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________________ पञ्चमः सर्गः ११७ अस्मिन्नल्पयो देवा दिग्मूढाश्चिरमासते । महद्धिकसुरैः साधं कुर्युस्तद्वार्धिलङ्घनम् ॥६८५॥ यत्कुण्डलवरो द्वीपस्तन्मध्ये कुण्डलो गिरिः । वलयाकृतिराभाति संपूर्णयवराशिवत् ॥६८६॥ सहस्रमवगाहोऽस्य द्विचत्वारिंशदुच्छितिः । योजनानां सहस्राणि मगिप्रकरभासिनः ।।६४७॥ सहस्रं विस्तृतिस्त्रेधा दशसप्तचतुर्गुणम् । द्वाविंशं च त्रयोविंशं चतुर्विशं प्रभृत्यधः ॥६८८।। प्रत्येकं तस्य चत्वारि पूर्वाद्याशासु मूर्धनि । भान्ति षोडश कूटानि सेवितानि सुरैः सदा ॥६८९।। पूर्वस्यां त्रिशिरा वज्रे दिशि पञ्चशिराः सुरः । कूटे वज्रप्रभेज्ञेयः कनके च महाशिराः ॥६९०॥ महाभुजोऽपि तस्यां स्यात् कूटे तु कनकप्रभे । पद्म पद्मोत्तरोऽपाच्यां रजते रजतप्रभे ॥६९१।। सुप्रभे त महापद्मो वासुकिश्च महाप्रभे । अपाच्यामेव वाच्यौ तौ प्रतीच्यां त सुरा इमे ॥६९२।। हृदयान्तस्थिरोऽप्यके महानङ्कप्रभेऽप्यसौ । श्रीवृक्षो मणिकूटे तु स्वस्तिकश्च मणिप्रभे ॥६९३।। सुन्दरश्च विशालाक्षः स्फटिके स्फटिकप्रभे । महेन्द्र पाण्डकस्तयः पाण्डुरो हिमवत्युदक ॥६९४।। येऽमी षोडश नागेन्द्राः सर्वे पल्योपमायुषः । यथायथं स्वकूटेष प्रासादेष वसन्ति ते ॥६९५।। दिशि प्राच्या प्रतीच्यां च कुण्डलाचलमस्तके । तदद्वीपाधिपतेर्वासौ द्वे कूटे प्रकटे तयोः ।।६९६।। उच्छायो मूलविस्तारो योजनानां सहस्रकम् । अग्रे पञ्चशती मध्ये पञ्चाशत् सप्तशत्यपि ॥६९७।। तस्यैवोपरि शैलस्य महादिक्ष जिनालयाः । चत्वारः सदृशा मानैरञ्जनाद्रिजिनालयैः ॥६९८।। त्रयोदशस्त यो द्वीपो रुचकादिवरोत्तरः । तन्नामा तस्य मध्यस्थः पर्वतो वलयाकृतिः ॥६९९।। घनाकार आठ कालो पंक्तियाँ फैली हुई हैं ॥६८४|| अल्प ऋद्धिके धारी देव इस अन्धकारमें दिशामूढ़ हो चिरकाल तक भटकते रहते हैं। वे बड़ी ऋद्धिके धारक देवोंके साथ ही इस समुद्रको लाँघ सकते हैं ॥६८५।। कुण्डलवर द्वीपके मध्य में चूड़ीके आकारका एक कुण्डलगिरि पर्वत है जो सम्पूर्ण यवोंकी राशिके समान सुशोभित है ।।६८६।। मणियों के समूहसे सुशोभित रहनेवाले इस पर्वतकी गहराई एक हजार योजन और ऊँचाई बयालीस हजार योजन है ॥६८७।। उस पर्वतकी मूलमें दश हजार दो सौ बीस योजन, मध्यमें सात हजार एक सौ इकसठ योजन और अन्तमें चार हजार छियानबे योजन चौड़ाई है ॥६८८।। उसके मधंभागपर पूर्वादि दिशाओंमें चार-चार कूट हैं। चारों दिशाओंके ये सोलह कूट सदा देवों के द्वारा सेवित हैं तथा अत्यन्त सुशोभित हैं ॥६८९।। पूर्व दिशाके वज्र नामक पहले कूटपर त्रिशिरस् , वज्रप्रभ नामक दूसरे कूटपर पंचशिरस् , कनक नामक तीसरे कूटपर महाशिरस् और कनकप्रभ नामक चौथे कूटपर महाभुज नामका देव रहता है । दक्षिण दिशाके रजतकूटपर पद्म, रजतप्रभ कूटपर पद्मोत्तर, सुप्रभ कूटपर महापद्म और महाप्रभ कूटपर वासुकि देव रहता है। पश्चिम दिशाके अंक कूटपर स्थिरहृदय, अंकप्रभ कूटपर महाहृदय, मणि कूटपर श्रीवृक्ष और मणिप्रभ कूटपर स्वस्तिक देव रहता है। उत्तर दिशाके स्फटिक कूटपर सुन्दर, स्फटिकप्रभ कूटपर विशालाक्ष, महेन्द्र कूटपर पाण्डुक और हिमवत् कूटपर पाण्डुर देव रहता है ॥६९०-६९४॥ ये सोलह देव नागकुमार देवोंके इन्द्र हैं, सबकी एक पल्य प्रमाण आयु है और सब यथायोग्य अपने-अपने कूटोंपर बने हुए प्रासादोंमें निवास करते हैं ॥६९५।। कुण्डल गिरिके ऊपर पूर्व-पश्चिम दिशामें कुण्डलवर द्वीपके स्वामीके दो कूट प्रकट हैं। उन कूटोंकी ऊंचाई एक हजार योजन है, मूल विस्तार एक हजार योजन, मध्य विस्तार सात सौ पचास योजन और उपरितन विस्तार पाँच सौ योजन है ।।६९६-६९७|| उसी कुण्डलगिरिके ऊपर चारों महादिशाओंमें चार जिनालय हैं जो प्रमाणकी अपेक्षा अंजनगिरिके जिनालयोंके समान हैं ।।६९८।। रुचकवर नामका जो तेरहवाँ द्वीप है उसके मध्यमें चूड़ीके आकारका रुचकवर नामका १. -मवगाढोऽस्य म., क. । २. सर्वतो म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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