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________________ २२४ हरिवंशपुराणे अपृच्छत्सुमतिर्मन्त्री तमांशु विशां विभुम् । विषण्णोऽसि किमद्येश ! कथ्यतामिति सादरः ॥५३॥ एकच्छत्रमिदं राज्यमनुरक्ताः प्रजाः प्रमो। अनुरागप्रतापाभ्यां निभृता भृत्यभभृतः ॥५४॥ इष्टार्थस्य प्रदानेन प्रीणितोऽर्थिजनोऽखिलः । वल्लमाः प्रणयोद्रकान्मानिताश्च प्रसादिना ॥५५॥ धर्म चार्थे च कामे च प्रार्थितं दुर्लभं न ते । तदित्थं नाथ ! सौस्थित्यं मनो दुःखमितं कुतः ॥५६॥ संविभज्य मनोदुःखं सख्यौ प्राणसमे सुखी । संपद्यते जनः सर्व इतीयं जगतः स्थितिः ॥५७॥ तदुच्यतां प्रभोऽद्यैव विदधामि तवेप्सितम् । सुस्थिते हि प्रभौ लोके सुस्थिताः सकलाः प्रजाः ॥५॥ इत्युक्तः सोऽभ्यधात् सद्यो मयाद्योद्यानयातया । दृष्टया परवध्वाशु विद्ययेव वशीकृतः ।।५९।। ईदृशी दृक्स्वनेपथ्या प्रायेण भवताप्यसौ । लक्षितैव निजं मावं कथयन्ती स्फुटेङ्गितः ॥६॥ इति श्रुत्वावदन्मन्त्री लक्षिता लक्षिता विभो । वणिजो वीरकस्यासौ वनमालाभिधा वधूः ॥६॥ नृपोऽवादीत्तया योगो यदि मेऽद्य न जायते । न मन्ये जीवितं स्वस्य तस्याश्च कुटिलभ्रवः ॥६२॥ सन्ये दिवसमप्येषा सहते न मया विना। अनयाहमपि क्षिप्रं तद्विधत्स्व प्रतिक्रियाम् ॥६३॥ दुर्यशः प्राप्यतेऽमम्मिन्ननर्थोऽमत्र मूढधीः । तथापि नेक्षते कार्य यथैवानिमिषान्धकः ॥६॥ तत्वया न निवार्योऽहमकायेऽपि प्रवृत्तधीः । पापोपशमनोपायाः सत्येव सति जीविते ॥६५॥ अनुमेने वचो मन्त्री तदन्यायमपि प्रमोः । अत्यम्यर्णविपत्तीनां मन्त्रिणो हि निवर्तकाः ॥६६॥ PANNA समति नामक मन्त्रीने एकान्तमें आदरपर्वक राजासे पूछा कि हे स्वामिन ! आज आप विषादयुक्त क्यों हैं ? कृपाकर कहिए ॥५३॥ हे प्रभो! आपका यह एकछत्र राज्य है, प्रजा आपमें अनुरक्त है तथा अन्य राजा अनुराग और प्रतापसे वशीभूत हो आपके दास हो रहे हैं ॥५४॥ अभिलषित वस्तुओंको देकर आपने समस्त याचकोंको सन्तुष्ट कर रखा है तथा प्रेमकी अधिकतासे प्रसन्न होकर आपने समस्त स्त्रिगेको सम्मानित किया है ।।५५|| धर्म, अर्थ तथा कामविषयक कोई भी वस्तु आपको दुर्लभ नहीं है, इस प्रकार हे नाथ! सब प्रकारको कुशलता होनेपर भी आपका मन दुखी क्यों हो रहा है ? ।।५६।। सभी लोग प्राणतुल्य मित्र के लिए मनका दुःख बांटकर सुखी हो जाते हैं यह जगत्की रीति है ॥५७। इसलिए हे प्रभो ! बतलाइए मैं आज ही आपकी अभिलाषाको पूर्ण करूंगा क्योंकि स्वामीके सुखी रहनेपर ही समस्त प्रजा सुखी रहती है ॥५८॥ ___ मन्त्रीके इस प्रकार कहनेपर राजाने शीघ्र हो कहा कि आज उद्यानको जाते समय मैंने एक पर-स्त्रीको देखा था उसीने विद्याकी भांति मुझे शीघ्र ही वश कर लिया है ॥५९॥ वह ऐसी थी, ऐसी उसकी वेष-भूषा थी और अपनी स्पष्ट चेष्टाओंसे अपना अभिप्राय प्रकट कर रही थी प्रायः आपने भी वह देखी होगी ॥६०॥ यह सुनकर मन्त्रीने कहा कि हे स्वामिन् ! देखी है, अवश्य देखी है, वह वीरक वैश्यकी वनमाला नामकी स्त्री है ॥६१।। राजाने कहा कि यदि आज उसके साथ मेरा समागम नहीं होता है तो मैं मानता हूँ कि न मेरा जीवन बचेगा और न उस कुटिल भौंहोंवाली वनमालाका ॥२॥ जान पड़ता है कि वह मेरे बिना एक दिन भी नहीं ठहर सकती और न इसके बिना मैं भी एक दिन ठहर सकता हूँ इसलिए शीघ्र ही इसका उपाय करो ॥६३।। यद्यपि इस कार्यसे इस जन्म में अपयश प्राप्त होता है और परजन्ममें अनर्थकी प्राप्ति होती है तथापि जन्मान्धके समान मूर्ख मनुष्य कार्यको नहीं देखता ॥६४॥ इसलिए अकार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी मैं तुम्हारे द्वारा रोकने योग्य नहीं हूँ। यदि जीवन रहा तो पापको शान्त करने के बहुत-से उपाय हो जावेंगे ॥६५।। यद्यपि राजाका वह वचन अन्यायरूप था तथा मन्त्रीने उसे १. सौस्थित्यै म. । २. मया द्योतनया नया म.। ३. ईदग्भूतं स्वनेपथ्यं यस्याः सा (क.टि.)। ४. अनिमिषमात्रेणान्धः जात्यन्ध इत्यर्थः ( क. टि.)। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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