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________________ दशमः सर्गः जिनस्तवविधानाख्यः स चतुर्विंशतिस्तवः । वर्णको वन्दना वन्द्यवन्दनाविधिवादिनी ॥१३०॥ द्रव्ये क्षेत्रे च कालादौ कृतावद्यस्य शोधनम् । प्रतिक्रमणमाख्याति प्रतिक्रमणनामकम् ॥१३१॥ दर्शनज्ञानचारित्रतपोवीर्यौपचारिकम् । पञ्चधा विनयं वक्ति तद् वैनयिकनामकम् ॥१३२॥ चतुःशिरस्त्रिविनतं द्वादशावर्तमेव च । कृतिकर्माख्यमाचष्टे कृतिकर्मविधि परम् ॥१३३॥ दशवकालिकं वक्ति गोचरग्रहणादिकम् । उत्तराध्ययनं वीरनिर्वाणगमनं तथा ॥१३४॥ तत्कल्पव्यवहाराख्यं प्राह कल्पं तपस्विनाम् । अकल्प्यसेवनायां च प्रायश्चित्तविधि तथा ॥३५॥ यत्कल्पाकल्पसंझं स्यात् कल्पाकल्पद्वयं पुनः। महाकल्पं पुनद्रव्यक्षेत्रकालोचितं यतेः ।। १३६॥ देवोपपादमाचष्टे पुण्डरीकाख्यमप्यतः । देवोनामुपपादं तु पुण्डरीकं महादिकम् ॥१३॥ निषद्यकाख्यमाख्याति प्रायश्चित्तविधि परम् । अङ्गबाह्यश्रुतस्यायं व्यापारः प्रतिपादितः ॥१३८॥ एकमष्टौ च चत्वारि चतुः षट् सप्तमिश्चतुः । चतुः शून्यं च सप्तत्रिसप्तशून्यं नवापि च ॥१३९॥ पञ्च पञ्चैक षट् च तथैकं पञ्चतत्त्वतः । समस्तश्रुतवर्णानां प्रमाणं परिकीर्तितम् ॥१४०॥ लक्षाशीतिसहस्राणि चतुर्मिश्च चतुःशती । सप्तषष्टिश्च निर्दिष्टाः कोटीकोट्य इमाः स्फुटाः ॥१४१॥ चत्वारिंशचतुर्लक्षास्त्रिसप्ततिशतानि च । सप्ततिश्च तथा ज्ञेया इमाः कोट्यः स्फुटीकृताः ॥१४२॥ सपञ्चनवतिलक्षाः सपञ्चाशत्सहस्रकम् । सहस्रं षट्शती वर्णा वर्णाः पञ्चदशापि ते ॥१५३॥ प्रकीर्णक है। यह प्रकीर्णक शत्रु, मित्र तथा सुख-दुःख आदिमें राग-द्वेषका परित्याग कर समताभावका वर्णन करनेवाला है ॥१२९॥ दूसरा जिनस्तव नामका प्रकोर्णक है इसमें चौबीस तीर्थकरोंका स्तवन किया गया है। तीसरा वन्दना नामका प्रकीर्णक है इसमें वन्दना करने योग्य पंचपरमेष्ठी आदिकी वन्दनाकी विधि बतलायो गयी है ॥१३०।। प्रतिक्रमण नामका चौथा प्रकीर्णक द्रव्य, क्षेत्र, काल आदिमें किये गये पापको शुद्ध करनेवाले प्रतिक्रमणका कथन करता है ॥१३१॥ वैनयिक नामका पांचवां प्रकीर्णक दर्शन-विनय, ज्ञान-विनय, चारित्र-विनय, तपोविनय और उपचार-विनयके भेदसे पांच प्रकारकी विनयका कथन करता है ॥१३२॥ कृतिकर्म नामका छठा प्रकीर्णक सामायिकके समय चार शिरोनति, मन-वचन-कायसे आदि-अन्त में दो दण्डवत् नमस्कार और बारह आवर्त करना चाहिए। इस प्रकार कृति-कमकी उत्तम विधिका वर्णन करता है ।।१३३॥ दशवैकालिक नामका सातवां प्रकीर्णक मुनियोंको गोचरी आदि वृत्तियोंके ग्रहण करने आदिका वर्णन करता है। आठवाँ उत्तराध्ययन नामका प्रकीर्णक महावीर भगवान्के निर्वाणगमन सम्बन्धी कथन करता है ।।१३४|| कल्पव्यवहार नामक नौवां प्रकीर्णक तपस्वियोंके करने योग्य विधिका तथा नहीं करने योग्य कार्योंके हो जानेपर उनकी प्रायश्चित्त-विधिका वर्णन करता है ॥१३५।। कल्पाकल्प नामक दशवां प्रकीर्णक करने योग्य तथा न करने योग्य दोनों कार्यों का निरूपण करता है। महाकल्प नामका ग्यारहवाँ प्रकीर्णक मुनिके द्रव्य, क्षेत्र तथा कालके योग्य कार्यका उल्लेख करता है ॥१३६॥ पुण्डरीक नामका बारहवां प्रकीर्णक दोनोंके उपपादका वर्णन करता है। महापुण्डरीक नामका तेरहवाँ प्रकीर्णक देवियोंके उपपादका निरूपण करता है ॥१३७। और निषद्य नामका चौदहवाँ प्रकीर्णक प्रायश्चित्त-विधिका उत्तम वर्णन करता है । इस प्रकार यह अंगबाह्य श्रुतज्ञानका विस्तार कहा ॥१३८|| समस्त श्रुतके अक्षरोंका प्रमाण एक, आठ, चार, चार, छह, सात, चार, चार, शून्य, सात, तोन, सात, शून्य, नौ, पाँच, पांच, एक, छह, एक और पाँच अर्थात् एक लाख चौरासी हजार चार सौ सड़सठ कोड़ाकोड़ी चवालीस लाख, सात हजार तीन सौ सत्तर करोड़ पंचानबे लाख इक्कावन हजार छह सौ पन्द्रह १. वन्दना द्विविधादिना म.। २. पुण्डरीकाक्ष म. । ३. सप्तति- क. । ४. १८४४६७४४०७३७०९५५१६१५ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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