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________________ सप्तमः सर्गः २४३ प्रतिश्रुतं वचस्तामिर्यतस्तस्य गुरोर्यथा। प्रथमं प्रथितस्तस्मारस पृथिव्यां प्रतिश्रुतिः ॥१७॥ पल्यस्य दशमं मागं जीवित्वाऽसौ प्रतिश्रुतिः । पुत्रं सन्मतिमुत्पाद्य जीवितान्ते दिवं 'सृतः ॥१४॥ स रक्षन् पितृमर्यादा प्रजानां संमतो यतः । ततः सन्मतिनामायं कुलकारी कलालयः ॥१४९॥ पल्यस्य शतमं (?) मार्ग स प्रतिजीव्य निजस्थितिम् । पुत्रं क्षेमंकरामिख्यमुत्पाद्य त्रिदिवं गतः ॥१५०॥ प्रजानां च तदा जाताः सिंहव्याघ्रविभीषिकाः । सोऽपि क्षेमं ततः कृत्वा प्राप्तः क्षेमंकरश्रुतिम् ॥१५॥ सहस्रभागमाजीव्य पल्यस्यासौ प्रजाप्रभुः । पुत्रं क्षेमंधराभिख्यं जनयित्वा गतो दिवम् ॥१५२॥ क्षेमंधरः स मस्वार्यस्थिति कुलकरो गुरोः । सहस्रमागमाजीव्य पल्यस्य दशसंगुणम् ॥१५३॥ सूनुं सीमंकरं नाम्ना समुत्पाद्य ययौ दिवम् । वृक्षलुब्धप्रजानां च स सीमामकरोत् प्रभुः ॥१५४॥ लक्षमागं स पल्यस्य जीवित्वा स्वर्गगोऽभवत् । सीमंधरो यथार्थाख्यस्तत्सुतो दशताडितम् ॥१५५॥ तत्पुत्रो वाहनीकृत्य चिक्रीड विपुलद्विपान् । यत्तख्यातः स भूम्नाऽभूद् नाम्ना विपुलवाहनः ॥५६॥ कोटीमागं स पल्यस्य जीविस्वा स्वर्गमाश्रितः । चक्षुष्मानिति तत्सूनुरजनिष्ट जनप्रभुः ॥१५७॥ पुत्रचक्षुर्मुखालोकाच्चक्षुर्मरवा भियाऽनया। आयुष्मत्प्रजया गीतश्चक्षुष्मानित्यसौ प्रभुः ॥१५॥ कोटीभागं स पल्यस्य दशताडितमीडितः । भुक्त्वा भोगमुदात्तोऽपि स्वरितोऽभूस्थितिक्षये ॥१५९॥ पर सब लोगोंने प्रतिश्रुति कुलकरके वचन शीघ्र ही स्वीकृत किये और सब बड़ी प्रसन्नतासे यथास्थान महलोंमें रहने लगे ॥१४६॥ जिस प्रकार गुरुके वचन स्वीकृत किये जाते हैं उसी प्रकार प्रजाने चूंकि उसके वचन स्वीकृत किये थे इसलिए वह पृथिवीपर सर्वप्रथम प्रतिश्रति इस नामसे प्रसिद्ध हआ था ॥१४७।। यह प्रतिश्रति कुलकर, पल्यके दशवें भाग तक जीवित रहकर तथा सन्मति नामके पुत्रको उत्पन्न कर आयुके अन्तमें स्वर्ग गया ॥१४८।। सन्मति कुलकर पिताकी मर्यादाकी रक्षा करता था, प्रजाको अतिशय मान्य था और अनेक कलाओंका घर था इसलिए सन्मति इस नामसे प्रसिद्ध हुआ था ।।१४९|| वह सन्मति पल्यके सौवें भाग जीवित रहकर तथा क्षेमंकर नामक पुत्रको उत्पन्न कर स्वर्ग गया ॥१५०॥ उसके समयमें प्रजाको सिंह तथा व्याघ्रोंसे भय उत्पन्न होने लगा था उससे उनका कल्याण कर वह क्षेमंकर इस नामको प्राप्त हुआ था ॥१५१॥ यह प्रजाका स्वामी पल्यके हजारवें भाग जीवित रहकर तथा क्षेमन्धर नामक पुत्रको उत्पन्न कर स्वगं गया ॥१५२॥ वह क्षेमन्धर पिताकी आय मर्यादाकी रक्षा करनेवाला था और पल्यके दश हजारवें भाग जीवित रहकर तथा सीमङ्कर नामक पुत्रको उत्पन्न कर स्वर्ग गया। इसके समयमें कल्पवृक्षोंकी संख्या कम हो गयी थी इसलिए उनकी लोभी प्रजामें परस्पर कलह होने लगी थी। इसने उनकी सीमा निर्धारित की थी इसलिए यह सीमंकर इस सार्थक नामको धारण करता था। यह पल्यके लाखवें भाग जीवित रहकर स्वर्गगामी हुआ और इसके सीमन्धर इस सार्थक नामको धारण करनेवाला पुत्र हुआ। वह पल्यके दश लाखवें भाग जीवित रहकर स्वर्ग गया। इसके विपुलवाहन नामका पुत्र हुआ, यह बड़े-बड़े हाथियोंको वाहन बनाकर उनपर अत्यधिक क्रीड़ा करता था इसलिए विपुलवाहन इस नामका धारी हुआ था ।।१५३-१५६॥ वह पल्यके करोड़वें भाग जीवित रहकर स्वर्ग गया और उसके चक्षुष्मान् नामका पुत्र हुआ ॥१५७।। पहले माता-पिता पुत्रका मुख तथा चक्षु देखे बिना ही मर जाते थे पर इसके समय पुत्रका मुख और चक्षु देखकर मरने लगे इससे प्रजाको कुछ भय उत्पन्न हुआ परन्तु इसने उन सबके भयको दूर किया इसलिए कुछ अधिक काल तक जीवित रहनेवाली प्रजाने इसे 'चक्षुष्मान्' इस नामसे सम्बोधित किया ।।१५८॥ स्तुतिको प्राप्त हुआ वह चक्षुष्मान् पल्यके दश करोड़वें भाग तक भोग १. स्मृतः म. । २. व्याघ्रादिभीषिका: म.। ३. प्रजां प्रभुः म.। ४. उदात्तो महान् अन्यत्र उदात्तः स्वर उच्यते । ५. स्वर् इतः = स्वर्ग गतः, अन्यत्र स्वरितस्वर उच्यते शब्दच्छलेन । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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