Book Title: Chaturdash Purv Pujao
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: ZZ_Anusandhan
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महोपाध्याय चारित्रनन्दी विरचित चतुर्दश पूर्व पूजा ॥ खरतरगच्छीय वाचक चारित्रनन्दीनी रचेली एक पूजा अहीं प्रस्तुत छे. जिनेश्वरनी मूर्ति अने जैन आगमशास्त्र - आ बे जैन संघमां सर्वोच्च पूजनीय तत्त्वो मनायां छे. ते बन्नेनी विविध प्रकारे पूजा करवानुं जैन शास्त्रोम विधान छे. ते विधानने मध्यकालना अनेक जैन कविओए संगीतमय गेय रचना, जेने 'पूजा' तरीके ओळखवामां आवे छे ते, रूपे ढाळ्युं छे, गायुं छे, वर्णव्युं छे. ए परम्पराने अनुसरीने रचायेली आ १४ पूर्व पूजा छे. नवा ज विषय लईने रचायेली आ पूजा, विद्वद्धोग्य होवा छतां अपूर्व छे अने रुचितर्पक छे. सं. विजयशीलचन्द्रसूरि जैन संघनां शास्त्रो 'आगम'ना नामे ओळखाय छे. तीर्थंकरना गणधरोए रचेल ते आगमोने 'द्वादशाङ्गी प्रवचन ना नामे ओळखवामां आवे छे. द्वादशाङ्गी एटले १२ अंग. तेमां बारमा 'दृष्टिवाद' नामक अंगना मुख्य ५ प्रकार छे: १. परिकर्म, २. सूत्र, ३. पूर्व, ४. चूलिका, ५. अनुयोग परिकर्मना सात भेद छे. सूत्रना २२ भेद छे, जे विभिन्न दृष्टि-मतने अनुसरीने ८८ भेदोमां पथराय छे. पूर्व १४ छे, तेमां वस्तु, पाहुड, पाहुडिया, इत्यादि पेटाविभागो होय छे. चूलिका पण एक विशिष्ट उपविभाग छे, जे १४ पैकी प्रथम ४ पूर्वमां ज होय छे. अनुयोगना बे प्रकार छे : प्रथमानुयोग तथा गण्डिकानुयोग. आ तमाम विषय पारिभाषिक शब्दावलीमां ज निरूपवानो होई रचना जरा क्लिष्ट वा गहन बने तो तेमां कशुं अजुगतुं के अरुचिकर नथी समजवानुं. ए परिभाषा तेना जाणकार पासेधी समजवानी कोशीश करवी ए ज तेनो उकेल होय. कविए कठिन परिभाषाने, पोताना चित्तमां व्यापेली तत्त्वप्रीति तथा ज्ञानोपासनाना आलम्बने, काव्यदेहे ढाळी छे, तथा जूना गेय ढाळोमां गाई छे, तेमां तेमनुं कविकर्म सार्थक बनी रहे छे. कुल २१ ढाळोमां पथरायेल आ पूजामा प्रथम पांच ढाळो कुसुमांजलिरूप विधाननी छे. तेमां कर्ताए दृष्टिवादना मूळ पांच प्रकारोनुं वर्णन आपेल छे. ते पछी १४ ढाळोमां १४ पूर्वनुं वर्णन छे. शास्त्रमां जेवुं Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 32 अनुसन्धान ३५ वर्णन होय तेनो ज अनुवाद करवो ए आ प्रकारनी रचनानी आवश्यक शरत होय छे, जेने कवि बराबर अनुसर्या छे. २०मी ढाळमां (तथा ते पहेलांनां काव्योमा) कविनी प्रशस्ति छे, अने ते पछी 'कलश' नी ढाळ छे. छेक छेल्ले, पूजा पत्या पछी दृष्टिवादशास्त्रनी तत्त्वगर्भित आरती छे, जे अध्यात्मरसिक जिज्ञासुओने खूब रुचिकर बने तेम छे. * रचनाना प्रारम्भे 'चारित्रपार्श्वजिनेभ्यो नमः ' तेमज 'प्रणमुं संयमपास जिण' अवां वाक्य लखीने कविए पोतानुं नाम पण सूचव्युं छे, साथे पार्श्वनाथ भगवाननुं एक नवुं नाम पण निरम्युं छे. * कवि संस्कृतना विशेषज्ञ छे तेवुं तेमणे प्रत्येक पूजाना अन्तमां आपेल संस्कृत काव्यो वांचतां प्रतीत थाय छे. * संख्या जणाववा माटे कवि ठेरठेर खास संज्ञाओ ज प्रयोजे छे. दा.त. ७ माटे नग, ८ माटे इभ वगेरे; ते खास ध्यानार्ह छे. खरतरगच्छना जिनराजसूरि, तेमना पाठक रामविजय, तेमनी परम्परा क्रमशः सुखहर्ष (?) पदमहर्ष कनकहर्ष महिमहर्ष चित्रकुमार → निधिउदय (के उदयनिधि ? ) → चारित्रनन्दी आम पंक्तिओ परथी उकले छे. आमां क्षति होय तो सुधारी शकाय संवत १८९५ मां आ पूजा कविए रची छे ते तेमणे ज नोंध्युं छे. निजी संग्रहनी १२ पत्रोनी एक प्रतिना आधारे आ सम्पादन करेल छे. अन्तमां कोई लेखकनो तथा लेखनवर्षनो उल्लेख नथी, तेमज लखाण शुद्धप्राय छे, ते जोतां कर्तानी स्वहस्तलिखित आ प्रति होय तो बनवाजोग छे. केवल परिभाषिक शब्दावलीनो विनियोग आमां थयो होवाथी शब्दकोश आपवानुं जरूरी नथी मान्युं. * श्रीचारित्रनन्दिविरचित चतुर्दशपूर्वपूजा श्री चारित्र पार्श्वजिनेभ्यो नमः ॥ अथ चतुर्दश पूर्वपूजा ॥ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फेब्रुआरी - 2006 दोहा ॥ प्रणमुं संयम पास जिण सुभ सामी गणधार । चउद पूरव पूजन रचुं अभिमत फल दातार ॥१॥ ढाल ॥ जिन रयणीजी || ए चाल | भवि भाजी चउद पूरव पूजन करो । दृष्टिवादें जी एह भाव चित आदरो । इग सुइखंधजी संख्येय वसतू पाहुडो । पाहुडपाहुडजी पाहुडिया संख्य आवडो !! Jटक ॥ पाहुडि पाहुडिया संख्य जाणो संख्य लख पद मान जो । सरव भाव परूवना इहां मुनिवर हिय. आनजो । परिकर्म १, सूत्राणि २, पूरवगत ३, तिम अनुयोग ४, चूलिका ५, नान ए ॥ परिकर्म नगविध सर्वभेदे कुसुमांजलि मेलो मान ए ॥१॥ काव्यं ॥ श्रीसिद्धपंक्त्यादिकशैलमूलोत्तरानिलेभोन्मितभेदभित्रम् ।। श्रीदृष्टिवादे परिकर्मसूत्रं नमामि भक्त्या सु(शु)भदर्शनाय ॥१॥ ही श्रीदृष्टिवादे श्रीमत्परिकर्मसूत्रेभ्यः कुसुमाञ्जलि यजामहे स्वाहाः ।।१।। ढाल ॥ सूत्राणी जी बीजी परूवना धार ए । रिजुकादी जी बावीस सूत्र विचार ए । मुनि भावो जी भाग विभाग मतिसार ए । सहु भेदें जी खगकृत्य नग अधिकार ए । त्रूटक ॥ अधिकार नख युग छिन्नछेयण सूत्र ससमय जान ए । तिम अछित्रछेयन सूत्रपाटी आजीविकमत मान ए । गुपति-नय त्रैराशि तीजै चउनय ससमय नान ए । इम अठ्यासी सूत्र भावें कुसुमांजलि अहिठान ए । Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान ३५ काव्यं ॥ स्वपक्षकाजीविकरबराशिजिनेन्द्रसिद्धान्तगजेभसूत्रैः । समन्वितं कर्मनिवारणायाहं श्रीदृष्टिवादे प्रणमामि सूत्रं ॥१॥ ही श्रीमदृष्टिवादे सूत्रेभ्यः कु० ॥२॥ ढाल ॥ दृष्टिवादेंजी तीजो श्रुतिसुखधाम ए । पूरवगतजी चउद भेद अभिराम ए । उतपादोजी १, अग्रनीय २, वीरज ३, नाम ए । अस्ति नास्तीजी ४, नान ५, सत्य ६, गुणठाम ए । त्रूटक ॥ गुणठाम आतम ७, करम ८, पचखान ९, विविध विद्यावाद ए १०, इग्यारमो अवंध्य पूरव ११ प्राणावाय प्रवाद ए १२ । विविध संयम भाव सूचक किरियाविशाल वखान ए १३, बिंदुसार ए पूरवगत १४, श्रुति कुसुमांजलि परधान ए ॥१॥ काव्यं ॥ बह्वर्थसद्भावविचारयुक्तमुत्पादकाधब्धिदशप्रभिन्नं । श्रीदृष्टिवादे श्रुतिरत्वपुझं नमाम्यहं पूर्वगतं शिवाय ॥१॥ म ही श्रीदृष्टिवादे पूर्वगतश्रुतिभ्य: कु० ३।। ढाल ॥ अंग बारमें जी अनुयोग जुगविध भाव ए । सूत्र सार्थेजी अनुरूप योग ज नाव ए । तिहां मूलेंजी प्रथमानुयोग वखानियै । तिम बीजोजी गंडिकानुयोग पहिचानियै ॥ Jटक ॥ पहिचान प्रथमानुयोग सूत्रे प्रथम दरसन योगथी । भव कलप जिनवर सर कल्याणक सूचना अनुयोगथी । गंडिकानुयोगें कुलगरादिक प्रवर नृपकलप भाव ए । तिन कारने अनुयोग सूत्रे कुसुमांजलि मेलो धाव ए । Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 35 फेबुआरी - 2006 काव्यं ॥ जिनेन्द्रकल्पोत्तममर्त्यकल्प-रत्नाकर धर्मकथानुयोगैः । स्वसाध्यसंसाधनसाधनाय युगानुयोगागमकं यजामि ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीदृष्टिवादे ॥ अनुयोगसूत्रेभ्यः कु० ॥४॥ ढाल ॥ हिव चूलिकाजी पांचमो श्रुति सूत्र धार ए । चउ द्वादशजी गंज काष्टा सुखकार ए । सहु एकत्रजी अतिशय परिमित भाव ए । आदिम चउजी पूरव चूलिका ध्याव ए । Jटक ॥ ध्यावज्यो मुनिवर अनुक्रमें कर विविध अरथ निधान ए । चूलिका संयुत जलधिपूरव रहित शेष सुजान ए । किम अंगचूलिका वंगचूलिका व्यवहारचूलिकादि भाव ए । भवि शुद्ध भावें चूलिका श्रुति कुसुमांजलि चाढो ध्याव ए ॥५॥ मुहीं श्रीदृष्टिवादे चूलिकासूत्रेभ्यः ॥ कु० ॥५॥ इति पंच कुसुमांजलि ॥ दोहा ॥ बारम अंगगत तीसरो, पूरवगत अधिकार । तिन कारन परथम भणी, कुसुमांजलि सुविचार ॥१॥ हिव परतेके वरणउं, पूरव चउद विधान । मुनिवर भावे सेवना, सरावग दरव-परधान ।।२।। ढाल ॥ पंच कल्याणकं ॥ ए चाल || राग देशाख । परव उत्तर मुखें पीठत्रिक रचि सखें । विविध मणिरतन वर भासकं ।। अ० ॥ भा० ॥१॥ चवद पुसतक धरी थापना आदरी । करीय वास-पूज उल्हासकं ॥ अ० ॥ ल्हा० ॥२॥ नान उपगरण सुचि चवद चाढो रुचि ।। चवद वसुदरव पूज आदरो ||अ० |आ०॥३॥ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 36 अनुसन्धान ३५ परथम जिनमुख लही विपदि गणधर गही । पूरव रचना करी सादरो ।। अ० ॥ सा० ॥४॥ तीरथकरबिबसम दरवश्रुति अनुगम । भाववृधि-हेत भावि भावज्यो ।। अ० ॥ भा० ॥५॥ एह पूरवतनें परम आलंबनें । निरजरा करमनी लावज्यो ||अ० ॥ ला० ॥ ६॥ भव्य हितकारणे भवजलधि तारनें । पूरव अधिकार सुभ वरतवू ॥अ० ॥ व० ॥७॥ नान पद भगतिभर सूत्र समवाय धर ।। निद्धि-चारित लही संतवू || अ० ॥ संस०(त) ॥८॥ इति प्रथम ढाल || अब द्रव्याष्टक मुद्रा रुमाल लेइ पढना ॥ दोहा ।। पूजो भविजन भावसुं, प्रथम पूरव उत्पाद । तनमय एकत ध्यावतां, थायें परम आल्हाद ॥१॥ ढाल ॥ श्रीसंखेसर पास जिनेसर भेटियें ॥ ए चाल । स्यादवाद मत युक्त जिनेसर भाषियो । प्रथम पूर्व उत्पाद गुणाकर राखियो । साधुवृंद सुविचार पढो ए पूर्वने । जिम पामो भवपार दलो करम पूर्वनें ॥१॥ वस्तु दसक सदरूप यथारथ एहमें । जलधि चूलिका भाव धरो मन गेहमें । एहनो अरथ गंभीर करो निज अनुभवें । निरमल निजसतभाव गहो सुख वरधवै ॥२॥ ग्यार कोड पदमान जयो तनमयपणें । द्रव्याष्टक करि पूज वरो जिम नानणे । १. नाणने Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फेब्रुआरी- 2006 निद्धि - उदयगणि शिष्य चारित्रनंदी भणें । परमानंद सुख हेतु जाग्यो हिव थिरमर्णे | काव्यं ॥ लोके धर्मादिकानां निजपरविभवैर्धीविकल्पानुयोगैः सर्वज्ञास्याद्दणेशास्त्रिपदिवचनमालम्ब्य यत्र स्वरूपं ॥ आद्यन्ताब्धिप्रभित्रैर्बहुविधमगदन्पूर्वमुत्पादकं तं द्रव्याष्टाभिर्यजामि त्रिकरणमनसा ज्ञानरत्नाय भक्त्या ||१|| हौं० ॥ श्रीमदृष्टिवादान्तर्गत प्रथमोत्पादपूर्व० ॥ इति प्रथमोत्पादपूर्वं ॥२॥१२॥१॥ दोहा ॥ श्रीपूरव पूजो सदा आग्रायणी अभिहांन । निर - तिरि गतिनें रोकवा, जांणो ए अनुमान ॥१॥ ढाल ॥ सुण चंदाजी परमातम । ए चाल ॥ भवि प्राणीजी जिनभाषित पूरव बीजो धारज्यो । अनुभवें करिजी लक्ष नवति षट संख्या पद संभारज्यो । टेका। दृष्टिवाद अंगनी वाणी छै, अभिधानें अग्रायणी छै I विविध भाव निरमाणी छै, एतो बहुविध गुणमणि षानी है ॥ भ० ॥१॥ वस्तु चतुर्दश सूचक छे, चूलिका बार प्ररूपक छै । निज सुध सत्ता द्योतक छै, अनादि अनंत गुणभासक है | साधूनां ज्ञानसङ्गाद्रिपुदलदलने शक्रवज्रोपमं च वस्तुव्यूहाब्धिकाष्ट(ष्टा) प्रमितविवरणं विस्तृताख्यातमत्र । 37 इण अनुभव सुखकंदी छै, निज परमारथ छंदी छै । त्रिभुवन जन ते वंदी छै, निद्धयुदय चारित्रनंदी छै ॥ भ० ॥३॥ काव्यं ॥ भु० ||२|| Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान ३५ मातङ्गार्कघ्नलक्षप्रमितपदमणिज्योतिनानार्थयुक्तं तत्पूर्वाग्रायनीयं स्तुतियुतयजनं द्रव्यनागैर्दधामि ॥१॥ ही० आग्रायणीय पूर्व० ॥ इत्याग्रायणीय पूर्वं ॥२॥१२॥२॥ दोहा ॥ पूजो सुभ भावें करी, श्रीवीरय अनुवाद । भक्ति करता एहथी, थाये परम आल्हाद ॥१॥ ढाल ॥ निरख निरख तुझ बिंबनें [ए चाल || सुण सुण जिन श्रुति भारती, हरषित थायें मुझ चित्त, पूरव रलियामणो ॥ टेक ॥१॥ तीजो पूरव सांभली, सपतति लक्ष पद वित्त ।।पू० ॥२॥ ईभवस्तु-चूलिका सूचक, नामें वीर्यप्रवाद ॥पू० ॥३॥ ज्ञान महोदय प्राप्तये, मधु अमृत आस्वाद पू० ॥४॥ द्रव्याष्टक करि पूजिय, द्रव्य भाव शुचि धार पू० ॥५॥ तेहथी निद्धि उदय थयो चारित्रनंदि सुखकार पू० ॥६॥ काव्यं ।। लोके दुःकर्मभेद्येऽखिलभवविपिनं वर्तयिष्णुं तपस्सु कश्चिदन्योप्यशक्यो विविधमदवशैवंसितुं दुर्नयैस्तं । वीर्यं संगोप्य कुर्मैव निजपदधनैर्ज्ञानसद्ध्यानरक्तमेतद्वीर्यप्रवादं मुनिगणगुणदं द्रव्यनागैर्यजामि ॥१॥ नहीं० वीर्यानुवाद पूर्व० ॥ इति वीर्यानुवादपूर्वार्चनम् ॥ २॥१२॥३।। दोहा ।। भविजन त्रिकरण थिर करी, पूजो धरि आनंद । अस्ति नास्ति पूरव भणी, जिम पामो सुखकंद ॥१॥ ढाल । रामत रमवा हुं गइ थी । ए चाल । सुणो भविजन सुभ भावसुं, जिन भारति सुखकार हे माय । Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फेब्रुआरी- 2006 पद षष्टिलक्ष जिन भाषियो, पूरव चोथो गुणधार हे माय ॥ सु० ॥१॥ सप्त भंगिइं सोहतो, अस्तिनास्ति परवाद हे माई । दस वस्तु दस चूलिका सूचक कीनो अगाध हे माय || सु० ॥२॥ त्रिक शुद्धी एहनें सदा, विनयें पूज रचाइ हे माय । तेहथी निधि उदयें करी चारित्रनंदि सुख थाइ हे माय ॥ काव्यं ॥ स्याद्वादत्वं पदार्थे मनसि मुनिवरा: भावयन्त्यत्र पूर्वे, अस्तित्वं नास्तिकं स्यादहितमुभयकं द्वाववक्तव्ययोगौ । गुप्त्यैकं भूधराणि त्रिभुवनपदगं विस्तृतैः सूचितं च तत्तं पूर्वं यजेयं परमसुखनिवासाय सद्रव्यपुत्रैः ||१|| अ ह्रीं० अस्तिनास्तिवाद पूर्वं० ॥ इत्यस्तिनास्तिप्रवादपूर्वार्चनम् ॥२॥१२॥४ दोहा ॥ पंचम पूरव पूजिये पंचम गति दातार । ज्ञान प्रवादें नाणनें भाख्यो अरथ विचार ॥१॥ ढाल ॥ श्रीसंखेशर पास || ए चाल ॥ पूरव नानप्रवाद धरो निज उरकंजें । युगषेट वस्तु विचार तेहिज रिधिसंपजै ॥ बहिरातम तज योग लहै अंतरातमा । सिद्धी सत्ता वास हुवै परमातमा ॥१२॥ काल अनादि अनंत दलै करम वरगना । साधें सादि अनंत केवल बोध दरशना | नाण तणो अधिकार पूरव मांहें कह्यो । एक उनको पदमान अरथ बहु संगो ||२|| 39 सु० ||३|| Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 40 अनुसन्धान ३५ शुचि निरमल ईभद्रव्य धरो पात्र कंचनें । द्रव्य भाव शुचि होय करो पूरव अरचनें । एहथी भवि शुभ भाव धरै मति तत्तमें । निध्युदय चारित्रनंदि लहै या जगतमें ॥३॥ काव्यं ॥ ज्ञानैर्जेयादिरूपं प्रवरमतिबलैयिते सत्पदार्थ हेयोपादेयभावं श्रुतिगुरुविनयैर्बोध्यते स्वात्मरूपं । यत्र ज्ञानाधिकारे तमदलदलनं द्वादशाङ्गं प्रधानं तस्माज्ज्ञानप्रवादं नृनिपुणरचितैर्द्रव्यनागैर्यजामि ॥१॥ में ही० ॥ श्रीनानप्पवायपुर्वं० ।। इति ज्ञानप्रवादपूर्वार्चनम् ॥ २॥१२॥५॥१७|| दोहा ॥ पूरव सत्य प्रवादनें पूजू हुं तिरिकाल । भाव यथारथ जाणवा एह सूर रुचिमाल ॥१॥ ढाल ॥ आदै अरिहंत विराजै ॥ ए चाल ॥ छट्ठो पूरव समरीजै उपयोगें वचन चरीजै । श्रीसत्यवाद भज लीजै वस्तु सोलस भाव वरीजै ॥ भविक जन सेवज्यो प्रवचननें ॥ टेक ॥१॥ रस अधिपद कोटि अनूपी ते मे सत्यवाद प्ररूपी । दरव भाव यथारथ चूंपी निज रमतां थायें शिव भूपी ॥ भ० ॥२॥ वर्स द्रव्ये पूज रचावो त्रिन योगनी थिरता रमावो । अमृतरस भावना भावो निधिउदय चारित्र मन लावो ॥ भ० ॥३॥ काव्यं ॥ द्रव्यक्षेत्रादिभावैर्नियमितवचनैः सत्यवतिष्णुभावं । कश्चिद्योगानुयोगैरखिलमुनिवरान्मौनमेव प्रधानं ।। . सत्यासत्यादिभेदैललितनगनयैविस्तृतं यत्र सद्वाक् तस्मात्सत्यप्रवादं गुणगणजलधि द्रव्यवगैर्यजामि ॥१॥ Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फेब्रुआरी- 2006 ह्रीं० सत्यप्रवाद पूर्वं० । इति सत्यप्रवादपूर्वं ||२||१२||६||१८|| दोहा ॥ पूरव आतमवादने आतमबोध विकाश । अष्ट द्रव्य कर पूजतां थायें परम उल्हास ॥१॥ ढाल ॥ विजयानंदन वीनतीजी ॥ए चाल ॥ सपतम पूरव जांणीयैजी नामें आतमवाद | पद नखे रस कोटी भजोजी जिम नित थायें आल्हाद || १ || मन मोह्यो मुनिजी नव निधि रिधि श्रुतिधार ॥ टेक ॥। करसाखामित धारियेंजी वस्तु विचारसरूप । पर आसा पासा तजीजी शिव रिधि थायें जेथी भूप ॥ २॥ म० ॥ भव भव सेउं एहनेंजी द्रव्याष्टक भर थाल । तेहथी निद्धि उदय घणोजी थायें चारित्र गुणमाल || ३ || म० ॥ काव्यं ॥ आत्मासंख्य प्रदेशानुभवहृदयगं सर्वदा ज्ञानरूपं । नित्यं स्वात्मस्वरूपैर्विमलशुभतरं स्थैर्यभावेन युक्तं । तस्मादात्मैकभेदे नयवचनविधौ नैकधोक्तं जिनेन्द्रै स्तद्वादोत्तात्मवादं सुचितरसरसैर्द्रव्यनागैर्यजामि ॥१॥ ह्रीं० ॥ आत्मप्रवादपूर्वं० ॥ इत्यात्मप्रवादार्च्चनम् ॥२॥१२॥७॥१९॥ दोहा ॥ पूरव करमप्रवाद भाष्यो श्रीजिनराज । जिणवाणी जिनवर समो सेवो भवि सुखसाज ॥१॥ ढाल || धरम जिनेसर गांउ रंगसुं ॥ए राग ॥ करम प्रवाद पूरव भजो भावसुं । जांणो मूलोत्तर करम || सुरिजन || टेक || जिनवर भाखै मुनि जन आगलै । तेण लहै शिवशर्म ॥० ॥ १ ॥ 41 Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 42 अनुसन्धान ३५ नखंदस वस्तु विचार समन्वित | भाव यथारथ भास ॥० ॥ पद इग कोटी अधिको जानियै । सहस अशीतिसु भास || सु० ||२| ए पूरव इभ' द्रव्यें पूजतां । लह्यो शिव सुरतरु कंद ॥० ॥ रिद्धि अनरगल निद्धि उदय थकी पामें चारित्रनंद ॥० ॥ काव्यं ॥ विष्णुश्चक्रीबलेन्द्रप्रमुखजनगणान्नर्त्तकः संसृताब्धौ । दुर्जेयोऽयं विपाके प्रवरबलयुतैः कृष्णरामादिभिश्च ॥ एतत्कर्मप्रबन्धादिकविविधविचारान्विताम्भोधिरूप स्तस्मात्कर्मप्रवादो हरतु मम रिपूनर्हतो द्रव्यवगैः ॥१॥ ह्रीं० करमप्रवाद पूर्वं० ॥ इति करमवाद पूर्वार्चनम् ||२|| ५२॥८॥३०॥ दोहा ॥ पूरव प्रत्याख्याननें भविजन सुनो मन लाय ॥ सेवो पूजो भावसुं भव भव दुरित पलाय ॥१॥ ढाल || || राग घाटो || चुलिया से योवनावहार भयलों ॥ ए चाल || चुलियासें मनुवावहार होयलों । जिनजी किहां लो मनावुं ॥ टेका। मनुवो मोरो खिन खिन अनघर जइले । तोरी वतियां कैसै सुनाइ 1150 11811 हिव मोरे अंतराय षयउपशम कर । तोरी वतियां मनुवो भाइ ||जि० ॥२॥ 1 प्रत्याख्यान पूरव अवगाही । खमित वस्तु संयुत्त ग्रहकृत्यत्रिक अधिलक्ष पद भाख्यो । ते होयलों ||जि० ॥३॥ मंगल वित्त द्रव्याष्टक करि एहनें पूजित । थायें परम पवित्त ॥ जि० ॥५॥ हथी निद्धि उदय कर पायो । चारित्रनंदि सुखवित्त || जि० ||६|| || जि० ||४|| Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फेब्रुआरी - 2006 काव्यं ॥ भूतागाम्यादिभेदैः प्रवचनजलधौ दिग्विधः सूचितोऽस्ति तबाहोरात्रकालैर्भवति दसविधः पौरुषादिप्रमाणैः । येनेच्छारोधपूर्वं निखिलतपगणं भिक्षवो भावयन्ति । तत्प्रत्याख्यानवादं तमदलनरवि द्रव्यवगैर्यजामि ॥१॥ मुही प्रत्याख्यान प्रवाद पूर्वं० ॥ इति प्रत्याख्यानप्रवादाच॑नम् ॥२॥ १२॥ ९॥ दोहा ॥ भवि पूजो प्रवचन भणी पूरव विद्यावाद । विविध चित्र त्रिभुवनजनें जिहां विद्यापरवाद ।।१।। ढाल ॥ प्रभू मूरति संजम तपमय रे ॥ए चाल॥ श्रुति भजीय निरमल नाण लह्यो रे ॥ नि० गुण लह्यो रे । श्रु० ।।टेका। जिनवर श्रुति सुण्यो विद्यानुवाद थुण्यो । शिवकोटि पंचदस सहस गुण्यो रे । श्रु० ॥१॥ मुनि अनुभव कियो सुभ ध्यानलय लियो । तिथि वस्तु भाव प्रमित रम्यो रे । श्रु० ॥२॥ व॑सु द्रव्य कर धर्यो पूरव यजन कर्यो । निधि चारित्रनंदि सुख थयो रे । श्रु० ॥३॥ काव्यं ॥ एकव्योमप्रदेशार्यमशशिरुचिकाभ्राम्बुजंघादिलब्धि प्रज्ञप्तीशृङ्खलादिप्रवरमणिपुरं भिक्षुविश्रामवासं । नानाविद्यादिरनै तवरजलधि पूर्वविद्याप्रवादं द्रव्याष्टाभिर्यजेयं दुरितरिपुदलं शक्रवज्रोपमं च ॥१॥ मुही० विद्यानुवाद पूर्व० ।। इति विद्यानुवादार्चनम् ॥१२॥१०|| Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 44 अनुसन्धान ३५ दोहा ॥ जिनश्रुति पूरव नित यजो ग्यारम सुरसुखदाय । अनुक्रम परमातम लहै निज शुद्धाकृति भाय ॥१॥ ढाल ॥ मजा उडाय ले बुढिया ।। ए चाल ॥ श्रुति पूरव भज ले मनुवा जिनधी निजचित धाररे ॥टेका। पूरव भज ले ग्यारमो मुनिवर नाम ध्येय कल्याण रे ॥१।श्रु०॥ साधुवरग कल्याणकारक ए गुणगणगरिमनिधान रे ॥२॥श्रु०॥ द्वादस वस्तु सूचक रत्नाकर ते निज सत्ता गहाइ रे ।श्रु० ॥३॥ पद जिनयुगमित कोटी रमणे सुध चिदध्यान रहाइ रे ।श्रु०॥४॥ सकल सुरभि सुचि द्रव्ये यजतां लाभै रिधिविसतार रे ।श्रु० ॥५॥ निद्धिउदयकर चारित्रनंदी पायो सुखभंडार रे ।श्रु०॥ काव्यं ॥ खल्वर्हद्भिक्षुवर्गान्विण(न)य गुणयुतान् ज्ञानसम्यक्त्वहेतुं । मुक्तिस्त्रीसौख्यरूपं निजगुणरमणं साधनन्तद्रुबीजं । पूर्वावन्ध्यं शिवं वा प्रमितगुणनिधिं स्वेप्सितार्थं सुरई । द्रव्याष्टाभिर्यजेयं भवजलधितरि शाश्वतानन्दकाय ॥१॥ मुही० कल्याणनामध्येयं० ।।। इति कल्याणनामध्येयाच॑नम् ॥२॥१२॥११॥२३॥ दोहा ॥ पूरव प्राणावायने धारो हृदय मझार । बारमो सुरसुख एहथी पामै मुनि ततकाल ॥ ढाल ॥ मन मोहन मेरी अंगिया रंग डारी || ए चाल ॥ मोकुं तो रंग डारी मनमोहन जिनधी मो० ॥टेका। पंच बिरति रति वागा पहरी संजम भूषन धारी ।म० ॥१॥ नवबिध ब्रम्ह अनोपम कंकुम नान गुलालभृत सारी ||म०॥२॥ मुनि उत्तर गुणरंग पिचकारी पूर्वार्थ अबीर उडारी ॥म० ॥३॥ प्राणावाय पूरव भाजन विच त्रिदश वस्तु पाक लगारी ॥म० ॥४॥ Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फेबुआरी - 2006 घट पंचाशत लख इग कोटी पद यजो इभ८ द्रव्य धारी !(म० ॥५॥ निद्धि उधयकर चारित्रनंदी परमानंद थयो भारी ॥म०॥६॥ काव्यं ॥ प्राणायामस्त्रिकं वा सनखचरमितं ध्यानवेदप्रमाणं । प्रत्याहाराम्बुराशि ग्रहयमनियमौ धारणेषु प्रमाणं । यँ एँ वँ रौं तथा लौ पवनमदनगं तत्त्वभावस्वरूपं । प्राणावायाख्यपूर्वं ललितपदचयं द्रव्यनाँगैर्य जामि ॥१॥ नहीं० प्रणावाय पूर्व० ।। इति प्राणावायपूर्वार्चनम् ॥२॥१२॥१२॥२४॥ दोहा ॥ प्रणमो पूरव तेरमो अनुपम किरिया विशाल । अष्ट द्रव्य कर पूजतां पामें गुणमणि माल ॥१॥ ढाल ॥ राग मालवी गवडी ॥ सर्व करमदलन जिनेंद्र प्रवचन भावो हृदय मझार रे ॥साधो।। भा० ॥टेका। द्वादशांगी अति अभ्यंतर क्रियाविशाल पूरव धार रे सा०॥२॥ स०॥ भाखियो जिन समवसरणे किरिया तणो अधिकार रे ॥सा०॥ नख दश वस्तू भाव अद्भुत पद ग्रह कोटि सुसार रे सा०॥सास०॥ अष्ट द्रव्ये भाव धरकै पूज रचो तिहुं काल रे ॥स०॥ निध्युदय चारित्रनंदे लाधो सुख सुविशाल रे सा०॥३॥स० ॥ काव्यं ॥ साध्वाचारक्रियायाश्चरणकरणयोः सप्ततेः सूचितं च । संसारादिकियापि प्रवचनजननीभावनादिप्रवृत्ति । शास्त्रास्त्रस्वर्णरत्नप्रमुखनिधिगृहं सक्रियाम्भोनिधि च ज्ञेयं ज्ञात्वा सुयोगैर्निजपदविधिलाभाय संस्तौमि भक्त्या ॥१॥ ही० ॥ क्रियाविशालपूर्वं ॥ इति क्रियाविशालपूर्वार्चनम् ॥२॥१२॥२५॥ Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान ३५ दोहा ॥ चउदम पूरव नित नमो दुविधपूतता धार । सेवो प्राणी भावसुं जूं पामो भवपार ॥ ढाल ॥ तुझ दरशन के कामी रे ॥ए चाल ॥ जिन प्रवचन बलिहारी रे परमानंद पाया |जि० टेका। लोकालोक स्वरूप प्रकाशक भविकज-बोध कराया । नभ तल तरणि किरण रुचि भू-कज ए दृष्टांत धराया रे |प० ॥१॥ बिंदुसार वा लोकप्रवाः नख पण वसतू माया । रुचकाष्टक निरमलता कारण दुरधर दुरित गमाया रे पि०॥२॥ कोटि द्वादश पद लक्ष पंचाशत पद अरथागम धाया । सेवित निध्युदय चारित्रनंदी लहै रिधि वृधि सुखदाया रे ।।०।।३।। मुही० बिंदुसार पूर्वे० ॥ इति लोकप्रवाद वा बिंदुसार पूर्वार्चनम् ॥२॥१२॥१४॥२६।। दोहा ॥ पूरवगत पूजा करी पण अधिकार समेत । दृष्टिवाद अंग पूजियै निज अनुभव गुण लेत ॥१॥ काव्यं ॥ सध्यानाधारभूतं दुरितरजसमीरं समृद्धिप्रदोयमेतत्पूर्वानुभावैः सुरमणिसदृशो भव्यसत्त्वाः प्रयान्ति । ननाकानुत्तरादेरचलसुखनिधि प्रेत्य गच्छन्ति सिद्धि । सन्तत्यैश्वर्यपद्मप्रवचननिधिभिः संयमः सौख्यमेनि ॥१॥ विमल कोटक चन्द्रकुलाम्बरे खरतराधिपराजमुनीश्वरः । गुरुपदाम्बुजभृङ्गसुवाचकः समभवद्विजयोत्तररामकः ॥२॥ प्रवरवाचकवंशपरम्परा: पदमहर्ष सुखार्भककंचन । महिमचित्रकनिद्धिसुवाचकाः समभवन् जिनशासनपारगाः ॥३॥ गुरुपदाम्बुजहंससुसंयमः परमसिद्धिसुखाय विनिर्ममे । शेरखगाष्टमहीनमिजन्मनि विपुलपूर्वगताधिकृतस्तुति ॥४॥ Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फेबुआरी - 2006 ढाल ॥ भविजन सुभभाव ॥ ए चाल || भवि धारिय उल्हास पूरवगत श्रुति भजियै रै ।भ० ॥टेक०॥ बारम अंगें पण अधिकार परिकर्म १, सूत्र २, पूरवगत ३, सार भ०॥ अनुयोग ४, चूलिका ५, पंचम जान । इहां पूरवगत श्रुति परिमाण भ० ॥१॥ गणधर परथम रचना जान तेहथी पूरव पूज वखांन ।भ०॥ द्वादश अंग पिण पाछै जोय अलपमति मुनिजननें होय भ० ॥२॥ ए संपूरन बारमो अंग नियमा समकिति पभणै रंग ।भ० ।। लेसें पूरव मान विचार जिन आगमथी कीनो उधार ।भ० ॥३॥ कोटक शशिकुल खरतर ईस सिंह पटोधर राजमुनीश ।भ०|| तसु पद सरवर हंससमान पाठक रामविजय गुनखान ।भ०॥४॥ वाचक वंश परंपर जान पदमहरष सुखनंदनमान ।भ०॥ कनक महिम चित्रकुमर विनेय निधि पदकज भुंग संयमगेय ।भ०||५|| शर खग धृति ॥१८९५।।नमि जनम दिन जान, रचना कीनी श्रुति गुन षांन ।भ०॥ ए श्रुति पूजन जे कर रंग ते नित विलसें नवनिधि रंग ।भ०॥६॥ काव्यं ॥ जिनवरागम पूर्वगतस्तुति भविकसत्त्वभवोदधितारका | विपुलसन्ततिसंपददायका सुनिधिसंयमवित्तमुपेतु मे ॥१॥ ही श्रीमदृष्टिवादांगाय द्रव्याष्टौ यजा० ॥१५॥ दोहा ॥ श्रावक जन भावें करी देवो अरथ विशाल । जिम निज कमला आदरी पामो शिवशुखमाल ॥१॥ ढाल ॥ तूठो तूठो रे मुझ साहिब ए चाला। भावो भावो रे भवि चउद पूरव श्रुति भावो ॥टेका। Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान 35 बारमा अंगनी तीजी परूवना चूलिका पंचम गावो / तिन कारण चित अधिक उल्हासें दृष्टिवाद पिण ध्यावो रे ।भ० // 1 // भवसिद्धी सुभ दरशन आश्रय दस चउद पूरव गावो / भाव षयोपशम श्रुति अभ्यासें संपद सहज निपावो रे ।भ०।।२।। अनुकरमें जिन भगति नानें गणधर निज पद पावै / नवनिधिसंयम कुशलें धारी अविचल कमला रमावै रै ।भ०॥३।। काव्यं / प्रवरपूर्वगतश्रुतिसंपदं विमलभावहदाम्बुज धारयन् // निजकलत्रमुपेत्य सुखेन ते शिवगतं प्रणमामि शिवाय तं // 1 // ही श्री दृष्टिवादश्रुतिभ्योर्थं यजामहे स्वाहा: ॥इत्यर्थम् // इति महोपाध्याय चरित्रनंद कृता // इति पूर्वगत पूजा समाप्ता / / अथ आरती // जय जय जिनराया // ए चाल / / पूरव श्रुतिसारा ||ज० ||1|| उतपाद 1, अननीय, 2, वीरयवादें 3 अस्ति नास्ति // 4 // स्यादवादा // ए चउ पूरव अतिशय चूलिका / / संयुत परिवादा ॥ज०।२।। नान 5, सत्य 6, आतम 7, करमवादें 8, पचखान 9, गुनधारा || विद्या 10, अवंझ 11, प्राणावाय 12, बारमो। किरिया 13, बिंदुसारा 14, ज० // 3 // ए चउद पूरव नित प्रति ध्यावत, परमानंद भाया / तनमय तत्त्व रमणता आदर, परसुख विरमाया ॥ज० // 4 // जे भवि पूरवगत श्रुति आरति करस्यै चित लाया / . ते निधि चारित्र कमला वरस्यै वंछित फल पाया ॥ज० // 5!! इति पूरवगत आरती // श्री श्री श्री साहा फूलचंद मूलचंद पठनार्थं //