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________________ इसमें प्रयुक्त 'चट्ठाणी' पद में 'चदुण्हं ठाणाणं समाहारो चट्ठाणी' इस प्रकार से धवला में 'द्विगु समास का उल्लेख करते हुए सूत्रोक्त कृष्णादि तीन लेश्याओं में से प्रत्येक में ओघ के समान पृथक्-पृथक् चार गुणस्थानों का सद्भाव प्रकट किया गया है।' (४) विभक्तिलोप-सूत्र १,१, ४ (पु०१) में 'गइ' और 'लेस्सा भविय सम्मत्त सण्णि' इन पदों में कोई विभक्ति नहीं है। इस सम्बन्ध में धवला में यह स्पष्ट किया गया है कि 'आईममंतवण्ण-सरलोवो" सूत्र के अनुसार यहाँ इन पदों में विभक्ति का लोप हो गया है। आगे 'अहवा' कहकर विकल्प के रूप में यह भी कह गया है कि 'लेस्सा-भविय-सम्मत्त-सण्णिआहारए' यह एक पद है, इसीलिए उसके अवयव पदों में विभक्तियां नहीं सुनी जाती हैं। (५) वेदनाखण्ड के प्रारम्भ में जो विस्तार से मंगल किया गया है उसमें यह एक सूत्र हैगमो आमोसहिपत्ताणं (२,१,३०)। इसकी व्याख्या करते हुए धवला में 'आमर्षः औषधत्वं प्राप्तो येषां ते आमों षधप्राप्ताः' इस प्रकार से बहुव्रीहि समास किया है। इस प्रसंग में वहाँ यह शंका उठायी गई है कि सूत्र में सकार क्यों नहीं सुना जाता । इसके उत्तर में कहा गया है कि 'आई-ममंतवण्ण-सरलोवो' इस सूत्र के अनुसार यहाँ सकार का लोप हो गया है। पश्चात् वहीं दूसरी शंका यह की गई कि 'ओसहि' में इकार कहां से आ गया। इसके उत्तर में कहा गया है कि 'एए छच्च समाणा" इस सूत्र के आधार से यहाँ हकारवर्ती अकार के स्थान में इकार हो गया है। (६) वेदना अधिकार के अन्तर्गत १६ अनुयोगद्वारों में जो ८वा 'वेदनाप्रत्ययविधान' अनुयोगद्वार है उसमें नेगमादि नयों की अपेक्षा ज्ञानावरणादि वेदनाओं के प्रत्ययों का विचार किया गया है। उस प्रसंग में शब्दनय की अपेक्षा ज्ञानावरणवेदना के प्रत्यय का विचार करते हुए उसे अवक्तव्य कहा गया है। उसका कारण शब्दनय की अपेक्षा समास का अभाव कहा है। समास के अभाव को सिद्ध करते हुए धवला में पदों का समास 'क्या अर्थगत है, क्या पदगत है अथवा उभयगत है' इन तीन विकल्पों को उठाकर क्रमशः उन तीनों में ही समास के अभाव को सिद्ध किया गया है। (७) वर्गणा खण्ड के अन्तर्गत 'स्पर्श' अनुयोगद्वार में सर्वस्पर्श का प्ररूपक यह एक सूत्र आया है'जं दव्वं सव्वं सव्वेण फुसदि, जहा परमाणुदव्वमिदि, सो सव्वो सव्वफासो णाम ।" ---सूत्र ५,३,२२ इसका अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार परमाणु द्रव्य सर्वात्मस्वरूप से अन्य परमाणु का स्पर्श करता है उसी प्रकार जो द्रव्य सर्वात्मस्वरूप से अन्य द्रव्य का स्पर्श करता है उसका नाम १. धवला पु० ५, पृ० २२६ २. कीरइ पयाण काण वि आई-मज्झंतवण्ण-सरलोवो।जयधवला १,१३३ ३. धवला पु० १, पृ० १३३ ४. एए छच्च समाण दोणिय संझक्खरा अट्ट॥ __अण्णोण्णस्स परोप्परमुवेंति सव्वे समावेसं ॥-धवला पु० १२, पृ० २८६ ५, धवला पु०६, पृ० ६५-६६ .६. धवला पु० १२, पृ० २६०-६१ बदसण्डागम पर टीकाएँ | ३५० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001016
Book TitleShatkhandagama Parishilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages974
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Ethics
File Size18 MB
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