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________________ ११८ हरिवंशपुराणे सहस्रमवगाहः स्यादशीतिश्चतुरुत्तरा । सहस्राण्युच्छ्रितिासो द्विचत्वारिंशदस्य तु ।।७००॥ सहस्रयोजनव्यासं दिक्षु पञ्चशतोच्छितम् । शिखरे तस्य शैलस्य भाति कूटचतुष्टयम् ।।७०१॥ नन्द्यावर्तेऽमरः प्राच्या पनोत्तर इतीरितः । स्वहस्ती स्वस्तिकेऽपाच्या श्रीवृक्षे नीलकोऽपरे ॥७०२॥ उत्तरे च सुरः प्रोक्तो वर्धमानेऽजनागिरिः । चत्वारो दिग्गजेन्द्राख्यास्तेऽपि पल्योपमायुषः ॥७०३।। तस्यैवोपरि पूर्वस्या कूटानामष्टकं दिशि । पूर्वोक्तकूटतुल्यं तु दिक्कुमारीभिराश्रितम् ॥७०४॥ वैडूर्ये विजया देवी वैजयन्ती च काञ्चने । जयन्ती कनके कूटे प्राच्यरिष्टेऽपराजिता ।।७०५।। नन्दा नन्दोत्तरा चोभे ते दिकस्वस्तिकनन्दने । आनन्दाप्यम्जने नान्दोवर्धनाञ्जनमलके ॥७०६॥ एतास्तीर्थकरोत्पत्तौ दिक्कुमार्यः सपर्यया। मातुरन्तेऽवतिष्ठन्ते भास्वभृङ्गारपाणयः ।।.०७॥ अमोघे स्वस्थितापाच्यां सुप्रबुद्धे सुपूर्विका । प्रणिधिः सुप्रबुद्धाऽपि मन्दरे परिकीर्तिता ॥७०८॥ दिक्कुमारी तथा ज्ञेया विमलेऽपि यशोधरा । लक्ष्मीमतति रुचके कीर्तिमत्यनि कोर्तिता॥७०९।। दिक्कुमारी प्रसिद्धाऽसौ रुचकोत्तरवासिनी । चन्द्रे वसुंधरा चित्रा सुप्रतिष्टे प्रतिष्ठिता ॥ १०॥ अष्टौ तीर्थकरोस्पत्तावेतास्तुष्टाः समागताः । मणिदर्पणधारिण्यस्तन्मातरमुपासते ।।७११॥ अपरस्यामिलादेवी लोहिताख्ये सुरा पुनः । जगत्कुसुमकूटे स्यात् पृथिवी नलिने तथा ॥ १२॥ पद्मे पद्मावती ज्ञेया कुमुदे काञ्चनापि च । कूटे सौमनसामिख्ये देवी नवमिका श्रतिः ॥७१३॥ शीतापि च यशःकूटे भद्रकूटे च मद्रिका । इमा शुभ्रातपत्राणि धारयन्त्यश्वकासते ॥ १४॥ पर्वत है ॥६९९।। इसकी गहराई एक हजार योजन, ऊँचाई चौरासी हजार योजन और चौड़ाई बयालीस हजार योजन है ।।७००|| उस पर्वतके शिखरपर चारों दिशाओं में एक हजार योजन चौड़े और पांच सौ योजन ऊंचे चार कूट सुशोभित हैं ॥७०१॥ उनमें पूर्व दिशाके नन्द्यावर्त कूटपर पद्मोत्तर देव रहता है, दक्षिण दिशाके स्वस्तिक कूटपर स्वहस्ती देव रहता है। पश्चिम दिशाके श्रीवृक्ष कूटपर नीलक देव रहता है और उत्तर दिशाके वर्धमानक कूटपर अंजनगिरि देव रहता है। ये चारों देव दिग्गजेन्द्रके नामसे प्रसिद्ध हैं तथा एक पल्यको आयुवाले हैं ।।७०२-७०३।। इसी पर्वतकी पूर्व दिशामें पहले कहे हुए अन्य कूटोंके समान आठ कूट हैं और वे दिक्कुमारी देवियोंके द्वारा सेवित हैं ॥७०४।। उनमें पहले वैडूयं कूटपर विजया, दूसरे कांचन कूटपर वैजयन्ती, तीसरे कनक कूटपर जयन्ती, चौथे अरिष्ट कूटपर अपराजिता, पांचवें दिक्नन्दन कूटपर नन्दा, छठे स्वस्तिकनन्दन कूटपर नन्दोत्तरा, सातवें अंजनकूटपर आनन्दा और आठवें अंजनमूलक कूटपर नान्दीवर्धना देवी निवास करती हैं ।।७०५-७०६।। ये दिक्कुमारियां तीर्थकरके जन्मकालमें पूजाके निमित्त हाथमें देदीप्यमान झारियाँ लिये हुए तीर्थंकरको माताके समीप रहती हैं ।।७०७|| दक्षिण दिशामें भी आठ कूट हैं और उनमें पहले अमोघ कूटपर स्वस्थिता, दूसरे सुप्रबुद्ध कूटपर सुप्रणिधि, तीसरे मन्दर कूटपर सुप्रबुद्धा, चौथे विमल कूटपर यशोधरा, पाँचवें रुचक कूट पर लक्ष्मीमती, छठे रुचकोत्तर कूटपर कीर्तिमती, सातवें चन्द्र कूटपर वसुन्धरा और आठवें सुप्रतिष्ठ कूटपर चित्रादेवी निवास करती हैं ॥७०८-७१०॥ ये देवियां तीर्थकरकी उत्पत्तिके समय सन्तुष्ट होकर आती हैं और मणिमय दर्पण धारण कर तीर्थंकरकी माताकी सेवा करती हैं ।।७११।। पश्चिम दिशा में भी आठ कूट हैं उनमें पहले लोहिताख्य कूटपर इलादेवी, दूसरे जगत्कुसुम कूटपर सुरा देवी, तीसरे नलिन कूटपर पृथिवो देवी, चौथे पद्मकूटपर पद्मावतो देवी, पाँचवें कुमुद कूटपर कांचना देवी, छठे सौमनस कूटपर नवमिका देवी, सातवें यशःकूटपर शीता देवी और आठवें भद्र कूटपर भद्रिका देवीका निवास है। ये देवियाँ तीर्थंकरकी उत्पत्तिके समय शुक्ल छत्र धारण करती हुई सुशोभित होती हैं ।।७१२-७१४।। १. नन्द्यावर्तामरः म. । २. हस्तिके -म. । ३. सुस्थिता म. । ४. नलिनी म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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