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________________ ९४ हरिवंशपुराणे पाण्डुके सन्ति चत्वारो महादिक्ष जिनालयाः । सर्वरत्नमया दिव्या नित्या यकृतकस्वतः ॥३५४॥ पञ्चविंशतिरायामः सार्धाः द्वादश विस्तृतिः । अर्द्धक्रोशोऽवगाहः स्यादुच्छायोऽष्टादश त्रिपाद् ॥३५५॥ द्वारस्य चोच्छ यस्तेषां चतुर्योजनसंमितः । द्वे तु विस्तृतिरस्याई मणुद्वारद्वयस्य हि ॥३५६॥ वने सौमनसे तेषां तदेव द्विगुणं मवेत् । कुल वक्षारशैलेष मानं सौमनसोदितम् ॥३५॥ नन्दने मद्रशाले च जिनायतनगोचरम् । प्रत्येक द्विगुणं मानं तद् यत्सौमनसे बने ॥३५॥ विजयाद्धेषु सर्वेषु सिद्धायलनगोचरम् । मानं तदेव बोद्धव्यं विजयाई भरते तु यत् ॥३५९॥ अष्टायामो द्विविस्तारः सर्वषु चतुरुच्छ्रितः । देवच्छन्दोऽवगाढश्च गव्यूतिस्तेषु वेश्मषु ॥३६०॥ शुम्भद्रत्नमहास्तम्भशातकुम्मात्ममित्तिमिः । चन्द्रादित्योत्पतत्पक्षिमृगयुग्माद्यलंकृतः ॥३६१॥ रत्नकाञ्चननिर्माणाः पञ्च चापशतोच्छ्रिताः । अष्टोत्तरशतं तत्र जिनानां प्रतिमा मताः ॥३६॥ नागमयुगे तासां प्रत्येकं सप्रकीर्णके । सनत्कुमारसर्वाह्न निर्वृत्तिश्रुतमूर्तिमिः ॥३६३॥ उत्पन्न हुए तीर्थकर बाल्यकालमें देवोंके द्वारा अभिषेकको प्राप्त होते हैं। भावार्थ-भरत क्षेत्रके तीर्थंकरोंका पाण्डुक शिलापर, पश्चिम विदेह क्षेत्रके तीर्थंकरोंका रक्तापर और पूर्व विदेहके तीर्थंकरोंका रक्तकम्बला शिलापर जन्माभिषेक होता है ||३५|| पाण्डुक वनकी चारों महादिवाओंमें चार जिनालय हैं जो सर्वरत्नमय हैं, दिव्य हैं तथा अकृत्रिम होनेसे नित्य हैं ।।३५४।। इनकी पचीस योजन लम्बाई, साढ़े बारह योजन चौड़ाई, आधा कोश गहराई और पौने उन्नीस योजन ऊँचाई है ।।३५५॥ प्रत्येक मन्दिरमें एक बड़ा तथा आजूबाजूमें दो लघु द्वार हैं। इनमें बड़े द्वारकी ऊँचाई चार योजन और चौड़ाई दो योजन है। तथा लघद्वारोंकी ऊंचाई और चौडाई इससे आधी है ||३५६|| पाण्डक वनके समान सौमनस वनकी चारों दिशाओंमें भी चार जिनालय हैं और उनके द्वारोंको लम्बाई-चौड़ाई आदि पाण्डुक वनके चैत्यालयोंसे दूनी है। कुलाचल तथा वक्षार गिरियोंपर जो जिनालय हैं उनकी लम्बाई-चौड़ाई आदि भी सौमनस बनके चैत्यालयोंके समान कही गयो है ॥३५७।। इसी प्रकार नन्दन वन और भद्रशाल वनमें भी चार-चार जिनालय हैं उनकी ऊंचाई तथा चौड़ाई आदिका प्रमाण सोमनस वनके जिनालयोंसे दुना है ||३५८|| समस्त विजयाध पर्वतोपर जो सिद्धायतन-जिनमन्दिर हैं उनका प्रमाण वही जानना चाहिए जो कि भरत क्षेत्र सम्बन्धी विजयार्धके जिन-मन्दिरोंका है ॥३५९|| उन समस्त जिनालयोंमें आठ योजन लम्बा, दो योजन चौड़ा, चार योजन ऊंचा और एक कोश गहरा देवच्छन्द नामका एक गर्भगृह है ॥३६०|| वह गर्भगृह, देदीप्यमान रत्नोंसे बने हुए विशाल स्तम्भों, सुवर्णमयी दीवालों तथा उनमें खिचे हुए चन्द्र, सूर्य, उड़ते हुए पक्षी एवं हरिण-हरिणियोंके जोड़ोंसे अलंकृत है ॥३६१॥ उस गर्भगृहमें सुवर्ण तथा रत्नोंसे निर्मित पांच सौ धनुष ऊँची एक सौ आठ जिन-प्रातमाएं विद्यमान हैं ॥३६२॥ उन प्रतिमाओंके समीप चमर लिये हुए नागकुमार और १. सर्वरत्नमहादिव्या म.। २. तनुरुच्छ्रितः म.। ३. त्रिलोकप्रज्ञप्तौ देवच्छन्दस्य प्रमाणं भिन्न प्रकार वर्तते-वसहीऐ गब्भगिहे देवच्छन्दो दुजोयणच्छेहो । इगिजोयणवित्थारो च उजोयण दीहसंजुत्तो ॥१८५५।। सोलस कोसुच्छेहं समचउरस्सं तदद्धवित्यारं । लोयविणिच्छायकत्ता देवच्छन्दं परूवेई ॥१८६६॥ ( पाठान्तरम् ) ४. सचामरे । ५. सदृशे म. । सर्वाणि ग., ङ., ख. सर्वाण क. । सिरि सुददेवीण तहा सव्वार्टी सणकुमार जक्वाणं । रूवाणि पत्तेकं पडि वररयणाह रइदाणि ।।१८८१।। सिरिदेवी सुददेवी सव्वाण सणककुमार जावाणं । रूवाणि य जिणपासे मंगलमट्रविहमवि होदि ॥९८८।। -त्रिलोकसार Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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