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________________ नवमः सर्गः १७५ ततः कच्छमहाकच्छमरीच्यग्रेसरास्तके । षड्मासाभ्यन्तरे भग्नाः क्षुधाधुनपरीषहैः ॥१०॥ तेषां क्षुत्क्षामगात्राणां भ्रमती दृष्टिरस्थिरा । भ्रान्त दृष्टेमविष्यन्त्याः पूर्वरङ्गमिवाकरोत् ।।१०५॥ दृष्टं तैमिरिकं कैश्चिदन्धकारेऽपि तादृशे । स्पर्धयेव हि चन्द्राः शतचन्द्र नभस्तलम् ॥१०६॥ श्रतं शब्दात्मक विश्वं भावयद्भिरिवापरैः । स्वशब्दलिङ्गमाकाशमिति वैशेषिकागमम् ॥१०॥ पतद्भिरपि तत्रान्यैर्न मनागपि चेतितम् । अचिस्वभावमात्मानमनुकर्तुमिवोचतैः ॥१०८॥ चेतयन्तोऽपि तत्रान्ये स्वरमासितुमप्यलम् । निरीहास्मतया जज्ञः स्वां सांख्य पुरुषस्थितिम् ।।१०९॥ केचिन निरन्वयध्वस्तबुद्धयो नैव सस्मरुः । पूर्वापरस्य मूर्छार्ताः क्षणभङ्गानुवर्तिनः ॥११०॥ इति ते क्षुत्पिपासाद्यैरतिव्याकुलबुद्धयः । कायोत्सर्जनमुत्सृज्य दुद्रुवुश्च शनैः शनैः ।।१११॥ स्वामिनं कौलपुत्रांश्च मर्यादां चानुवर्तते । तावदेव जनो यावद् स्वशरीरस्य निर्वृतिः ॥११२॥ भक्षणं फलमूलादेरपा पानावगाहनम् । कुर्वतां नग्नरूपेण स्वयंप्राहेण भूभृताम् ॥११३॥ भो भो माऽनेन रूपेण स्वयं ग्राहविरोधिना । प्रवर्तध्वमिति व्यक्ताः खेऽभवन्मरुतां गिरः ॥११४ ततस्ते त्रपितास्त्रस्ता दिशो वीक्ष्य महीक्षितः । चक्रुर्वेषपरावतं कुशचीवरवल्कलः ॥११५॥ आते ही होंगे ॥१०३।। तदनन्तर कच्छ, महाकच्छ और मरीचि जिनमें अग्रसर थे. ऐसे वे कत्रिम मनि छह माहके भीतर ही क्षधा आदि कठिन परोषहोंसे भ्रष्ट हो गये ॥१०४।। भखके कारण जिनके शरीर अत्यन्त कृश हो गये थे ऐसे इन कृत्रिम मुनियोंकी अस्थिर दृष्टि घूमने लगी तथा ऐसी जान पड़ने लगी मानो आगे होनेवालो भ्रान्त दृष्टि (भ्रान्त श्रद्धान) का पूर्वाभ्यास ही कर रही हो ॥१०५।। कितने ही लोगोंने अन्धकारका समूह देखा अर्थात् उनको आँखोंके सामने अन्धकार ही अन्धकार छा गया, उनके नेत्र क्षुधाके कारण चन्द्रमाके समान पाण्डुवर्ण हो गये तथा उन्हें उस अन्धकारके बीच आकाशमें एकके बदले सौ चन्द्रमा दिखाई देने लगे ।।१०६॥ कितने ही लोगोंने समस्त संसारको शब्दमय सुना अर्थात् उनके कानोंके सामने शब्द ही शब्द सुनाई पड़ने लगा जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वे 'शब्दरूप लक्षणसे सहित आकाश हैं इस वैशेषिक मतके शास्त्रका ही चिन्तन कर रहे थे ।।१०७|| कितने ही लोग जमीनपर गिरने लगे तथा उन्हें कुछ भी चेत नहीं रहा जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वे आत्माको जड़-स्वभाव करनेके लिए ही उद्यत हुए हों अर्थात् जड़स्वभाव है यह चार्वाकका मत ही प्रचलित करना चाहते हों ।।१०८॥ कितने ही लोगोंको चेत (होश) तो था पर वे स्वच्छन्दता-पूर्वक रहनेके लिए निरीह वृत्तिके कारण अपने आपको सांस्यमत सम्मत पुरुष-जैसी स्थिति बतलाने लगे ।।१०९।। जिनकी बुद्धि निरन्वय नष्ट हो गयी थी तथा जो मोसे दःखी हो रहे थे. ऐसे कितने ही लोगोंको आगे-पीछेका कछ भी स्मरण नहीं रहा, जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वे बौद्धोंके क्षणभंगवादका ही अनुकरण कर रहे हों ॥११०॥ इस प्रकार भूख-प्यास आदिसे जिनकी बुद्धि अत्यन्त व्याकुल हो गयी थी ऐसे वे सब कायोत्सर्ग छोड़कर धीरे-धीरे भागने लगे ॥१११॥ सो ठोक ही है क्योंकि जबतक अपने शरीरकी सन्तोषपूर्ण स्थिति रहती है तभी तक मनुष्य स्वामी, कुल, पुत्र और मर्यादाका अनुसरण करता है ॥११२॥ वे राजा नग्नरूपमें रहकर ही फल-मूल आदिका भक्षण तथा जलका पीना और उसमें प्रवेश करना आदि कार्य स्वेच्छासे करनेके लिए उद्यत हुए तो उसी समय आकाशमें देवोंके यह शब्द प्रकट हुए कि स्वयं ग्राहके विरोधी इस नग्नवेषसे आप लोग ऐसो प्रवृत्ति न करें।।११३-११४॥ तदनन्तर देवोंके उक्त शब्द सुनकर वे राजा बड़े लज्जित हुए और भयभीत हो दिशाओंकी ओर देख उन्होंने कुशा, चीवर तथा वल्कल आदिसे नग्नवेश बदल लिया अर्थात् कुशा, चीवर एवं १. द्विचन्द्राक्षः म., ग., ङ. । क्षुधावशाच्चन्द्रवन्नेत्रः (क. टि.)। २. चेतिकं म. । ३. महतां म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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