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________________ पञ्चमः सर्ग: कालोदे दिशि निश्चेयाः प्राच्यामुदकमानुषाः । अपाच्यामश्वकर्णास्तु प्रतीच्यां पक्षिमानुषाः ॥५६॥ उदीच्यां गजकर्णाश्च शूकरास्या विदिक्षु तु । उष्ट्रकर्णाश्च गोकर्णाः प्राच्येभ्यो दक्षिणोत्तराः ॥५६८॥ गजकर्णाश्वकर्णानां मार्जारास्यास्तु पार्श्वयोः । पक्षिणां गजवक्त्राश्च कर्णप्रावरणाः स्थिताः ॥५६९।। शिशुमारमुखाश्चैव मकराममुखास्तथा । विजयाद्वंद्वयोपान्त्ये कालोदजलधौ स्थिताः ॥५७०॥ मा हिमवतोरने वृकव्याघ्रमुखाः स्थिताः । शृगालभमुखाश्चाग्रे शिखरिश्रतिभूभृतोः ॥५७१॥ स्थिता द्वीपिमुखाश्चाग्रे भृङ्गाराराजतागयोः । बाह्याभ्यन्तरयोरन्तर्जगत्यो प्यमानवाः ॥५७२॥ आयुर्वर्णगृहाहाः समा गत्यापि लावणः । सहस्रमवगाढास्ते द्वीपाश्छिन्नतटाम्बुधौ ॥७३॥ कालोदस्थाः प्रवेशेन द्वीपाः पञ्चशताधिकाः । मता द्विगुणविस्तारा लावणेभ्यः कुमानुषैः ॥५७४॥ चतुर्विशतिरन्तःस्थास्तावन्तश्च बहिः स्थिताः । लवणोदस्थितैः सर्वेः ई.पाः षण्णवतिस्तु ते ॥५७५॥ कालोदं पुष्करद्वीपः परिष्कृत्य द्विमन्दरः। स्थितो द्विगुणविष्कम्भः पृथुपुष्करलाञ्छनः ॥५७६॥ मानुषक्षेत्रमर्यादा मानुषोत्तरभूभृता। परिभिप्तस्तु तस्याद्धः पुष्करार्द्धस्ततो मतः ॥५७७॥ समुद्रकी पूर्व दिशामें पानीके समान मुखवाले, दक्षिण दिशामें घोड़ेके समान कानवाले, पश्चिम दिशामें पक्षियोंके समान मुखवाले और विदिशाओंमें शूकरके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं। पूर्व दिशामें जो पानीके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं उनके दक्षिण और उत्तरमें दोनों ओर क्रमसे ऊँट तथा गौके समान कानवाले मनुष्य रहते हैं। गजकर्ण और अश्वकणं मनुष्योंकी दोनों ओर बिल्लीके समान मुखवाले तथा पक्षियोंके समान मुखवालोंकी दोनों ओर हाथीके समान मुखवाले मनुष्य स्थित हैं। इन मनुष्यों के कान इतने लम्बे होते हैं कि ये उन्हींको ओढ़-बिछाकर सो जाते हैं ॥५६७-५६९|| कालोदधि समुद्रमें विजयाधं पर्वतके जो दो छोर निकले हुए हैं उनपर शिशुमारके समान तथा मगरके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं ।।५७०॥ हिमवान् पर्वतके दोनों छोरोंपर भेड़िया और व्याघ्रके समान मुखवाले तथा शिखरी पर्वतके दोनों भागोंपर शृगाल और भालूके समान मुखवाले मनुष्य स्थित हैं ।।५७१।। ऐरावत क्षेत्र सम्बन्धी विजयाध पर्वतके दोनों भागोंपर चीता तथा भंगार ( झारी) के समान मखवाले और बाह्य एवं आभ्यन्तर जगतीपर चीतेके समान मुखवाले मनुष्य निवास करते हैं। ये समस्त मनुष्य आयु, वर्ण, गृह, आहार और गतिकी अपेक्षा लवण समुद्रके मनुष्योंके समान हैं, ये द्वीप एक हजार योजन गहरे हैं तथा जहाँ स्थित हैं वहाँ समुद्रका तट कटा हुआ है ।।५७२-५७३॥ कालोदधिमें स्थित रहनेवाले ये द्वीप प्रवेशको अपेक्षा पाँच सौ योजनसे अधिक हैं अर्थात् दिशाओंके द्वीप समुद्रतटसे पाँच सौ योजन प्रवेश करनेपर, विदिशाओंके द्वीप पांच सौ पचास योजन प्रवेश करनेपर और अन्तदिशाओंके द्वीप छह सौ योजन प्रवेश करनेपर स्थित हैं। इन सभीका विस्तार लवण समुद्र के द्वीपोंसे दूना माना गया है तथा कुमानुष कुभोग भूमिया जीव इनमें रहते हैं ।।५७४।। चौबीस द्वीप कालोदधिको आभ्यन्तर (धातकोखण्डकी समीपवर्ती) सीमा में और चौबीस द्वीप बाह्य (पुष्कराद्धकी समीपवर्ती) सीमामें स्थित हैं। इस प्रकार कालोदधिमें अड़तालीस हैं। लवण समुद्रके अड़तालीस द्वीपोंके साथ मिलकर सब अन्तर्वीप छियानबे हो जाते हैं ।।५७५।। इस प्रकार कालोदधिका वर्णन किया। अब पुष्कर द्वीपका वर्णन करते हैं जिसको पूर्व-पश्चिम दिशाओं में दो मेरु हैं, कालोदधिको अपेक्षा जिसका दूना विस्तार है और जो पुष्कर अर्थात् कमलके विशाल चिह्नसे युक्त है ऐसा पुष्करवर द्वोप कालोदधिको चारों ओरसे घेरकर स्थित है ।।५७६।। पुष्करवर द्वीपका अर्धभाग, मनुष्य क्षेत्रको सीमा निश्चित करनेवाले १. शृगालाक्ष म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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