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________________ षष्ठः सर्गः १२९ आधर्मायास्तु देवानामाद्ययोर्विषयोऽवधिः । कल्पयोः परयोश्चासावावंशाया व्यवस्थितः ॥ ११३ ॥ आऽसौ मेघावनेरुतश्चतुः कल्पे तु तत्परम् । आचतुर्थ पृथिव्यास्तु परे कल्पचतुष्टये ॥ ११४ ॥ आनतादिचतुष्केऽसावापञ्चम्याः समीरितः । नवग्रैवेयकस्थानामषष्ठ्या विषयोऽवधिः ॥ ११५ ॥ नवानुदिशदेवानामासप्तम्या समाप्तितः । लोकनाडीसमस्तासु पञ्चानुत्तरवासिनाम् ॥ ११६ ॥ स्वविमानावधिस्तुध्वं विषयोऽवधिचक्षुषः । विशेषामेव देवानामिति विश्वविदो विदुः ॥११७॥ स्थित्युत्सेधप्रवीचारा जिनेन्द्रप्रतिभाषिताः । चतुर्देवनिकायानां वेदितव्यं यथायथम् ॥ ११८ ॥ दक्षिणाशरणान्तानां देव्यः सौधर्म एव तु । निजागारेषु जायन्ते नीयन्ते च निजास्पदम् ॥१९॥ उत्तराशाच्युतान्तानां देवानां दिव्यमूर्त्तयः । ऐशानकल्प संभूता देव्यो यान्ति निजाश्रयम् ॥ १२०॥ शुद्धदेवीयुतान्याहुर्विमानानि मुनीश्वराः षड् लक्षास्तु चतुर्लक्षाः सौधर्मेशान कल्पयोः ॥ १२१ ॥ दिव्य वस्त्र विभूषाभिः शुभविक्रियमूर्तिभिः । 'चित्रनेत्रह रोदाररूपविभ्रमवृत्तिभिः ॥ १२२ ॥ हाव भावविदग्धाभिर्निसर्गप्रेमभूमिभिः । नैकपल्योपमायुर्भिर्देवीमिर्बहुभिः सुखम् ॥ १२३ ॥ इन्द्राः सामानिका देवाखायस्त्रिंशादयोऽखिलाः । कल्पोपपन्नपर्यन्ताः श्रयन्ते दीर्घजीविनः ॥ १२४॥ अहमिन्द्रास्ततोऽनन्तं भजन्ते भवेजं सुखम् । तत्सातावेदनीयोत्थमस्त्रीकं प्रशमात्मजम् ॥१२५॥ सिद्धानां तु परं स्थानं परं द्वादशयोजनम् । सर्वार्थसिद्धितो गत्वा स्थितं त्रैलोक्यमूर्धनि ॥ १२६॥ ईषत्प्राग्भारसंज्ञाऽसावष्टमी पृथिवी श्रुता । अष्टयोजनबाहुल्या मध्ये हीना क्रमात्ततः ॥१२७॥ प्रथम दो स्वर्गके देवोंके अवधिज्ञानका विषय धर्मा पृथिवी तक है, उसके आगे के दो स्वर्गों सम्बन्धी देवोंका विषय वंशा पृथिवी तक है। उसके आगे चार स्वर्गों सम्बन्धी देवोंका विषय मेघा पृथिवी तक है, उनके आगे चार स्वर्गे सम्बन्धी देवोंका विषय अंजना नामक चौथी पृथिवी तक है । उसके आगे आनतादि चार स्वर्गोंके देवोंका विषय अरिष्टा नामकी पांचवीं पृथिवी तक है । नव ग्रैवेयकवासियों का छठवीं पृथिवी तक है। नवानुदिशवासियोंका सातवीं पृथिवीके अन्त तक है और पञ्चानुत्तरवासियोंका समस्त लोकनाडी तक है । समस्त देवोंके अवधिज्ञान रूपी नेत्रका ऊपरकी ओरका विषय अपने-अपने विमानके अन्त भाग तक है ऐसा सर्वज्ञ देव जानते हैं ॥। ११३ - ११७॥ चारों निकायके देवोंकी स्थिति, ऊँचाई तथा प्रवीचार — कामसेवनका वर्णन जैसा जिनेन्द्र भगवान् ने किया है वैसा यथायोग्य जानना चाहिए | | ११८ || आरण स्वर्गं पर्यन्त दक्षिण दिशाके देवोंकी देवियां सौधर्म स्वगंमें ही अपने-अपने उपपाद स्थानोंमें उत्पन्न होती हैं और नियोगी देवोंके द्वारा यथास्थान ले जायी जाती हैं ||११९|| तथा अच्युत स्वगं पर्यन्त उत्तर दिशाके देवोंकी सुन्दर देवियाँ ऐशान स्वर्ग में उत्पन्न होती हैं एवं अपने-अपने नियोगी देवोंके स्थानपर जाती हैं ॥ १२०॥ मुनियोंके ईश्वर गणधर देवने सोधमं और ऐशान स्वर्ग में शुद्ध देवियोंसे युक्त विमानों की संख्या क्रमसे छह लाख और चार लाख बतलायी है अर्थात् सौधर्म ऐशान स्वर्ग में केवल देवियोंके उत्पत्ति स्थान छह लाख और चार लाख प्रमाण हैं || १२१ || सोलहवें स्वर्ग तक उत्पन्न एवं दीर्घं आयुको धारण करनेवाले इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रश आदि देव, दिव्य वस्त्रालंकारोंसे विभूषित, शुभ विक्रिया करनेवाली हृदय तथा नेत्रोंको हरण करनेवाली उत्कृष्ट रूप और विभ्रमसे सहित, हावभाव दिखलाने में चतुर स्वाभाविक प्रेमकी भूमि एवं अनेक पल्य-प्रमाण आयुवाली अनेक देवियोंके साथ सुखको प्राप्त होते हैं | १२२ - १२४ | सोलहवें स्वर्गके आगे के अहमिन्द्र, साता वेदनीयके उदयसे उत्पन्न, स्त्री रहित, शान्तिरूप आत्मासे उत्पन्न होनेवाले, देव पर्यायजन्य अपरिमित सुखका उपभोग करते हैं ।। १२५ ।। सर्वार्थसिद्धिसे बारह योजन आगे जाकर तीन लोकके मस्तकपर सिद्ध भगवान्का उत्कृष्ट स्थान है ||१२६|| सिद्धों का यह स्थान ( सिद्धशिला ) ईषत्प्राग्भार नामकी आठवीं पृथिवी १. चित्तस्ववृत्तिभिः म ख । २. भवनं म । ३. स्तुता म. । १७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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