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________________ १०० हरिवंशपुराणे शुक्ल पञ्चसहस्राणि यावत्तावत् प्रवर्धते । पक्षे प्रहीयते कृष्णे यावदेकादशैव सः॥४३७॥ त्रिशती च त्रयस्त्रिंशद् योजनानि दिने दिने । त्रिभागं वर्धते वाधिः शुक्ले कृष्णे च हीयते ॥४३८॥ मक्षिकापक्ष्मसूक्ष्मान्तो वेदिकान्ते पयोनिधिः। स चोवं मानतोयस्तु योजनाई प्रवर्द्धते ॥४३९॥ षट्षष्टि द्वे शते दण्डा द्वौ हस्तौ षोडशाङ्गली । शुक्ले कृष्णे च ते स्यातां वृद्धिहानी दिने दिने ॥४४०॥ अधः संक्षेपणी द्रोणी विस्तीर्णोध्वं क्षितौ दिवि । अन्यथा नौपुटाम्मोधिः समो वा यवराशिना ॥४४१॥ जगत्याः पञ्चनवतिं सहस्राणि प्रविश्य तु । मध्ये स्युर्दिक्षु चत्वारि पातालविवराण्यधः ॥४४२॥ प्राच्यां पातालमाशायां प्रतीच्यां बडवामुखम् । कदम्बुकमपाच्यां स्यादुदीच्यां यूपकेसरम् ॥४४३॥ तन्मूलमुखविस्तारः सहस्राणि दश स्मृतः । गाहस्वमध्यविस्तारावेका लक्षेति लक्षितौ ॥४४४॥ अलञ्जलसमानानि पातालानि समन्ततः । बाहुल्यं वज्रकुड्यानां तेषां पञ्च शतानि तु ॥४४५॥ त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि त्रयस्त्रिंशच्छतत्रयम् । एकैकोऽत्र विभागः स्याद् योजनानां तु मागवान् ॥४४६॥ ऊर्ध्वभागे जलं तेषां तृतीये केवलं सदा । मूले च बलवान् वायुमंध्यमागे क्रमेण तौ ॥४४७॥ वायोरुच्छ्वासनिश्वासौ पातालेषु स्वभावजौ । तद्वशादुदकस्योर्ध्वमधश्च परिवर्तनम् ॥४४८॥ भागः पञ्चदशः शुक्ले वायुभिः पूर्यते शनैः । पातालानां जलैः कृष्णे स्थितिः स्यात्पक्षसंधिषु ॥४४॥ है॥४३६।। शुक्ल पक्ष में समुद्रका जल पाँच हजार योजन तक ऊँचा बढ़ जाता है और कृष्ण पक्षमें स्वाभाविक ऊचाईजो ग्यारह हजार योजन है वहाँ तक घट जाता है ।।४३७|| शुक्ल पक्षमें समुद्र प्रतिदिन तीन सौ तैंतीस योजन और एक योजनके तीन भाग बढ़ता है तथा कृष्ण पक्षमें उतना ही घटता है ॥४३८॥ वेदिकाके अन्तमें समुद्र मक्षिकाके पंखके समान अत्यन्त सूक्ष्म है परन्तु जब उसके जलमें वृद्धि होती है तब आधा योजन तक बढ़ जाता है ॥४३९।। शुक्लपक्षमें वेदिकाके अन्तमें प्रतिदिन समुद्रकी वृद्धि दो सौ छयासठ धनुष, दो हाथ और सोलह अंगुल होती है और कृष्णपक्ष में प्रतिदिन उतनी ही हानि होती है ।।४४०॥ संकुचित होता हुआ समुद्र नीचे भागमें नावके समान रह जाता है और ऊपर पृथिवीपर विस्तीर्ण हो जाता है तथा आकाशमें इसके विपरीत जुड़ी हुई दो नौकाओंके पुटके समान अथवा जौको राशिके समान नीचे चौड़ा और ऊपर संकीर्ण हो जाता है ।।४४१२॥ वेदीसे पंचानबे हजार योजन भीतर प्रवेश करनेपर चारों दिशाओंमें नीचे चार पातालविवर हैं ॥४४२॥ उनमें पूर्व दिशामें पाताल, दक्षिणमें बडवामुख, पश्चिममें कदम्बुक और उत्तरमें यूपकेसर नामका पाताल है ॥४४३॥ इन चारों पातालोंके मूल और अग्रभागका विस्तार दश हजार योजन है तथा गहराई और अपने मध्य भागका विस्तार एक-एक लाख योजन प्रमाण माना गया है ।।४४४॥ ये पाताल-विवर गोलीके समान हैं अर्थात् इनका तल और ऊपरका विस्तार अल्प है तथा मध्यका अधिक है। इनकी वज्रमयो दोवालोंकी मोटाई सब ओरसे पांच-पांच सौ योजन है ।।४४५।। इन विवरोंके तीन-तीन भाग हैं उनमें से एक भाग तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीस योजन और एक कला प्रमाण है ।।४४६।। इनके तीसरे ऊर्ध्व भागमें केवल जल रहता है, नीचेके भागमें बलवान् वायु रहती है और बीचके भागमें क्रमसे जल तथा वायु दोनों रहते हैं ॥४४७॥ पातालोंमें जो वायु है उसका उच्छ्वास-ऊँचा उठना और निःश्वास-नीचे आना स्वाभाविक है उसीके कारण उनमें जलका ऊँचा-नीचा परिवर्तन होता रहता है अर्थात् जब वायु ऊपर उठती है तब जल ऊपर उठ जाता है और जब वायु नीचे बैठती है तब जल नीचे बैठ जाता है ।।४४८।। पातालोंका पन्द्रहवां भाग शुक्लपक्षमें धीरे-धीरे वायुसे भरता रहता है और कृष्णपक्षमें जलसे । अमावस्या और पूर्णिमाके दिन उनकी स्वाभाविक स्थिति हो जाती है ।।४४९।। इन पाताल-विवरोंका पृथक्-पृथक अन्तर १. स्थिति स्यात्पञ्चसन्धिषु म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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