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अष्टमः सर्गः
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स्वर्गावतारजननाभिषवद्विभेद
कल्याणवर्णनमिदं वृषभेश्वरस्य । भक्त्या सदा पठति योऽत्र शृणोति यश्च
कल्याणमेति स जनो जिनभास्करस्य ।।२३७।।
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृतो ऋषभनाथजन्माभिषेकवर्णनो
नाम अष्टमः सर्गः ॥८॥
वशीभूत हो स्वसंवेद्य सुखको प्राप्त हुए ।।२३६।। गौतम स्वामी कहते हैं कि भगवान् वृषभदेवके स्वर्गावतार और जन्माभिषेक इन दो कल्याणकोंके इस वर्णनको जो भक्तिपूर्वक सदा पढ़ता है, अथवा जो सुनता है वह इस संसारमें जिन-सूर्यके ही समान कल्याणको प्राप्त होता है ।।२३७।।
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें भगवान्
ऋषभदेवके जन्माभिषेकका वर्णन करनेवाला आठवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥८॥
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