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________________ हरिवंशपुराणे शान्त इनका पूरा नाम शान्तिषेण जान पड़ता है। इनकी उत्प्रेक्षा अलंकारसे युक्त वक्रोक्तियोंकी प्रशंसा की गयी है। इनका कोई काव्य ग्रन्थ होगा। जिनसेनने, अपनी गुरु-परम्पराका वर्णन करते हुए जयसेनके पूर्व एक शान्तिषेण आचार्यका नामोल्लेख किया है बहुत कुछ सम्भव है कि यह शान्त वही शान्तिषण हों। विशेषवादि जिनसेनने इनके किसी ऐसे ग्रन्थकी ओर संकेत किया है जो गद्य-पद्यमय है और जिनकी उक्तियों में बहुत विशेषता है । वादिराजने अपने पार्श्वनाथचरितमें भी इनका स्मरण किया है। कुमारसेन गुरु चन्द्रोदय ग्रन्थके रचयिता प्रभाचन्द्र के आप गुरु थे। आपका निर्मल सुयश समुद्रान्त विचरण करता था। इनका समय निश्चित नहीं है। चामुण्डराय पुराणके पद्य नं. १५ में भी इनका स्मरण किया गया है। डॉ. उपाध्येने इनका परिचय देते हए जैन संदेशके शोधांक १२ में लिखा है कि ये मूलगुण्ड नामक स्थानपर आत्म-त्यागको स्वीकार करके कोप्पणाद्रिपर ध्यानस्थ हो गये तथा समाधिपूर्वक मरण किया । वीरसेन गुरु ये उस मलसंघ पंचस्तूपान्वयके आचार्य थे जो सेनसंघके नामसे लोकमें विश्रुत हुआ है। ये आचार्य चन्द्रसेनके प्रशिष्य और आर्यनन्दीके शिष्य तथा महापुराण आदिके कर्ता जिनसेनके गुरु थे। आप षट्खण्डागमपर बहत्तर हजार श्लोक प्रमाण धवला टीका तथा कषाय प्राभृतपर बीस हजार श्लोक प्रमाण जयधवला टीका लिखकर दिवंगत हुए थे। जिनसेनने उन्हें कवियोंका चक्रवर्ती तथा अपने-आपके द्वारा परलोकष्य विजेता कहा है। आपका समय विक्रमकी ९वीं शतीका पूर्वार्ध है। जिनसेन स्वामी आप वीरसेन गुरुके शिष्य थे। हरिवंशपुराणके कर्ता जिनसेनने आपके पाश्र्वाभ्युदय ग्रन्थकी ही चर्चा की है। जब कि आप महापुराण तथा कषायप्राभृतको अवशिष्ट चालीस हजार श्लोक प्रमाण टोकाके भी कर्ता है। इससे जान पड़ता है कि हरिवंशपुराणके समय उन्होंने पार्वाभ्युदयकी ही रचना की होगी। जयधवला और महापुराणकी रचना पीछे की होगी। और महापुराणको रचना तो उनको अन्तिम कृति कही जा सकती है जिसे वे पूरा नहीं कर सके। उनके सुयोग्य शिष्य गुणभद्रने उसे पूरा किया। आपका समय ९वीं शती है। वर्धमानपुराणके कर्ता जिनसेनने वर्द्धमानपुराणका उल्लेख किया है परन्तु इसके कर्ताका नाम नहीं लिखा है । जान पड़ता है कि उनके समयका अत्यन्त प्रसिद्ध ग्रन्थ होगा। [९] हरिवंशपुराणको कथावस्तु - हरिवंशपुराणमें जिनसेनाचार्य प्रधानतया बाईसवें तीर्थकर श्रीनेमिनाथ भगवान्का चरित्र लिखना चाहते थे परन्तु प्रसंगोपात्त अन्य कथानक भी इसमें लिखे गये हैं। यह बात हरिवंशके प्रत्येक सर्गके उस पुष्पिका वाक्यसे सिद्ध होती है जिसमें उन्होंने 'इति अरिष्टनेमिपुराणसंग्रह' इसका उल्लेख किया है। भगवान् नेमिनाथका जीवन आदर्श त्यागका जीवन है। वे हरिवंश-गगनके प्रकाशमान सूर्य थे । भगवान् नेमिनाथके साथ नारायण और बलभद्र पदके धारक श्रीकृष्ण तथा रामके भी कौतुकावह चरित्र इसमें लिखे गये हैं। पाण्डवों तथा कौरवोंका लोकप्रिय चरित्र इसमें बड़ी सुन्दरताके साथ अंकित किया है। श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नका चरित भी इसमें अपना पृथक् स्थान रखता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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