Book Title: Vimalsuri krut Paumchariya me Pratima Vigyan Parak Samagree
Author(s): Maruti Nandan Prasad Tiwari, Kamalgiri
Publisher: Z_Aspect_of_Jainology_Part_3_Pundit_Dalsukh_Malvaniya_012017.pdf
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विमलसूरिकृत पउमचरिय में प्रतिमाविज्ञान-परक सामग्री डा० मारुतिनन्दन प्रसाद तिवारी एवं डा० कमल गिरि जैन दर्शन में प्रारम्भ से ही जनभावना के सम्मान की वृत्ति रही है। इसी कारण अन्य भारतीय धर्मों के देवताओं को जैन देवविभाव में औदार्यपूर्वक प्रवेश देकर सम्माननीय स्थान दिया गया। राम और कृष्ण जनमानस से जुड़े सर्वाधिक लोकप्रिय पात्र रहे हैं जिनके विस्तृत उल्लेख क्रमशः रामायण और महाभारत में हैं। इन महाकाव्यों के चरित्र नायक राम और कृष्ण की जनप्रियता के कारण ही ई० शती के प्रारम्भ या कुछ पूर्व में इन्हें जैन देवमण्डल में स्थान मिला। पौराणिक दृष्टि से राम के पूर्ववर्ती होने के बाद भी जैन परम्परा में राम की अपेक्षा कृष्ण के उल्लेख प्राचीन हैं। उतराध्ययनसूत्र, अन्तकृतदशाः एवं ज्ञाताधर्मकथांग जैसे प्रारम्भिक आगम ग्रन्थों में वासुदेव से सन्दभित विभिन्न प्रसंग वणित हैं । जेन परम्परा में राम का प्रारम्भिक और साथ ही विस्तृत उल्लेख नागेन्द्रकुल के ( श्वेताम्बर ) विमलसूरिकृत पउमचरिय (४७३ ई०) में हुआ है।' रामायण के तीनों प्रमुख पात्रों, राम, लक्ष्मण और रावण ( दशानन ), को जैन देवमण्डल में लगभग ५वीं शती ई० में ६३ शलाकापुरुषों की सूची में क्रमशः आठवें, बलदेव, वासुदेव और प्रतिवासुदेव के रूप में सम्मिलित किया गया। पउमरिय में उल्लेख है कि सर्वप्रथम महावीर ने रामकथा का वर्णन किया जिसे कालान्तर में साधुओं ने धारण किया; विमलसूरि ने उसो कथा को अधिक विस्तार तथा स्पष्टता के साथ गाथाओं में निबद्ध किया । पउमचरिय में जैन प्रतिमाविज्ञान से सम्बन्धित प्रचुर सामग्री भी है जिसका अध्ययन यहां उद्दीष्ट है। यद्यपि पउमचरिय के आधार पर सांस्कृतिक एवं भौगोलिक अध्ययन के प्रयास हुए हैं, १. पउमचरिय में राम का मुख्यतः पद्म और कहीं-कहीं राम (७८.३५, ४१, ४२), राघव (१.८८; ३९.१२६) एवं हलधर (३५.२२; ३९.२०,३१) नामों से भी उल्लेख हुआ है। पउमरिय के पश्चात् जैन परम्परा में रामकथा से सम्बन्धित लिखे गए ग्रन्थों में संघदासकृत वसुदेवहिण्डो (ल० ६०९ ई०), रविषेणकृत पद्मपुराण ( ६७८ ई० ), शीलाचार्य कृत चउपन्नमहापुरुसरिय ( ल० ८वीं शती ई० ), गुणभद्रकृत उत्तरपुराण ( ल० ९वीं शती ई०), पुष्पदन्तकृत महापुराण ( २६५ ई० ) एवं हेमचन्द्रकृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र (१२वीं शती ई० का उत्तरार्द्ध) मुख्य हैं। २. ६३ शलका-पुरुषों की सूची सर्वप्रथम पउमचरिय (५.१४५-५६) में ही मिलती है । ३. यह प्रचलित किंवदन्ती प्रतीत होती है । पउमरिय १.९० (सं० एच० जेकोबो एवं मुनि पुण्यविजय, प्राकृत ग्रन्थ परिषद्, ग्रन्थांक-६, वाराणसी, १९६२)। ४. चन्द्र, के० आर०, ए क्रिटिकल स्टडी ऑव पउमचरिय, वैशाली, १९७०; मिश्रा, कामताप्रसाद पउम चरियम् का भोगोलिक अध्ययन पी-एच० डी० थीसिस (अप्रकाशित), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, १९८०। Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विमलसरिकत पउमचरिय में प्रतिमाविज्ञान-परक सामग्री १४९ किन्तु इसको प्रतिमाविज्ञान-परक सामग्री के अध्ययन का अब तक कोई प्रयास नहीं हुआ है। जैन मूर्तिविज्ञान के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल का विशेष महत्व है। गुप्तकालीन कृति पउमचरिय में जैन देवमण्डल की स्पष्ट अवधारणा के साथ ही प्रतिमाविज्ञान-विषयक सामग्रो का मिलना तुलनात्मक अध्ययन को दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । ६३ शलाकापुरुषों (श्रेष्ठजनों) की पूरी सूची सर्वप्रथम पउमचरिय में ही मिलती है। यद्यपि शलाकापुरुषों की कल्पना पूर्ववर्ती आगम ग्रन्थों (स्थानांग, समवायांग एवं कल्पसूत्रों) में भी उपलब्ध है, किन्तु इनमें ६३ के स्थान पर केवल ५४ ही उत्तम या शलाकापुरुषों के सन्दर्भ, और वह भी बिना नामोल्लेख के, हैं। पउमचरिय में जिनमति-निर्माण और पूजा के तो अनेक उल्लेख हैं। जिन-बिम्बों से युक्त रत्नजटित मुद्रिकाओं के धारण करने के यहाँ मिलने वाले सन्दर्भ जिन प्रतिमाओं की उस काल में लोकप्रियता के साक्षी हैं। एक स्थल पर 'सिंहोदर' नाम के शासक द्वारा रत्ननिर्मित मुनिसुव्रतबिंब से युक्त स्वर्णमुद्रिका को दाहिने अंगूठे में धारण करने, और मस्तक पर ले जाकर जिनेन्द्र को प्रणाम करने का उल्लेख मिलता है।' राम, लक्ष्मण और रावण को २०वें तीर्थकर मुनिसुव्रत के साथ समकालिकता के बावजूद इस ग्रन्थ में कहीं भी इनके द्वारा मुनिसुव्रत-प्रतिमा की स्थापना या पूजन, या उनसे भेंट का कोई सन्दर्भ नहीं है। साथ ही जिन मुनिसुव्रत के मन्दिर एवं मूर्तियों के उल्लेख भी अत्यल्प हैं । मुनिसुव्रत की अपेक्षा १६वें तीर्थंकर शान्तिनाथ के मन्दिरों एवं मूर्तियों के अधिक सन्दर्भ हैं जो उस काल में शान्तिनाथ को विशेष लोकप्रियता के साक्षी हैं । इस ग्रन्थ में राम की तुलना में रावण का अधिक जिन भक्त के रूप में निरूपित किया गया है। राम द्वारा जहाँ केवल कुछ हो स्थलों पर जिन मन्दिर की स्थापना और उसमें पूजन के उल्लेख हैं, वहीं रावण द्वारा अनेक स्थलों पर जिन प्रतिमाओं की स्थापना एवं पूजन तथा जिन मन्दिरों के जीर्णोद्धार के सन्दर्भ १. कारेमि रयणचित्तं, सुव्वयजिणबिम्बसन्निहियं । ___ सा नरवईण मुद्दा, कारावेऊण दाहिणगुढे ॥ पउमचरिय ३३.५६-५७ २. एक स्थल पर अग्नि में प्रवेश के पूर्व सीता द्वारा मुनिसुव्रतस्वामी की वन्दना करने का उल्लेख है । पउमरिय १०२.१४ ३. सीयाएँ समं रामो, थोऊण जिणं विसुद्धभावेणं । वरधम्म आयरियं, पणमइ य पुणो पयत्तेणं ।। पउमचरिय ३७.६१ पउमो सीयाएँ समं, जिणवरभवणाण वन्दणं काउं। सद्द-रस रुवमाइं, भुञ्जइ देवो व्व विसयसुहं ।। पउमचरिय ९२.२६ जिणवरभवणाणि तहिं रामेणं कारियाणि बहुयाणि । पउमचरिय ८०.१५; द्रष्टव्य, पउमचरिय ४०.१६ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५०. डा० मारुतिनन्दन प्रसाद तिवारी एवं डा० कमलगिरि मिलते हैं।' प्रस्तुत ग्रन्थ विद्यादेवियों के प्रारम्भिक विकास के अध्ययन की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। राम, लक्ष्मण, रावण एवं ग्रन्थ के अन्य पात्रों द्वारा युद्धादि के समय अनेकशः विद्याओं की प्राप्ति के लिए पूजन आदि के सन्दर्भ मिलते हैं। जैन धर्म पर तन्त्र के प्रभाव के अध्ययन की दृष्टि से भी ग्रन्थ की कुछ सामग्री महत्त्वपूर्ण है। राम और लक्ष्मण द्वारा प्राप्त की गई गरु डा और केसरी विद्याओं से ही कालान्तर में क्रमशः अप्रतिचक्रा और महामानसी विद्याओं का स्वरूप विकसित हुआ । पउमचरिय में यक्ष-यक्षियों के उल्लेख बहुत कम हैं। केवल प्राचीन परम्परा के पूर्णभद्र एवं माणिभद्र यक्षों के ही उल्लेख हैं। इनके अतिरिक्त विनायकपषण यक्ष, महायक्ष अनादृत तथा सुनामा यक्षी के भी उल्लेख मिलते हैं। इस ग्रन्थ में प्राचीन परम्परा की बहुपुत्रिका या अंबिका यक्षी तथा सर्वानुभूति या कुबेर यक्ष के उल्लेख का अभाव आश्चर्यजनक है। एक स्थल पर ह्री, श्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि, एवं लक्ष्मी नाम की देवियों का भी नामोल्लेख हुआ है। पूर्ववर्ती आगम ग्रन्थों, विशेषतः अंगविज्जा एवं व्याख्या-प्रज्ञप्ति में हमें लोकपूजन में प्रचलित देवताओं की विस्तृत सूची मिलती है, किन्तु पउमचरिय में नाग-नागो, प्रेत, पितर, स्कन्द, विशाख तथा इसी प्रकार के अन्य किसी देवता का कोई सन्दर्भ नहीं मिलता। पउमचरिय में वस्तुतः यक्ष-यक्षी एवं लोकोपासना में प्रचलित देवों के स्थान पर विद्या देवियों को अधिक महत्त्व दिया गया है। पउमचरिय में राम के साथ हल और मूसल तथा लक्ष्मण के साथ चक्र एवं गदा के उल्लेख विचारणीय हैं। हल-मूसल एवं चक्र-गदा क्रमशः बलराम और कृष्ण-वासुदेव के आयुध हैं, जो परम्परा से राम और लक्ष्मण के पश्चात्कालीन हैं। रामकथा के प्रसंग में मथुरा एवं कृष्णलीला से सम्बन्धित कुछ अन्य स्थलों का उल्लेख भी आश्चर्य का विषय है। पउमचरिय के अन्त में यह भी उल्लेख है कि पूर्व ग्रन्थों में आये हुए नारायण तथा हलधर के चरितों को सुनकर ही विमलसूरि ने राघव चरित की रचना की। कई स्थलों पर राम को पद्म, हलधर, हलायुध और लक्ष्मण को १. पउमचरिय ८.२०; ९.८७-८९; १०.४६-४७, ५३; ११.३ । २. लद्धाओ गरुड-केसरिविज्जाओ राम-चक्कीणं । -पउमरिय ७८.४२ ३. पउमचरिय ६७.३५,३७,४०,४८ ४. पउमरिय ३५.२२-२६, ७.१५० ५. पउमचरिय ३५.३४ ६. पउमचरिय ३.५९ ७. पत्तो हलं समुसलं, रामो चक्कं च लक्खणो धीरो। -पउमचरिय ७८.४१ ......"देइ गयं लक्खणस्स सुरपवरो । दिव्वं हलं च मसलं, पउमस्स वि तं पणामेइ ।। -पउमचरिय ५९.८६ ८. सीसेण तस्स रइयं, राहवचरियं तु सूरिविमलेणं । सोऊणं पुन्वगए, नारायण सीरिचरियाई ।। -पउमचरिय ११८.११८ Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नि-परक सामग्री विमलसूरिकृत पउमचरिय में प्रतिमाविज्ञान-परक सामग्री १५१ नारायण, चक्रधर तथा चक्रपाणि नामों या विशेषणों से भी अभिहित किया गया है।' एक स्थान पर विमलसूरि ने तीर्थंकरों के मध्य के कालान्तर से भारत (महाभारत) और रामायण के बीच ६ लाख से अधिक वर्षों के अन्तर का संकेत किया है ।२ (यह अंक निश्चित रूप से अत्यन्त अतिशयोक्तिपूर्ण है ।) पउमचरिय की ६३ महापुरुषों ( शलाकापुरुषों) की सूची में वर्तमान अवसर्पिणी काल के २४ जिनों के अतिरिक्त १२ चक्रवर्ती ( भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शान्ति, कुन्थु, अर, सुभूम, पद्म, हरिषेण, जयसेन, ब्रह्मदत्त ), ९ बलदेव (अचल, विजय, भद्र, सुप्रभ, सुदर्शन, आनन्द, नन्दन, पद्म या राम, बलराम ), ९ वासुदेव (त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयंभू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुरुषवर, पुण्डरीक, दत्त, नारायण या लक्ष्मण, कृष्ण) और ९ प्रतिवासुदेव ( अश्वग्रीव, तारक, मैरक, निशुम्भ, मधुकैटभ, बलि, प्रह्लाद, रावण, जरासंध ) के भी नामोल्लेख हैं। ग्रन्थ में आगे के उत्सर्पिणी काल में भी इतने ही महापुरुषों के होने का उल्लेख है। इस प्रकार जैन देवमण्डल की प्रारम्भिक अवधारणा की दृष्टि से पउमचरिय की ६३ महापुरुषों की सूची का विशेष महत्त्व है। पउमचरिय में ऋषभनाथ, पार्श्वनाथ एवं कुछ विद्याओं के अतिरिक्त अन्य किसी जैन देवता के लक्षणों की चर्चा नहीं है। ग्रन्थ के रचनाकाल ( ४७३ ई० ) तक कला में भी केवल ऋषभनाथ और पार्श्वनाथ तीर्थंकरों के ही लक्षण मिलते हैं। तीर्थकर मूर्तियों में यक्ष-यक्षी युगलों का अंकन ६ठी शती ई० में और यक्षों तथा विद्याओं का स्वतन्त्र निरूपण ल० आठवीं शती ई० में प्रारम्भ हुआ। जैन संप्रदाय में आराध्य देवों के अन्तर्गत जिनों का सर्वाधिक महत्त्व है। इन्हें देवाधिदेव भी कहा गया है। रामकथा से सम्बन्धित ग्रन्थ होने के बावजूद पउमचरिय में संभवतः इसी कारण तीर्थंकरों से सम्बन्धित अनेक सन्दर्भ हैं ।। २४ तीर्थंकरों की वन्दना के प्रसंग में ग्रन्थ के प्रारम्भ में ऋषभनाथ को जिनवरों में वृषभ के समान श्रेष्ठ तथा सिद्ध, देव, किन्नर, नाग, असुरपति एवं भवनेन्द्रों १. अवहिविसएण नाउं, हलधर-नारायणा तुरियवेगा। -पउमचरिय ३५.२२; ३९.२०, ३१,१२६; ७०.३३, ३६; ७२.२२; ७३.३,५, १९; ७६.३६, ७७.१; ७८.३२; ८०.२ २. छस्समंहिया उ लक्खा, वीरसाणं अन्तरं समवखायं । तित्थयरेहि महायस!, भारह-रामायणाणं तु ।। -पउमचरिय १०५.१६ ३. ज्ञातव्य है कि पउमचरिय में ६३ महापुरुषों की सूची में ९ बलदेव और ९ वासुदेव के नामोल्लेख के क्रम में राम और लक्ष्मण का उल्लेख बलराम और कृष्ण के पूर्व ही हुआ है । (५.१५४-५५) साथ ही जैन परम्परा के अनुरूप राम २०वें तीर्थकर मुनिसुव्रत और कृष्ण २२वें तीर्थंकर नेमिनाथ के समकालीन बताए गए हैं। पउमचरिय ५.१४५-५६ ५. पउमचरिय ५.१५७ ६. ग्रन्थ में जिन और तीर्थकर के साथ ही अर्हत् शब्दों का भी प्रयोग हुआ है । पउमचरिय १.१५.१२२ Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५२ डा० मारुतिनन्दन प्रसाद तिवारी एवं डा० कमलगिरि के समूह द्वारा पूजित बताया गया है। इसी प्रकार एक स्थल पर महावीर को भी तीनों लोकों द्वारा पूजित बताया गया है। विभिन्न प्रसंगों में तीर्थंकरों को ब्राह्मण देवों से श्रेष्ठ या उनके समकक्ष भी बताया गया है । एक स्थल पर अजितनाथ को ब्रह्मा, त्रिलोचन शंकर, स्वयं बुद्ध, अनन्तनारायण और तीनों लोकों के लिए पूजनीय अर्हत् कहा गया है। इसी प्रकार एक अन्य स्थल पर ऋषभनाथ को स्वयंभू, चतुर्मुख, पितामह, भानु, शिव, शंकर, त्रिलोचन, महादेव, विष्णु, हिरण्यगर्भ, महेश्वर, ईश्वर, रुद्र और स्वयंसंबुद्ध नामों से संबोधित कर देवता और मनुष्यों द्वारा वंदित होने का भी उल्लेख है।४ पउमचरिय मैं २४ तीर्थंकरों की सूची तीन स्थलों पर वर्णित है ।" इस सूची में चन्द्रप्रभ, सुविधिनाथ और महावीर का क्रमशः शशिप्रभ, कुसुमदंत ( या पुष्पदन्त ) और वीर नामों से भी उल्लेख हुआ है। ग्रन्थ में मन्दिरों में सिंहासनास्थित लम्बी जटा एवं मुकुट से शोभित ऋषभदेव, तथा धरणेन्द्र नाग के फणों से मण्डित पार्श्वनाथ की मूर्तियों के उल्लेख हैं। कुछ उदाहरणों में ऋषभदेव को श्रीवत्स से लक्षित भी बताया गया है। ऋषभनाथ, अजितनाथ, महावीर तथा कुछ अन्य तीर्थंकरों के जीवन चरितों का भी उल्लेख मिलता है। ग्रन्थ में विभिन्न तीर्थंकरों की प्रस्तर, स्वर्ण, रत्न एवं काष्ठ निर्मित प्रतिमाओं के भी अनेक सन्दर्भ हैं । ये तीर्थंकर मूर्तियाँ विभिन्न आकारों १. सिद्ध-सुर-किन्नरोरग-दणुवइ-भवणिन्दवन्दपरिमहियं । उसहं जिणवरवसह, अवसप्पिणिआइतित्थयरं ।। -पउमचरिय १.१; २८.४९ २. वीरं विलीणरयमलं, तिहयणपरिवन्दियं भयवं ॥ -पउमचरिय १.६ ३. नाह । तुमं बम्भाणो, तिलोयणो संकरो सयंबुद्धो । नारायणो अणन्तो, तिलोयपुज्जारिहो अरुहो । -पउमचरिय ५.१२२ ४. सो जिणवरो सयंभू, भाणु सिवो संकरो महादेवो । विण्हू हिरण्णगब्भो, महेसरो ईसरो रुद्दो ॥ -पउमचरिय १०९.१२, द्रष्टव्य,पउमचरिय २८-४८ ५. ऋषभनाथ, अजित, संभव, अभिनन्दन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपावं, चन्द्रप्रभ (शशिप्रभ), सुविधि (कुसुम दत्त या पुष्पदन्त), शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनन्त, धर्म, शांति, कुंथु, अर, मल्लि, मुनिसुव्रत, नमि, नेमि, पार्श्व एवं महावीर (वीर) -पउमचरिय १.१-७; ५.१४५-५१, २०.४-६ ६. पउमचारिय २८.३९ ७. पउमचरिय १.६ ८. पउमचरिय ४.४ ९. पउमचरिय ६६.११;७७.२७;८९.५९ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विमलसूरिकृत पउमचरिय में प्रतिमाविज्ञान-परक सामग्री १५३ बनती थी। जिन-बिम्ब-युक्त रत्नजटित मुद्रिका, अंगूठे बराबर जिन प्रतिमा तथा रावण द्वारा लघुका जिन प्रतिमा के सर्वदा साथ रखने से सम्बन्धित विभिन्न सन्दर्भ जिन प्रतिमा पूजन की लोकप्रियता के साक्षी हैं । पउमचरिय में विभिन्न स्थलों पर ऋषभनाथ एवं महावीर तीथंकरों के साथ सामान्यतः पाँच ( सिंहासन, छत्र, चामर, अशोक वृक्ष, भामण्डल ) २ या सात ( आसन, छत्र, चामर, भामण्डल, कल्पवृक्ष, दुन्दुभिघोष, पुष्पवर्षा ) प्रातिहार्यो के उल्लेख मिलते हैं । किन्तु दो स्थलों पर अजितनाथ और महावीर के साथ महाप्रातिहार्यों की संख्या आठ भी बताई गई है | ज्ञातव्य है कि गुप्तकाल तक जिनमूर्तियों में अष्टप्रातिहार्यो का नियमित रूप से अंकन होने लगा था। पउमचरिय में जिन मूर्तियों एवं मन्दिरों के निर्माण के भी प्रचुर सन्दर्भ हैं । एक उल्लेख के अनुसार मथुरा में सात जैन मुनियों ने शत्रुघ्न को जिन मन्दिरों के निर्माण तथा घर-घर में जिन प्रतिमाओं की स्थापना का निर्देश दिया था।७ एक स्थान पर कहा गया है कि अंगूठे के आकार की जिन प्रतिमा भी महामारी का विनाश करने में सक्षम है। संभवतः घर-घर में जिन प्रतिमा की स्थापना का सन्दर्भ इसी सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से प्रेरित था । विदेह, साकेतपुरी, मथुरा, दशपुर, लंका, पोतनपुर, कैलाशपर्वत, सम्मेतशिखर एवं इसी प्रकार अन्य कई स्थलों पर जिन मन्दिरों (या चैत्यों ) की विद्यमानता के उल्लेख हैं । मिथिला, लंकापुरी ( २ मन्दिर), दशपुर और साकेतपुरी के मन्दिर क्रमशः ऋषभनाथ, पद्मप्रभ ( और शान्तिनाथ ), चन्द्रप्रभ एवं मुनिसुव्रत को समर्पित थे । इस प्रकार पउमचरिय में केवल ऋषभनाथ, पद्मप्रभ, चन्द्रप्रभ, शान्तिनाथ एवं मुनिसुव्रत की ही मूर्तियों एवं मन्दिरों के उल्लेख मिलते हैं । अन्तिम तीन तीर्थंङ्करों - नेमिनाथ पार्श्वनाथ एवं महावीर के मन्दिरों एवं मूर्तियों का सन्दर्भ न देकर रचनाकार ने ऐतिहासिक काल १. पउमचरिय ३३.५६-५७ १०.४५-४६ २. पउमचरिय २.५३ ३. उप्पज्जइ आसणं जिणिन्दस्स | छत्ताइछत्त चामर, तहेव भामण्डलं विमलं ॥ कप्पदुमो य दिव्वो, दुन्दुहिघोसं च पुप्फवरिसं च । सव्वाइसयसमग्गो, जिणवरइड्ढि समणुपत्तो ॥ - पउमचरिय ४.१८-१९ ..... ४. इस सूची में दिव्यध्वनि का अनुल्लेख है । ५. अट्टमहापारिपरियरिओ । विहरइ जिणिन्दभाणू, बोहिन्तो भवियकमलाई । - पउमचरिय २.३६ 'चोत्तीसं च अइसया, अट्ठ महापाडिहेरा य ॥ - पउमचरिय ५.६० ६. चामरघर, प्रभामण्डल एवं देव दुन्दुभि का उल्लेख मिलता है । ७. पउमचरिय ८९.५०-५१ ८. पउमचरिय ८९.५३-५४ ९. पउमचरिय २८.३९; ३३.१२६; ७७.२५, २७; ६६.२६; ६७.३६; ७७.३; ८९.२० २० Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५४ डा० मारुतिनन्दन प्रसाद तिवारी एवं डा०कमलगिरि क्रम की मर्यादा का निर्वाह किया है। ज्ञातव्य है कि ये तीनों ही तीर्थकर मुनिसुव्रत के पश्चात्कालीन हैं। राम द्वारा पद्मप्रभ और चन्द्रप्रभ तथा रावण द्वारा शान्तिनाथ मन्दिरों में पूजन के कई सन्दर्भ मिलते हैं। इनके अतिरिक्त हरिषेण ( दसवें चक्रवर्ती ), बालि, विनयवती ( सामान्य-महिला ) एवं शत्रुघ्न द्वारा भी जिन मन्दिरों के निर्माण, पुनरुद्धार तथा मूर्तिपूजन के उल्लेख हैं । २ पउमचरिय के उल्लेख से प्रकट है कि तीर्थकर मूर्तियाँ अष्टप्रातिहार्यों सहित सामान्यतः ध्यानमुद्रा में सिंहासन पर विराजमान होती थीं। विमलसूरि ने जिनेन्द्रों की प्रतिमाओं को सर्वांगसुन्दर बनाने का विधान किया है। तीर्थंकरों के साथ यक्ष और यक्षी के निरूपण की कोई चर्चा नहीं है। केवल एक स्थल पर राजगृह के यक्ष मन्दिर का उल्लेख आया है। राम और लक्ष्मण की अपेक्षा पउमचरिय में रावण के अधिक उल्लेख हैं। पउमचरिय एवं परवर्ती ग्रन्थों में रामकथा के अनेकशः उल्लेख के बाद भी जैन स्थलों पर राम का मूर्त अंकन नहीं हुआ। मूर्त अंकन का एकमात्र उदाहरण खजुराहो के पाश्वनाथ मन्दिर (ल. ९५०-७० ई०) पर है। इस मन्दिर की उत्तरी भित्ति पर राम-सीता और हनुमान की मूर्तियाँ हैं जिसमें चतुर्भुज राम, सीता सहित आलिंगन मुद्रा में खड़े हैं और समीप ही कपिमुख हनुमान की भी आकृति बनी है। राम का एक दक्षिण कर पालित मुद्रा में हनुमान के मस्तक पर स्थित है। इस मन्दिर के शिखर पर भी दक्षिण की ओर रामकथा का एक दृश्य उत्कीर्ण है।५ दृश्य में क्लान्तमुख सीता को अशोकवाटिका में आसीन और कपिमुख हनुमान से राम की मुद्रिका प्राप्त करते हुए दिखाया गया हैं। पउमचरिय में देवताओं के चतुर्वर्गों ( भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क एवं वैमानिक ) का अनुल्लेख आगम ग्रन्थों में उनकी चर्चा को दृष्टिगत करते हुए सर्वथा आश्चर्यजनक है | लोकपालों (परवर्ती दिक्पालों) में भी केवल पाँच ही के नामोल्लेख मिलते हैं। एक स्थान पर लोकपालों से घिरे इन्द्र के ऐरावत गज पर आरूढ़ होने तथा इन्द्र द्वारा ही शशि (सोम), वरुण, कुबेर और यम की क्रमशः पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं में स्थापना का उल्लेख है। पउमचरिय में १. पउमचरिय ७७.२७, ६७.४२. २. हरिषेण द्वारा काम्पिल्यपर, विनयवती द्वारा गोवर्धन ग्राम तथा शत्रन द्वारा मथुरा में जिन मन्दिर निर्माण के उल्लेख मिलते हैं। -पउमचरिय ८.२०९; २०.११७; ८९.५८; ९.३; ७४-७६. ३. पउमचरिय ४४.११ ४. पउमचरिय ८२.४६ ५. तिवारो, मारुति नन्दन प्रसाद, एलिमेन्ट्स ऑव जन आइकनोग्राफी, वाराणसी, १९८३, पृ० ११५-१६ ६. सोऊण रक्खसवलं, समागयं लोगपालपरिकिण्णो । एरावणमारूढो, नयराओ निग्गओ इन्दो ।।-पउमचरिय ७.२२, ठविओ पुव्वाएँ ससी, दिसाएँ वरुणो य तत्थ अवराए । उत्तरओ य कुबेरो, ठविओ च्चिय दक्खिणाएँ जमो ॥-पउमचरिय ७.४७; एक स्थल पर इन्द्र द्वारा पाँचवें दिक्पाल के रूप में वैश्रवण को प्रतिष्ठित करने का भी उल्लेख है। -पउमचरिय ७.५६-५७ Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विमलसूरिकृत पउमचरिय में प्रतिमाविज्ञान-परक सामग्री १५५ केवल इन्द्र, वरुण, कुबेर एवं यम का ही लोकपालों की सूची में उल्लेख दो सम्भावनाओं की ओर निर्दिष्ट करता है : या तो पाँचवीं शती ई० के अन्त तक आठ दिक्पालों की सूची नियत नहीं हुई थी या फिर उन्हें जैन परम्परा में मान्यता नहीं मिली थी। इस सन्दर्भ में शशि ( या सोम ) का लोकपाल के रूप में उल्लेख भी महत्त्वपूर्ण है।' इस ग्रन्थ में इन्द्र के आयुध वज्र और सेनापति हरिणेगमेषी के भी उल्लेख हैं।' पउमचरिय में विभिन्न स्थलों पर विद्याधरों तथा उनके प्रमुखों के नाम और वंशावली भी दो गई है। इन विद्याधरों में पूर्णधन, मेघवाहन, सुलोचन ( विद्याधर अधिपति ), सहस्रनयन, धनवाहन, श्रीधर, अशनिवेग एवं रत्नरथ मुख्य हैं। विद्याधर पत्नियों एवं कन्याओं के हमें कुछ ऐसे ही नाम मिलते हैं जो कालान्तर में यक्षियों के नाम हुए। इनमें मनोवेगा और पद्मावती प्रमुख हैं। पउमचरिय में विद्याओं के उल्लेख ही निःसन्देह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। एक स्थल पर उल्लेख है कि ऋषभदेव के पौत्र, नमि और विनमि, को धरणेन्द्र ने बल एवं समृद्धि की अनेक विद्यायें प्रदान की थीं। युद्धादि अवसरों पर राम, लक्ष्मण, रावण, भानुकर्ण (कुम्भकर्ण), विभीषण आदि द्वारा अनेक विद्याओं की सिद्धि के विस्तृत सन्दर्भ हैं। ग्रन्थ में स्पष्टतः विद्याओं की सिद्धि से विभिन्न ऋद्धियों एवं शक्ति को प्राप्ति का संकेत दिया गया है। विद्याओं की प्राप्ति के लिए वीतरागी तीर्थंकरों की आराधना के सन्दर्भ सर्वप्रथम पउमचरिय में ही मिलते हैं। एक स्थल पर रावण द्वारा शान्तिनाथ के मन्दिर में बहुरूपा (या बहुरूपिणी) महाविद्या की सिद्धि करने तथा युद्धस्थल में इस महाविद्या के रावण के समीप ही स्थित होने के सन्दर्भ महत्त्वपूर्ण हैं। पउमचरिय के विवरण से विद्याओं को सिद्धि में तांत्रिक साधना का भाव भी स्पष्ट है। सिद्ध होने पर ये विद्याएं स्वामी के लिए सभी प्रकार के कार्य करने में सक्षम थों। रावण द्वारा सिद्ध बहुरूपा महाविद्या के लिए सम्पूर्ण त्रिलोक साध्य था। विद्या की साधना में तत्पर रावण के ध्यान की एकाग्रता को एकाग्र मन से सीता का चिन्तन करने वाले राम के समान बताया गया है। विभीषण का राम से यह कहना कि बहुरूपिणी महाविद्या की सिद्धि के बाद देवता भी रावण को जीतने में समर्थ नहीं होंगे-अत्यन्त १. मनु द्वारा वणित अष्टदिक्पालों की सूची में भी परवर्ती सुची के निऋति एवं ईशान् के स्थान पर सोम __एवं अर्क (सूर्य) के नामोल्लेख हैं । विमलसूरि की सूची मनु से प्रभावित प्रतीत होती है । . २. पउमचरिय ७.११ ३. पउभचरिय ५.२५७ ४. पउमचरिय ५.६५-७०, १६४, ६.१५७ ५. पउमचरिय ३.१४४-४९ ६. पउमरिय ६७.१-३; ६९.४६-४७; ७२.१५ ७. एयम्मि देसयाले, उज्जोयन्ती दिसाउ सव्वाओ। जयसइं कुणमाणी, बहुरूवा आगया विज्जा ।। तो भणइ महाविज्जा, सिद्धा हं तुज्झ कारणुज्जुत्ता । सामिय ! देहाऽऽत्ति, सज्झं मे सयलतेलोक्कं ।। -पउमचरिय ६८.४६-४७ Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५६ डा० मारुतिनन्दन प्रसाद तिवारी एवं दा० कमकगिरि महत्त्वपूर्ण है।' बहुरूपा विद्या की सिद्धि में रावण ने भूमि पर योगस्थ रूप में सहस्रदल पद्मों के साथ साधना की थी। एक स्थल पर राम का कूमारों और हनुमान की प्रव्रज्या पर टिप्पणी करते हुए यह कहना कि प्रयोगमती कशल विद्या के न होने के कारण ही वे तप और संयम को ओर अभिमुख हुए हैं, विद्याओं के महत्त्व को प्रकट करता है।' युद्ध में विजय प्राप्ति के उद्देश्य से राम और लक्ष्मण ने महालोचन देव का स्मरण किया था जिसने तुष्ट होकर राम को सिंहवाहिनी विद्या और लक्ष्मण को गरुडा विद्या दी। एक स्थान पर रावण द्वारा विविध रूपधारी हजारों विद्याओं की सिद्धि का भी उल्लेख हुआ है। इस ग्रंथ में रावण द्वारा सिद्ध अनेक विद्याओं में से एक स्थल पर ५५ विद्याओं की सूची भी दी गई है। इस सूची में आकाशगामिनी, कामदायिनी, कामगामी, दुर्निवारा, जयकर्मा, प्रज्ञप्ति, भानुमालिनी, अणिमा, लघिमा, मनःस्तम्भनी, अक्षोभ्या, संवाहिनी, सुरध्वंसी, कौमारी, वधकारिणी, सुविधाना, तमोरूपा, विपूलाकारी, दहनी, शुभदायिनी, रजोरूपा, दिन-रजनीकरी, वजोदरी, समादिष्टी, अजरामरा, विसंज्ञा, जलस्तम्भनी, अग्निस्तम्भनी, गिरिदारिणी, अवलोकनी, अरविध्वंसिनी, घोरा, वीरा, भुजंगिनी, वारुणी, भुवना, दारुणी, मदनाशनी, रवितेजा, भयजननी, ऐशानी, जया, विजया, बन्धनी, वाराही, कुटिला, कीर्ति, वायूद्भवा, शान्ति, कौवेरो, शंकरी, योगेश्वरी, बलमथनी, चाण्डाली, वर्षिणी विद्याओं के नाम हैं। इसी प्रकार भानुकर्ण ने सर्वरोहिणी, रतिवृद्धि, आकाशगामिनी, जम्भिणी तथा निद्राणी नाम वाली पाँच और विभीषण ने सिद्धार्था, अरिदमनी, निर्व्याघाता एवं आकाशगामिनी इन चार विद्याओं की सिद्धि प्राप्त की थी। पउमचरिय में ही अन्यत्र रत्नश्रवा द्वारा सिद्ध मानससुन्दरी महाविद्या तथा रावण एवं उनके भ्राताओं द्वारा सिद्ध सर्वकामा नाम वाली अष्टाक्षरा विद्या के भी उल्लेख हैं। इन महाविद्याओं के स्वरूप एवं उनकी सिद्धि से प्राप्त होने वाली दिव्य शक्तियां तथा इनकी उपासना पद्धति के आधार पर इनका तांत्रिक देवियाँ होना निर्विवाद है। सर्वकामा नाम की अष्टाक्षरा विद्या की सिद्धि एक लाख जाप से हुई थी जिसके मंत्रों का परिवार दस करोड़ हजार बताया गया है।' १. पउमचरिय ६७.४ २. पउमचरिय ६८.२३, २७ ३. अहवा ताण न विज्जा, अत्थि सहीणा, पओगमइकुसला। जेणुज्झिऊण भोगा, ठिया य तव-संजमाभिमुहा ।।--पउमचरिय १०९.३ ४. पउमस्स देइ तुट्ठो, नामेणं सोहवाहिणी विज्ज । गरुडा परियणसहिया, पणामिया लिच्छनिलयस्स ॥-पउमचरिय ५९.८४ ५. पउमचरिय ७.१३० ६. पउमचरिथ ७.१३५-४२ ७. पउमचरिय ७.१४४-४५ ८. पङमचरिय ०.०३,१०० ९. जविऊण समाढसा, विज्जा वि हु सोलसक्खरनिबद्धा । दहकोडिसहस्साइं, जोसे मन्ताण परिवारो॥-पउमचरिय ७.१०८ Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विमलसूरिकृत पउमचरिय में प्रतिमाविज्ञान-परक सामग्रो - पउमचरिय में उल्लिखित विद्यादेवियों का कालान्तर में ल• आठवीं-नवीं शती ई० में 16 महाविद्याओं को सूची के निर्धारण की दृष्टि से विशेष महत्त्व रहा है। इन्हें सामान्यतः विद्या कहा गया है। केवल मानससुन्दरी, बहुरूपा तथा कुछ अन्य को ही महाविद्या माना गया है।' ग्रन्थ में सर्वकामा विद्या को षोडशाक्षर विद्या बताया गया है। संभव है षोडशाक्षराविद्या की कल्पना से ही कालान्तर में 16 महाविद्याओं की धारणा का विकास हुआ हो। उल्लेखनीय है कि जैन धर्म में विद्या-देवियों की कल्पना यक्ष-यक्षी युगलों (या शासनदेवताओं) से प्राचीन रही है। इसी कारण दिगम्बर परम्परा के 24 यक्षियों के नामों में से अधिकांश पूर्ववर्ती महाविद्याओं के नामों से प्रभावित हैं। इनमें रोहिणी, प्रज्ञप्ति, वज्रशृंखला, पुरुषदत्ता, काली, ज्वालामालिनी, महाकाली, वेरोट्या, मानसी और महामानसी के नाम उल्लेखनीय हैं। पउमचरिय की विद्यादेवियों की सूची में प्रज्ञप्ति, गरुडा, सिंहवाहिनी, दहनोय (या अग्निस्तंभनी), शंकरी, योगेश्वरी, भुजंगिनी, सर्वरोहिणी, वज्रोदयो जैसी विद्याओं के नाम ऐसे हैं जिन्हें 16 महाविद्याओं की सूची में या तो उसी रूप में या किंचित् नाम-परिवर्तन के साथ स्वीकार किया गया। 16 महाविद्याओं की सूची में इन्हें क्रमशः प्रज्ञप्ति, अप्रतिचक्रा, महामानसी, सर्वास्त्रमहाज्वाला (या ज्वाला), गौरी, काली (या महाकाली), वेरोट्या, रोहिणी तथा वज्रांकुशा नाम दिया गया है। इसी प्रकार बहुरूपा (या बहुरूपिणी) विद्या कालान्तर में दिगम्बर परम्परा में 20 वें तीर्थंकर मनिसवत की यक्षी के रूप में मान्य हई। रावण द्वारा सिद्ध 55 विद्याओं में हमें कौमारी, कौवेरी, योगेश्वरी (या चाण्डाली) तथा वर्षिणी (ऐन्द्री ?) जैसी मातृकाओं तथा वारुणी एवं ऐशानी जैसी दिक्पाल-शक्तियों के नामोल्लेख मिलते हैं। इनके अतिरिक्त अक्षोभ्या, मनःस्तंभिनी जैसी विद्याओं के नाम बौद्ध परम्परा से संबंधित प्रतीत होते हैं। इस प्रकार पउमचरिय में उल्लिखित विद्यादेवियों में जैन परम्परा के साथ ही ब्राह्मण और बौद्ध परम्परा की देवियाँ भी हैं। रोडर, कला इतिहास विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी / 1. पउमचरिय 78.73, 67.2