SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 60
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रस्तावना मुख्य और अन्य धर्म गौण हैं । इसे समझनेके लिये उन्होंने प्रत्येक कोटि (भङ्ग-वचनप्रकार) के साथ 'स्यात्' निपात-पद लगानेकी सिफारिश की और 'स्यात्' का अर्थ 'कथञ्चित्'-किसी एक दृष्टि-किसी एक अपेक्षा बतलाया। साथ ही उन्होंने प्रत्येक कोटिकी निर्णयात्मकताको प्रकट करनेके लिए प्रत्येक वाक्यके साथ एवकार पदका प्रयोग भी निर्दिष्ट किया, जिससे उस कोटिकी वास्तविकता प्रमाणित हो, काल्पनिकता या सांवृतिकता नहीं । तत्त्वप्रतिपादनकी इन सात कोटियोंको उन्होंने एक नया नाम भी दिया । वह नाम है भङ्गिनी प्रक्रिया-सप्तभङ्गी अथवा सप्तभङ्गनय । समन्तभद्रकी वह परिष्कृत सप्तभङ्गो इस प्रकार प्रस्तुत हुई१. (क) विधिनिषेधश्च कथञ्चिदिष्टौ विवक्षया मुख्यगुणव्यवस्था । ___ स्वयम्भू० २५ । (ख) विवक्षितो मुख्य इतीष्यतेऽन्यो गुणोऽविवक्षो न निरात्मकस्ते । स्वयम्भू० ५३ । २. (अ) वाक्येष्बनेकान्तद्योती गम्यं प्रति विशेषणम् । स्यान्निपातोऽर्थयोगित्वात्तव केवलिनामपि ।। _आप्तमी० का० १०३ । (आ) तद्योतनः स्याद् गुणतो निपातः युक्त्य० ४३ । ३. स्याद्वादः सर्वथैकान्तत्यागात् किंवृत्तचिद्विधिः । आप्तमी० १०४ । ४. (क) यदेवकारोपहितं पदं तदस्वार्थतः स्वार्थमवच्छिनत्ति । युक्त्य० ४१ । (ख) अनुक्ततुल्यं यदनेवकारं व्यावृत्त्यभावान्नियमद्वयेऽपि । युक्त्य० ४२ । ५. प्रक्रियां भङ्गिनीमेनां नयनयविशारदः । ___ आप्तमी० २३ । ६. 'सप्तभङ्गनयापेक्षः ....." आप्तमी० १०४ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001170
Book TitleAptamimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages190
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy