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________________ चतुर्दशः सर्गः २२७ तस्यापि हि मनोवृत्तिं प्रतीहि मम दर्शनात् । मदमित्रायसंमिश्रां सर्वाकारोपलक्षिताम् ॥१०॥ तदा तप्तौ प्रवीणे! द्वौ त्वं नौ रहसि योजयेः । सुखेनैव हि कालज्ञ तप्तं तप्तेन योज्यते ॥९॥ निशम्य वनमालायास्तद्वचो भावसूचकम् । जगाद वचनं दूती तदेति मुदितात्मिका ॥१२॥ वत्से वत्सेश्वरेगाहं स्वद्रपहृतचेतसा । प्रहितास्मि तदेह्याशु तेन त्वां घटयाम्यहम् ॥१३॥ इति स्वेष्टार्थसंवादे वनमाला स्मरानुरा । दूत्या पत्यो परोक्षे द्वागविशद्राजमन्दिरम् ॥९॥ विलोक्य मनसश्चौरी सुमुखः सुमुखीं मुदा । एघेहीति प्रियालापाञ्चकार सुखिनी सुखी ॥१५॥ हस्ते स्तनानुलुप्तां तां स्वेदिनि स्वेदिना युवा । हस्तेनादाय तन्वङ्गों शयने स्वे न्यवेशयत् ॥१६॥ प्रौढयौवनयोर्योगमनुकतमिबैतयोः । उदियाय निशानाथो प्रसादितनिशामुखः ॥१७॥ शशाङ्कस्य करस्पर्शान्मुमोदाशु कुमुदती । सुमुखस्य करस्पर्शाद् वनमालेव हारिणी ॥९॥ उक्तप्रत्युक्तयुक्तार्थान् स्त्रीपुंसगुणसंगतान् । प्रेमबन्धप्रवृद्धये तो बहून् मावांस्तु चक्रतुः ॥९९॥ सोऽपि विश्रम्भदरास्तनवसङ्घमसाध्वसाम् । तामुत्सङ्गे कृतां गाढमालिलिङ्गाङ्गसंगताम् ॥१०॥ असंतोषभुजाश्लेपैविश्लेषमुषितश्रमैः । चुम्बनैश्चूषणैदशः कण्ठग्रहकचग्रहैः ॥१०१॥ तुम यह विश्वास करो कि मेरे देखनेसे उसकी मनोवृत्ति भी मेरी चाहसे मिश्रित है-उसके मनमें मेरी चाह है क्योंकि उस की समस्त चेष्टाओंसे यह स्पष्ट प्रतीत होता था ।।९०|| तुम बड़ी चतुर और समयकी गतिको जाननेवाली हो इसलिए हम दोनों संतप्त स्त्री-पुरुषों को एकान्त में मिला दो क्योंकि संतप्त वस्तु दूसरी संतप्त वस्तुके साथ सुखसे मिलाई जा सकता है ॥९१॥ इस प्रकार वनमालाके अभिप्रायको सूचित करनेवाले उन वचनोंको सुनकर दूती बहुत प्रसन्न हुई और निम्नांकित वचन कहने लगी !!९२।। उसने कहा कि हे बेटो ! तेरे रूपसे जिसका चित्त हरा गया है ऐसे वत्स देशके स्वामी रागां सुमुखने ही मुझे भेजा है अतः चल मैं शीघ्र ही तुझे उसके साथ मिलाये देती हूँ ॥२३॥ इस प्रकार अपने मनोरथके अनुकूल बात होनेपर कामसे पीड़ित वनमाला, पतिको अनुपस्थितिमें दुतीके साथ शीघ्र ही राजभवन में प्रविष्ट हो गयो ॥९४।। राजा सुमुख, मनको चुरानेवाली सुमुखीको देखकर बहुत सुखी हुआ और हर्षसे 'आइए, आइए' इस प्रकारके प्रिय वचन कहकर उसे सुखी करने लगा ।।१५।। जिसके स्तनोंका स्पर्श किया गया था ऐसी कृशांगी वनमालाको तरुण सुमुखने अपने स्वेद युक्त हाथसे उसका स्वद युक्त हाथ पकडकर अपनी शय्यापर बैठा लिया ।।२६|| उसी समय रात्रि रूपी स्त्रीके मखको प्रसन्न करता हुआ ( पक्षमें रात्रिके प्रारम्भको प्रकाशमान करता हुआ) चन्द्रमा उदित हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो वह प्रौढ़ यौवनसे युक्त राजा सुमुख और वनमालाके समागमका अनुकरण करनेके लिए ही उदित हुआ था ॥९७|| जिस प्रकार राजा सुमुखके करस्पर्श (हाथके स्पर्श ) से सुन्दरी वनमाला प्रसन्न हो रही थी उसी प्रकार चन्द्रमाके करस्पर्श ( किरणोंके स्पर्श ) से कुमुदिनी शीघ्र ही प्रसन्न हो उठी-खिल उठो ।।९८|| राजा सुमुख और वनमालाने उत्तर-प्रत्युत्तरसे सहित तथा स्त्री-पुरुषोंके गुणोंसे संगत बहुतसे भाव किये-नाना प्रकारकी शृंगार-चेष्टाएं कीं ॥९९|| विश्वासकी अधिकतासे नूतन समागमके समय होनेवाला जिसका भय दूर छुट गया था ऐसी वनमालाको राजा सुमुखने गोद में उठा लिया और अपने शरीरसे लगाकर उसका गाढ़ आलिंगन किया ॥१००।। तदनन्तर कामसे उत्तप्त दोनों स्त्री-पुरुषोंने, बीच-बीचमें आलिंगन छोड़ देनेसे जिनमें आलिंगन जन्य थकावट दूर हो जाती थी ऐसे भुजाओंके गाढ़ आलिंगनसे, चुम्बनसे, चूषणसे, १. स्तनावलुप्तां तां ग., ड.। हस्तस्तनानुलप्तां तां म.। स्वेदिनि हस्ते स्तनयोश्च अनुलुप्तां कृतस्पी (ख. टि.)। २. मुक्तार्था म. । ३. सुखित श्रमैः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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