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________________ १७६ हरिवंशपुराणे 1 पुनः कृत्वा सुविश्रब्धास्ते दग्धोदरपूरणम् । स्वस्थाः कार्यं विचार्योचुः स्वस्थे चित्ते हि बुद्धयः ॥ ११६ ॥ कोऽभिप्रायः प्रभोरस्य त्यक्तभोगस्य लक्ष्यताम् । नवैहिकफलायेदं चेष्टितं सुष्ठुदुष्करम् ॥११७॥ तथा नेन भो दृष्टापदो विपदो यथा । रत्यरत्योर्विघातेन विषयाइ विषोपमाः ॥ ११८ ॥ सालंकारं परित्यक्तं वसनं व्यसनं यथा । मूलोत्खाताः स्वहस्तेन मूर्धजा वैरिणो यथा ॥ ११९ ॥ शरीरमपि संन्यस्तं संन्यस्ताहारवस्तुना । तदस्याभिमतं किंचिदामुत्रिकफलं भवेत् ॥ १२० ॥ नैष्टिकव्रतमास्थाय स्वामिन्येवं व्यवस्थिते । किं नः कर्तव्यमित्येकं न विद्मः सांप्रतं वयम् ॥ १२१ ॥ निष्क्रान्तानामनेनामा स्वदेशात् प्रतिनिवर्तनम् । नैव पुष्णाति नश्छायामपायबहुलं च तत् ॥ १२२ ॥ न शक्ताश्चरितुं चर्यां यदि नाम वयं विभोः । वनवासित्वसाम्येन किं न कुर्मोऽनुवर्तनम् ॥ १२३ ॥ इति निश्चित्य तेऽन्योन्यं पाण्डुपत्रफलाशिनः । जटावल्कलिनो जातास्तापसा वनवासिनः ॥ १२४ ॥ ॥ यो मरीचिकुमारस्तु नप्ता तप्ततनुर्विमोः । दृष्टवान् जलभावेन तृषामरुमरीचिकाम् ॥ १२५ ॥ जलावगाहनान्यस्य गजस्येव विदाहिनः । मृदवश्च मृदश्चक्रुः शरीरपरिनिर्वृतिम् ॥ १२६ ॥ यत्तन्मान कषायी स काषायं वेषमग्रहीत् । एकदण्डी शुचिर्मुण्डी परिवाब्रत पोषणम् ॥१२७॥ नमिश्च विनमिश्वोभौ भोगयाचनयातुरौ । तावुद्विग्नो विभोग्नौ पादयोर्दुःस्थितौ स्थितौ ॥ १२८ ॥ वृक्षोंको छाल आदि धारण कर नग्न वेष छोड़ दिया ।। ११५ ।। इसके बाद निश्चिन्ततासे अधम उदरकी पूर्ति कर जब वे स्वस्थ हुए तब कार्यका विचारकर परस्पर कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि चित्तके स्वस्थ होनेपर ही बुद्धि उत्पन्न होती है-विचारशक्ति आती है ॥ ११६ ॥ वे कहने लगे कि भगवान्ने समस्त भोगोंको छोड़ दिया है सो इसमें इनका क्या अभिप्राय है। यह ज्ञात किया जाये । ऐहिक फलके लिए तो इनकी यह अतिशय कठिन चेष्टा नहीं हो सकती क्योंकि इन्होंने सम्पत्तियों को विपत्तियोंके समान देखा है, रति और अरतिको नष्ट कर विषयोंको विषके समान समझा है, वस्त्राभूषणको दुःखके समान छोड़ दिया है, शिरके बालोंको शत्रुओंकी तरह अपने हाथसे जड़ से उखाड़ दिया है और आहार-पानीका परित्याग कर दिया है इसलिए शरीरको भी छोड़ा हुआ समझना चाहिए। इससे जान पड़ता है कि इन्हें कोई पारलौकिक फल ही अभिप्रेत होगा ||११७- १२० ।। जबकि भगवान् नैष्ठिक व्रत लेकर इस प्रकार विराजमान हैं - कुछ बोलतेचालते नहीं हैं, तब इस स्थिति में हमें क्या करना चाहिए, इस एक बातको हम लोग इस समय बिलकुल नहीं जानते ॥ १२१ ॥ हम लोग इनके साथ अपने देशसे निकल आये हैं इसलिए अब लोटकर जाना तो हमारी शोभाको नहीं बढ़ाता। साथ ही लौटकर जाना अनेक बाधाओं कष्टोंसे भरा है || १२२ ॥ | यदि हम भगवान्‌की चर्याका आचरण करनेके लिए समर्थं नहीं हैं तो क्या वनवासीपनेकी सदृशतासे हम इनका अनुसरण नहीं कर सकते ? भावार्थं - यदि हमसे इनके समान कुछ तपश्चर्या नहीं बनती है तो इनके समान वनमें तो रह सकते हैं || १२३ ।। आपसमें ऐसा निश्चय कर वे भ्रष्ट राजा, पके पत्र और फलोंको खाते हुए जटा और वृक्षोंकी छाल धारण कर वनवासी तापस बन गये ||१२४|| उनमें मरीचि कुमार नामका जो भगवान्का पोता था, प्यास से उसका शरीर सन्तप्त हो रहा था, उसने भ्रान्तिवश मरुस्थलकी मरीचिकाको ही जल समझ लिया तथा उसमें लोटने लगा सो जिस प्रकार जलमें प्रवेश करना सन्तप्त हाथी के शरीरको शान्ति पहुँचाता है उसी प्रकार कोमल मिट्टीने उसके शरीरको कुछ शान्ति पहुँचायो ॥१२५-१२६ ॥ मरीचि बड़ा मानकषायी था इसलिए उसने परिव्राजकों के व्रतको पोषण करनेवाला गेरुआ वेष स्वीकार कर लिया । वह एक दण्ड अपने साथ रखता था, स्नानादिसे अपनेको पवित्र मानता था तथा शिर मुड़ाये रखता था ।। १२७।। इधर जो भोगोंकी याचनासे अतिशय दुःखी थे, भोगोंके अभाव के कारण उद्विग्न थे, १. त्यक्तं । २. स्वदेशान् म. । ३. -ऽनुवर्ततं म. Jain Education International * For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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