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________________ षोडशः सर्गः २३९ जातेन तेन शुभलक्षणचितेन पभावतो प्रमुदिता मुनिसुव्रतेन । सा रूढरोगशिखिकण्ठरुचा चकासे स्निग्धेन्द्रनीलमणिनाकरभूरिबका ॥१३॥ आकम्पितासनतिरीटजगस्त्रयेन्द्राः सपःप्रयुक्तविशदावधयोऽधिगम्य । घेलुः सुरा जिनसमुभवमद्भुतोच्चैर्घण्टामृगेट् पटहशङ्खरवंश्च शेषाः ॥१४॥ *गन्धाम्बुवर्षमृदुमारुतपुष्पवृष्टिसंपूरिताखिलजगद्वलयाः समन्तात् । भागस्य चाशु सुकृतोज्वलभूषवेषाः शक्रादयः पुरुकुशाग्रपुरं परीयुः ॥१५॥ नत्वा जिनं जिनगुरूं च सुरासुराश्च तजातकर्मणि कृते सुरकन्यकामिः । ऐरावतं तमधिरोप्य महाविभूत्या गस्वा परीत्य गिरिराजमधित्यकायाम् ॥१६॥ संस्थाप्य पाण्डुकशिलातलमस्तके तं सिंहासने सुपयसोद्धपयःपयोधेः । भूस्यामिषिच्य कृतभूषम भिष्टवैस्ते स्तुत्वाऽभिधाय मुनिसुव्रतनामधेयम् ॥१७॥ आनीय नीतिकुशलाः जननीशुमाङ्कमारोप्य नाटकविधि प्रविधाय देवाः । नवा ययुः शतमखप्रमुखा यथास्वमानन्दितत्रिमवनं सगुरुं जिनं ते ॥१८॥ ज्ञानत्रयं सहजनेत्रमुदारनेत्रो बिभ्रजिनः सुरकुमारकसेव्यमानः । कालानुरूपकृतसर्वकुबेरयोगक्षेमो ययावपधनस्य गुणस्य वृद्धिम् ॥१९॥ उत्पन्न किया ॥१२॥ जिस प्रकार इन्द्रनीलमणिसे खानकी भूमि सुशोभित होती है उसी प्रकार शुभ लक्षणोंसे यक्त एवं लाली सहित नीलकण्ठ-मयरकी कान्तिको धारण करनेवाले मनिसव्रत भगवान्से हर्षित पद्मावती सुशोभित हो रही थी ॥१३॥ उस समय तीनों जगत्के इन्द्रोंके आसन और मुकुट कम्पायमान हो गये थे जिससे तत्काल ही अवधिज्ञानका प्रयोग कर उन्होंने जिनेन्द्र भगवानके जन्मका समाचार जान लिया था और शेष देवोंने अत्यन्त आश्चर्य तथा जोरके साथ होनेवाली घण्टाध्वनि, सिंहध्वनि, पटहध्वनि और शंखध्वनिसे जिनेन्द्र-जन्मका निश्चय कर लिया था। इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्का जन्म जानकर समस्त इन्द्र और देव जन्मोत्सवके लिए चले ॥१४॥ सुगन्धित जल, मन्द वायु और पुष्पोंकी वर्षासे जिन्होंने समस्त जगत्को भर दिया था तथा जिन्होंने उत्तमोत्तम देदीप्यमान आभूषणोंसे सुशोभित वेष धारण किया था ऐरे इन्द्र आदि देवोंने सब ओरसे शीघ्र आकर विशाल कुशाग्रपुरकी प्रदक्षिणाएं दीं ।।१५।। तत्पश्चात् समस्त र असुर देवोंने जिनेन्द्र भगवान् और उनके माता-पिताको नमस्कार किया, देव-कन्याओंने जातकर्म किया और उसके बाद समस्त देव जिनेन्द्र भगवान्को ऐरावत हाथीपर बैठाकर बड़े वैभवके साथ सुमेरु पर्वतपर ले गये। वहाँ प्रथम ही उन्होंने मेरु पर्वको प्रदक्षिणाएँ दी फिर उसके ऊर्ध्वभागपर बनी पाण्डुक शिलाके ऊपर स्थित सिंहासनपर जिनेन्द्र भगवान्को विराजमान किया। वहाँ क्षीर सागरके उत्तम जलसे महाविभूतिके साथ उनका जन्माभिषेक किया, नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति की, मुनिसुव्रत नाम रखा। तदनन्तर नीति-निपुण देवोंने भगवान्को ला माताकी शुभ गोदमें विराजमान कर आनन्द नाटक किया। तत्पश्चात् इन्द्रादि देव, त्रिभुवनको आनन्दित करनेवाले जिनेन्द्र भगवान और उनके माता-पिताको नमस्कार कर यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥१६-१८॥ जो स्वयं विशाल नेत्रोंसे युक्त थे, तीन ज्ञानरूपी सहज नेत्रोंको धारण करनेवाले थे, देवकुमार जिनकी निरन्तर सेवा करते थे और समय-समयके अनुरूप कुबेर जिनके योग-क्षेमका ध्यान रखता था-सब सुख-सामग्री समर्पित करता था ऐसे भगवान् मुनिसुव्रत शरीर और गुणोंकी वृद्धिको प्राप्त होने लगे । भावार्थ-जैसे-जैसे उनका शरीर बढ़ता जाता था वैसे-वैसे ही उनके १. सा रागरूढ -म. । २. मृगे पटह -म.। ३. गत्वाम्बुवर्षमृदुमारुतपुष्पवृष्टिं म.। ४. जिनमातापितरौ । ५. शरीरस्य। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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