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________________ २२६ हरिवंशपुराणे वेलायां तत्र पमन्व्य मन्त्री दूतीमजीगमत् । आत्रेयी वनमालायाः समीपं सुमुखाज्ञया ॥७७॥ मानितासनदानाद्यः संफली वनमालया। सामिनन्द्य रहस्येतामुवाचैवं विचक्षणा ॥८॥ वनमाले प्रिये वत्से विचित्तेवाद्य लक्ष्यसे । वद वैचित्यहेतं मे पत्या किमसि कोपिता ॥७९॥ वीरको ोकपत्नीकस्तत्र किं कोपकारणम् । अन्यदन निमित्तं स्यात्स्वसंवेद्यं निगद्यताम् ।।८०॥ पुत्रि ! सर्वरहस्येषु नन्वहं तु परीक्षिता । भवत्या मयि सत्यां वा दुर्लभ किमभीप्सितम् ॥८॥ इत्युक्ता सोष्णनिश्वासग्लपिताधरपल्लवा । तथा प्रार्थितया वार्ता' कथमप्यब्रवीद् वचः ॥८॥ स्वां मुक्त्वाम्ब न मे काचिद्विश्रम्भस्थानमत्र हि । षटको भिद्यते मन्त्रो रक्षणीयः स यत्नतः ॥८३॥ दृष्टो मयाद्य सद्पः सुमुखः सुमुखो नृपः । दृष्टमात्रं प्रविष्टोऽमा स मनो मे मनोभुवा ।।८४॥ दुर्लभेऽप्यभिलाषस्य द्वेषिणः सुलभेजने । हृदयस्य खलस्येव वृत्तिरात्मोपतापिनी ॥४५॥ दिग्धं चन्दम्पङ्केन हृदयं मम शुष्यति । बहिरङ्गो विधिः कुर्यादन्तरङ्गे विधीत किम् ॥८६॥ आईवस्वमपि न्यस्तमङ्गोपाङ्गेऽतिशुप्यनि । शीतस्पर्शोऽल्पशोऽत्युष्णे किं करोतु निधापितः ॥८७॥ यस्य पलवतस्पोऽपि कल्पितो म्लायतेतराज्: तापकर्कशगात्रस्य मृदुं शीतः करोतु किम् ॥८॥ अङ्गस्पर्शाद्विना तस्य नाहं पश्यामि निर्वृतिम् । तत्कुरुष्व दयां पूते तत्समातममेव में ॥८॥ देते थे ||७६।। उस समय मन्त्रीने सलाह कर राजा सुमुखकी आज्ञासे वनमालाके पास आत्रेयी नामकी दूती भेजी ।।७७।। वनमालाने आसन आदि देकर उस दूतीका सम्मान किया जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई । तदनन्तर उस चतुर दूतीने एकान्तमें वनमालासे इस प्रकार कहा कि प्रिय बेटी वनमाला! तू आज उदास-सी दिख रही है। उदासीका कारण मुझसे कह, क्या पतिने तुझे नाराज कर दिया है ? ॥७८-७९|| वीरकके तो तू ही एक पत्नी है अतः उसके क्रोधका कारण क्या हो सकता है ? उदासी में कुछ दूसरा ही कारण होना चाहिए जो कि तेरे अनुभव में आ रहा है, उसे बता ॥८॥ बेटी! तुने सब रहस्यों में कई बार मेरी परीक्षा की है, मेरे रहते हए तझे कौन-सा इष्ट कार्य दुर्लभ रह सकता है ? |८१॥ दूतोके यह कहते हो उसके मुखसे गरम-गरम सांसे निकलने लगीं जिनसे उसका अधरपल्लव मुरझा गया। तदनन्तर दूतोके कई बार प्रार्थना करनेपर उसने बड़े दुःखसे यह वचन कहे कि हे माँ ! तुझे छोड़कर इस विषयमें मेरा कोई भी विश्वासपात्र नहीं है । चूंकि छह कानों में पहुँचा हुआ मन्त्र फूट जाता है उसका रहस्य खुल जाता है इसलिए मन्त्रको यत्न-पूर्वक रक्षा करनी चाहिए ।।८२-८३।। बात यह है कि आज मैंने प्रशस्त रूप एवं सुन्दर मुखके धारक राजा सुमु वको देखा था और देखते ही कामदेवके साथ वह मेरे मनमें प्रविष्ट हो गया ।।८४|| इस समय मेरे हृदयको प्रवृत्ति दुर्जनको प्रवृत्तिके समान अपने आपको सन्ताप उत्पन्न कर रही है। क्योंकि जिस प्रकार दुर्जन दुर्लभ वस्तुकी अभिलाषा करता है और सुलभ वस्तुसे द्वेष करता है उसी प्रकार मेरा हृदय जो मेरे लिए सर्वथा दुर्लभ है ऐसे राजा सुमुखकी अभिलाषा कर रहा है और सुलभ वोर कसे द्वेप कर रहा है !!८५।। मेरा हृदय चन्दनके लेपसे लिप्त होनेपर भी सूख रहा है, सो ठीक ही है क्या क बाह्य उपचार अन्तरंग कार्यमें क्या कर सकता है ? ।।८६।। मेरे अंग और उपांगोंपर रखा हुआ गीला कपड़ा भी सूख जाता है सो ठीक ही है क्योंकि अत्यन्त उष्ण पदार्थपर रखा हुआ थोड़ा-सा शीतस्पर्श क्या कर सकता है ? ॥८७॥ जिस तापसे कर्कश शरीर के लिए बनाया हुआ पल्लवोंका विस्तर भी अत्यन्त मुरझा जाता है उसके लिए थोड़ा सा शीत-स्पर्श क्या कर सकता है ? ॥८८॥ मैं उसके शरीरके स्पर्शके बिना शान्ति नहीं देखती इसलिए हे पवित्रे ! दया करो और मेरे लिए शीघ्र ही उसका समागम प्राप्त कराओ ॥८९|| १. दूती। ३ वा + आर्ता कामेन सरोगा ( क. द. टि.)। ३. मुक्त्वात्र म.। ४. सुन्दरमुखयुक्तः । ५. एतन्नामा नृपः । ६. सह । ७. सुलभो जनः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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