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________________ २३० हरिवंशपुराणे अनशनाध्ययनादितपाश्रिया धवलया प्रशमास्तविकारया । जनितगौरवया शुचिभषितो विपुलनिर्जरया जरया यथा ॥८॥ विजितदोषकषायपरीषहं सुनिगृहीतजितेन्द्रियवृत्तकम् । यतिवृषं 'सुमुखः स्वगृहागतं तमभिवीक्ष्य नृपः सहसोस्थितः ।।।। प्रमदमारवशीकृतमानसस्तमभिगत्य परीत्य वधूयुतः । सविनयं प्रतिगृह्य शुचिः शुचिं शुचिनि साधुमधान्मणिकुटिमे ॥१०॥ प्रिय वधूकरधारितसत्कनकनककर्करिकोजलधारया । व्यपगतासुकयाँ वरभूभृता स्वकरधौतमकारि मुनेः पदम् ।।११।। सुरभिगन्धशुभाक्षतपुष्पसत्प्रकरदीपकधूपपुरःसरैः । समभिपूज्य वचस्तनुचेतसा तमभिवन्द्य सुदानमदान्मदा ।।१२।। समगुणात्परिणामविशेषतः परभवे सहयोगफलोदयम् । सुमनसा सुमखो वनमालया सह बबन्ध सुपुण्यमपुण्यभित् ॥१३॥ बहुदिनानशनव्रतधारणः कृशतनुस्थितये कृतपारणः । विहितदातृसुखोदयकारणः स मुनिरैत्पटुतत्त्वविचारणः ॥१४॥ व्रजति नित्यमरखे सुमुखेशिनः शममनेह सि पुण्यफलाशिनः । *परयवत्यपहारदुरीहितं प्रतिकृतानुशयस्य हताहितम् ॥१५॥ मणिगणच्छविविच्छरितोदरे सुरभिगर्भगृहे विहितादरे । सह कदाचिदसौ गुणमालया दयितया शयितो वनमालया ॥१६॥ अर्थात् सफेद ( पक्षमें उज्ज्वल ) समस्त विकारोंसे रहित एवं गौरवको उत्पन्न करनेवाली वृद्धावस्थाके समान कर्मोकी विपुल निर्जरासे सुशोभित थे ॥७-८।। जिन्होंने दोष कषाय और परिषहको जीत लिया था एवं इन्द्रियोंकी वृत्तिको अच्छी तरह रोककर परास्त कर दिया था ऐसे अपने घर आये हुए उत्तम मुनिराजको देखकर राजा सुमुख सहसा उठकर खड़ा हो गया ।।९।। आनन्दके भारसे जिसका हृदय विवश था ऐसे उज्ज्वल परिणामोंके धारक राजा सुमुखने स्त्रीके साथ आगे जाकर पहले तो उन पवित्र मनिराजको प्रदक्षिणा दो फिर विनय सहित पडगाहकर उन्हें रत्नमय पवित्र फर्शपर विराजमान किया ।।१०।। तदनन्तर प्रिय स्त्रोके द्वारा हाथमें धारण की हुई सुवर्णमय झारीको प्रासुक जलधारासे राजाने मुनिराजके चरण धोये ॥११॥ फिर सुगन्धित चन्दन, शुभ अक्षत, नैवेद्य, दीप, धूप आदि अष्टद्रव्यसे पूजा कर मन, वचन, कायसे उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर हर्ष-पूर्वक दान दिया ॥१२।। उस समय राजा सुमुख और वनमालाके परिणाम एक समान थे इसलिए दोनोंने ही परभवमें एक साथ भोग-रूपी फलको देनेवाला पापापहारी उत्तम पुण्यबन्ध किया ॥१३।। जिन्होंने अनेक दिनका उपवासरूपी व्रत धारण किया था, जो दाताओंके लिए सुख प्राप्तिका कारण जुटानेवाले थे और जो तत्त्वके विचार करने में अतिशय निपुण थे ऐसे मुनिराज अपने कृश शरीरकी स्थिरताके लिए पारणा कर वनको चले गये ॥१४॥ तदनन्तर जो पुण्य का फल भोग रहा था और परस्त्रीके अपहरणसे उत्पन्न पापके प्रति जो निरन्तर पश्चात्ताप करता रहता था ऐसे राजा सुमुखका काल जब अहितोंको नष्ट कर निरन्तर सुखसे बीत रहा था तब वह किसो समय गुणोंकी मालास्वरूप वनमाला स्त्रीके साथ सुगन्धित १. यतिश्रेष्ठम् । २. झारी। ३. प्रासुकया। व्यपगतांशुकया (?) म.। ४. कृततनु म.। ५. सममनेहसि क., ख., ग., घ., म.। ६. वरयुवत्य -ङ.। ७. प्रतिकृतः अनुशयः पश्चात्तापो येन स तस्य । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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