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________________ ५० विषय द्वैतापत्ति द्वैत बिना अद्वैत नहीं होता २६ पृथक्त्व - एकान्तकी सदोषता २७ एकत्वके लोपमें सन्तानादिक नहीं बनते ज्ञानको ज्ञेयसे सर्वथा भिन्न मानने में दोष वचनोंको सामान्यार्थक माननेमें दोष उक्त उभय तथा अवक्तव्य एकान्तोंकी सदोषता पृथक्त्व-एकत्व एकान्तोंका अवस्तुत्व-वस्तुत्व एकत्व - पृथक्त्व एकान्तोंकी निर्दोष व्यवस्था देवागम पृष्ठ विषय २५ २७ २८ Jain Education International २८ २९ ३० ३० विवक्षा तथा अविवक्षा सत्की ही होती है ३१ एक वस्तुमें भेद और अभेदकी अविरोध विधि ३१ नित्यत्व - एकान्तकी सदोषता ३३ प्रमाण और कारकोंके नित्य होनेपर विक्रिया कैसी ? ३४ कार्यके सर्वथा सत् होने पर उत्पत्ति आदि नहीं बनती नित्यत्वकान्त में पुण्य-पापादि नहीं बन क्षणिक -एकान्तकी सदोषता ३६ कार्यके सर्वथा असत् होनेपर दोषापत्ति ३४ ३६ ३७ पृष्ठ क्षणिकान्तमें हेतु - फलभावादि नहीं बनते संवृति और मुख्यार्थकी स्थिति ३७ ३८ चतुष्कोटि-विकल्पके अवक्तव्य ३८ की बौद्ध-मान्यता अवक्तव्यकी उक्त मान्यतामें दोष ३९ निषेध सत्का होता है असत्का नहीं ४० अवस्तुकी अवक्तव्यता और वस्तुकी अवस्तुता सर्वधर्मोके अवक्तव्य होनेपर उनका कथन नहीं बनता अवाच्यका हेतु अशक्ति, अभाव या अबोध ? क्षणिकान्त में हिंसा हिंसकादि ४२ ४३ की विडम्बना For Private & Personal Use Only ४१ ४४ ४५ नाशको निर्हेतुक माननेपर दोषापत्ति विरूपकार्यारम्भके लिए हेतुकी मान्यता में दोष स्कन्धादिके स्थित्युत्पत्तिव्यय नहीं बनता ४६ उक्त उभय तथा अवक्तव्य एकान्तोंकी सदोषता नित्य-क्षणिक - एकान्तोंकी निर्दोष व्यवस्थाविधि ४७ ४९ ४९ www.jainelibrary.org
SR No.001170
Book TitleAptamimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages190
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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