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________________ पञ्चदशः सर्गः २३५ तदवलोक्य सुरो मिथुनं वरं प्रथमयौवननिर्भरेविग्रहम् । अकुत खण्डितविद्यमखण्डया सहजखण्डतया सरमायया ॥४९॥ परवधूप्रिय वीरकवैरिणं स्मरसि किं सुमुख प्रमुखाधुना। स्वमपि किं सूखले वनमालिके! स्खलितशीलमरे ! परजन्मनि ॥५०॥ अहमसौ तपसा सुरतामितः खचरतां मुनिदानफलाद् युवाम् । अरतिमेव ममारतिदायिनोः क्षपितविद्यकयोः प्रददामि वाम् ।।५१॥ इति निगद्य तदा विबुधः खगौ चकितकम्पितचित्तशरीरको। गरुडवत्परिगृह्य खमुद्ययौ भरतवर्षवरं प्रति दक्षिणम् ॥५२॥ मृतवतामृतदीधितिकीर्तिना रहितयाऽनृपया वरचम्पया। स तमयोजयदत्र महीपतिं प्रणतराजकमैच दिवं सुरः ॥५३॥ त्रिदशखण्डितविद्य कदम्पती क्षपितपक्षशकुन्तवदक्षमौ । वियति पयंटितुं त्रुटितेच्छकौ सह समीयतुरत्र धृति क्षितौ ॥५४॥ नवतिकार्मुकपूर्वसुलक्षितस्थितिमतो दशमस्य मुनेरिदम् । समधिकाब्धिशतोज्झितकोटिके वहति तीर्थपथेऽकथि वृत्तकम् ॥१५॥ स बुभुजे भुजदण्डवशीकृतप्रणतपार्थिवमानितशासनः।। विषयसौख्यमखण्डितरागया सुचिरकालमतृप्तमतिस्तया ॥५६।। अथ तयोस्तनयो हरिरित्यभूद्धरिरिवं प्रथितः पृथिवीपतिः ।। समनुभूय सतश्रियमूर्जितां स्वचरितोचितलोकमितौ च ती ॥५७॥ हो रहा था सो उस देवने उसे प्राप्त किया ॥४८॥ नव यौवनसे जिसका शरीर भरा हुआ था ऐसे उस विद्याधर दम्पतीको देखकर देवने अपनी स्वाभाविक अखण्ड मायासे उसे खण्डितविद्य कर दिया अर्थात् उसकी विद्याएँ हर लीं ॥४९॥ और क्रुद्ध होकर उससे कहा कि अरे! पर-स्त्रीको हरनेवाले प्रमुख सुमुख ! क्या तुझे इस समय अपने वीरक वैरीका स्मरण है और परजन्मसे शीलव्रतको खण्डित करनेवाली दुष्ट वनमाला ! तुझे भी वीरककी याद है ? ॥५०॥ मैं तप कर देव हुआ हूँ और तुम दोनों मुनिदानके फलसे विद्याधर हुए हो। तुम दोनोंने पूर्वभवमें मुझे दुःख दिया था इसलिए मैं भी तुम्हारी विद्याएँ नष्ट कर तुम्हें दुःख देता हूँ ।।११।। इस प्रकार कहकर वह देव, जिस प्रकार पक्षियोंको गरुड़ उठा ले जाता है उसी प्रकार आश्चर्यसे चकित चित्त एवं भयसे कम्पित शरीरको धारण करनेवाले दोनों-विद्याधर और विद्याधरीको उठाकर दक्षिण भरत क्षेत्रकी ओर आकाशमें उड़ गया ॥५२।।।। उस समय चम्पापुरीका राजा चन्द्रकीति मर चुका था इसलिए वह राजासे रहित थी। वह देव आर्य विद्याधरको यहाँ ले आया और उसे चम्पापुरीका अनेक राजाओंके द्वारा नमस्कृत राजा बनाकर स्वर्ग चला गया ॥५३।। देव द्वारा जिनकी विद्याएँ खण्डित कर दी गयी थी ऐसे वे दोनों विद्याधर दम्पती, पंख कटे पक्षियोंके समान आकाशमें चलनेको असमर्थ हो गये इसलिए उसकी इच्छा छोड़ पृथिवीमें ही सन्तोषको प्राप्त हुए ॥५४।। यह वृत्तान्त नब्बे धनुष ऊंचे शरीर और एक लाख पूर्वकी स्थितिको धारण करनेवाले दशवें शीतलनाथ भगवानके तीर्थमें हआ था। उस समय उनका तीथं कुछ अधिक सौ सागर कम एक करोड़ सागर प्रमाण चल रहा था ॥५५|| राजा आर्यने अपने भुजदण्डसे समस्त राजाओंको वश कर नम्रोभूत एवं आज्ञाकारी बनाया और अखण्डित प्रेमवाली मनोरमाके साथ चिरकाल तक विषय-सुखका उपभोग किया फिर भी तृप्त नहीं हुआ ॥५६॥ तदनन्तर उन दोनोंके हरि नामका पुत्र हुआ जो १. निर्जर म. । २. मृतेन चन्द्रकोतिना राज्ञा । ३. इन्द्रसदृशः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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