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________________ चतुर्थः सर्गः सर्वेन्द्र कनिगोदास्ते त्रिद्वाराश्च त्रिकोणकाः। द्वित्र्येकपञ्चसप्तात्मद्वारकोणास्ततः परे ॥३५॥ संख्येयव्यासयुक्तानां निगोदानां निजान्तरम् । गव्यूतयः षडल्पं स्यादनल्पं द्वादशैव ताः ॥३५३॥ असंख्येयप्रमाणानामसंख्यं महदन्तरम् । योजनानां सहस्राणि सप्तवात्यल्पमन्तरम् ॥३५४॥ 'त्रिगम्यूतिश्चतुर्भागसप्तयोजनमात्रकम् । धर्मानिगोदजा जीवा खमुत्पत्य पतन्त्यधः ॥३५५॥ गम्यूतिद्वितयं साधं सपञ्चदशयोजनम् । वंशानिगोदजन्मानः खमुत्पत्य पतन्त्यधः ॥३५६॥ एकत्रिंशत्तु गव्यूत्या योजनानि नभस्तले । मेघानिगोदजा जीवाः खमुल्लंघ्य पतन्त्यधः ॥३७॥ द्विषष्टियोजनान्यूचं गव्यूतिद्वयमुद्गताः । निपतन्त्युग्रदुःखास्तेिऽञ्जनाजनिगोदजाः ॥३५८॥ पञ्चविंशतिसन्मिनासयोजनमातुराः । खमुत्पत्य पतन्त्येव पञ्चमीस्था निगोदजाः ॥३५९॥ पञ्चाशता विमिश्रं तु योजनानां शतद्वयम् । वियदुत्पत्य षष्ठीस्थनिगोदोत्थाः पतन्त्यधः ॥३६॥ सप्तमीस्थनिगोदोत्थाः सपञ्चशतयोजनम् । अध्वानमूर्ध्वमुत्पत्य पतन्ति वसुधातले ॥३६१॥ असुरा आतृतीयान्तं योधयन्ति परस्परम् । प्रयुध्यते स्वयं तेऽपि ज्ञात्वा वैरं पुरातनम् ॥३६२॥ कुन्तक्रकचशूलाये नाशस्तैस्तनूनवैः । खण्डं खण्डं विधीयन्ते पीडयन्ति परस्परम् ॥३६३॥ 'सूतकस्येव संघातः शरीरस्य प्रजायते । यावदायुःस्थितिस्तेषां न तावन्मरणं भवेत् ॥३६४॥ शारीरं मानसं दुःखमन्योऽन्योदीरितं खलु । सहन्ते नारका नित्यं पूर्वपापविपाकतः ॥३६५॥ दुकोने, कितने ही तीन द्वारवाले तिकोने, कितने ही पांच द्वारवाले पंचकोने और कितने ही सात द्वारवाले सतकोने हैं ॥३५२।। इनमें संख्यात योजन विस्तारवाले विलोंका अपना जघन्य अन्तर छ: कोश और उत्कृष्ट अन्तर बारह कोश है ।।३५३।। एवं असंख्यात योजन विस्तारवाले विलोंका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात योजन तथा जघन्य अन्तर सात हजार योजन है ।।३५४|| घर्मा नामक पहली पृथिवीके उत्पत्ति-स्थानोंमें उत्पन्न होनेवाले नारकी जीव जन्मकालमें जब नीचे गिरते हैं तब सात योजन सवा तीन कोश ऊपर आकाशमें उछलकर पुनः नीचे गिरते हैं ॥३५५॥ दूसरी वंशा पथिवीके निगोदोंमें जन्म लेनेवाले नारकी पन्द्रह योजन अढाई कोश आकाशमें उछलकर नीचे गिरते हैं ॥३५६॥ तीसरी मेघा पृथिवीमें जन्म लेनेवाले जीव इकतीस योजन एक कोश बाकाशमें उछलकर नीचे गिरते हैं ।।३५७|| चौथी अंजना पृथिवोके निगोदोंमें जन्म लेनेवाले जीव बासठ योजन दो कोश उछलकर नीचे गिरते हैं और तीव्र दुःखसे दुःखी होते हैं ॥३५८॥ पांचवीं पृथिवीके निगोदोंमें जन्म लेनेवाले नारकी अत्यन्त दुःखी हो एकसौ पच्चीस योजन आकाशमें उछलकर नीचे गिरते हैं ॥३५९॥ छठवीं पृथिवीमें स्थित निगोदोंमें जन्म लेनेवाले जीव दो सौ योजन आकाशमें उछलकर नीचे गिरते हैं ।।३६०॥ और सप्तमी पृथिवीमें स्थित निगोदोंमें उत्पन्न हुए जीव पांच सौ धनुष ऊंचे उछलकर पृथिवी तलपर नीचे गिरते हैं ॥३६॥ तीसरी पथिवी तक असुरकूमार देव नारकियोंको परस्पर लड़ाते हैं। इसके सिवाय वे नारकी पुराने वैर भावको जानकर स्वयं भी लड़ते रहते हैं ॥३६२॥ विक्रिया शक्तिके द्वारा अपने शरीरसे ही उत्पन्न होनेवाले भाले, करोंत तथा शूल आदि नाना शस्त्रोंसे उन नारकियोंके खण्ड-खण्ड कर दिये जाते हैं और परस्पर एक दूसरेको पीड़ा पहुँचाते हैं ।।३६३।। खण्ड-खण्ड होनेपर भी पारेके समान उनके शरीरके टुकड़ोंका पुनः समूह बन जाता है और जब तक उनकी आयुकी स्थिति रहती है तब तक उनका मरण नहीं होता ।।३६४।। ये नारकी पूर्व कृत पाप कर्मके उदयसे निरन्तर एक १. अतः परं म. ख. पुस्तकयोः अयं श्लोकोऽधिकोऽस्ति-"क्रोशत्रयं सतशिं योजनानां च सप्तकम् । समत्पतन्ति धर्मायां शेषास्तु द्विगुणोत्तरम् ।" २. एष श्लोकः ड. पुस्तके नास्ति । ३. मपस्तके एतस्य श्लोकस्य स्थाने निम्नांकितः श्लोकोऽस्ति-'यजिनं पंचदशकं सार्धक्रोशद्वयं तथा। समुच्छलन्ति वंशायां पतन्ति च निगोदजाः। ४. पारदस्येव । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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