःशरीरवपुषां विशरारुतायाः। लोकस्य विस्मरणशीलविशीर्णबुद्धराशुपदेशमिव विश्वगतं वितन्वन् ॥३२॥ फलके भारसे अतिशय झुके हुए सुगन्धित धानके पौधे और धानके खेतोंमें उत्पन्न हुई ऊंची उठी विकसित उत्पलोंकी श्रेणियाँ-दोनों ही सौभाग्य सम्बन्धी हर्षके वशीभूत हो अंगसे-अंग मिलाकर मानो एक दूसरेका मुख हो सूंघ रही थीं ॥२६॥ जिनके शरीरपर विकसित कदम्बपुष्पोंकी परागका अंगराज लगा था तथा जो कदम्ब मधुकी धाराओं और धूलिका स्मरण करते हुए दुःखी हो रहे थे ऐसे भ्रमरोंके समूह अब कदम्ब-पुष्पोंका अभाव हो जानेसे मदोन्मत्त गजराजके मद-जैसी गन्धसे युक्त सप्तपणं वृक्षोंके लम्बे-चौड़े वनोंमें प्रीति करने लगे॥२७॥ ऐसी शरद्ऋतुके समय भगवान् मुनिसुव्रतरूपो राजहंस-श्रेष्ठ राजा (पक्षमें राजहंस ), लज्जा और भय ही जिनके सुन्दर आभूषण थे तथा जिन्होंने अपनी लीलासे रतिकी शोभाको दूर कर दिया था ऐसी राजहंसियों-श्रेष्ठ रानियों ( पक्षमें राजहंसिनियों) को देखते हए भगवान मनिसुव्रतनाथ कैलास पर्वतके समान ऊंचे महलपर विराजमान थे ॥२८॥ शरद्-ऋतुके समस्त धान्योंकी शोभासे युक्त दिशाओंको देखते-देखते उन्होंने एक मेघको देखा। वह मेघ चन्द्रमाके समान सफेद था, अत्यधिक शोभासे युक्त था और आकाशरूपी समुद्र में कीड़ा करनेकी अभिलाषासे अवतीर्ण भ्रमणप्रेमी, गजराज ऐरावतके समान जान पड़ता था ॥२९|| जिसके ऊपरसे समस्त जलरूपी अपना उत्तरीय वस्त्र नीचे खिसक गया था, जो अतिशय ऊँचा, सफेद एवं विस्तारसे युक्त था, आकाशका आभूषण था, और दिशारूपी स्त्रीके अतिशय स्थूल स्तनके समान जान पड़ता था ऐसे उस मेघको देखकर भगवान् आनन्दको प्राप्त हो रहे थे ॥३०|कुछ ही समयके पश्चात् अत्यन्त प्रचण्ड वायुके वेगजन्य आघातसे उस मेघके समस्त अवयव नष्ट हो गये और वह ज्वालाओंके समीप रखे हुए नवनीतके पिण्डके समान शीघ्र ही विलीन हो गया, यह देख जगत्के स्वामी भगवान मुनिसुव्रतनाथ इस प्रकार विचार करने लगे ॥३१॥ ____ अरे ! यह शरदऋतुका मेघ इतनी जल्दी कैसे विलीन हो गया ? जान पड़ता है आयु, शरीर और वपुको क्षणभंगुरताको भुला देनेवाले मनुष्यको व्यापक उपदेश देनेके लिए ही मानो १. धूलीकदम्बमदधूलिगतां सरागा धारां ख.। २. वितेने म.। ३. अकृशशोभम् । ४. नश्वरतायाः । ५. आशु + उपदेशमिव । आशु शीघ्रमित्यर्थः । ३१ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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