Book Title: Ajitshanti Stotram
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: ZZ_Anusandhan
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान-५५ श्री लावण्यविजयकृत श्रीअजितशान्ति स्तोत्रम् ॥ - शी. अजितशान्ति स्तोत्र ए जैन संघर्नु अत्यन्त लोकप्रिय अने सर्वमान्य स्तोत्रकाव्य छे. जैनोना २४ पैकी बीजा अजितनाथ तथा १६मा शान्तिथा-ए बे तीर्थङ्करोनी, प्राकृत भाषामां अने विविध गेय छन्दोमां, ४० गाथाओ आ स्तोत्रमा छे. आ स्तोत्रनी अनुकृतिरूपे विविध कविवरोए तेवा ज छन्दोमां तेवा ज स्तोत्रकाव्योनी रचना करी छे. तेमांनुं एक अहीं प्रगट थाय छे. मूळ काव्यना कवित्व अने सर्गशक्तिनी बराबरी कदाच न थती होय, तो पण तेना तेज छन्दोमां जे काव्यसर्जन थयुं छे, ते आपणा जेवा माटे तो कल्पनातीत ज छे. स्तोत्रनो विषय ते ज बे तीर्थङ्करोनुं गुण-वर्णन छे. कर्ताए स्पष्ट रीते पोतानुं नाम न उल्लेख्युं होवा छतां, ४०मी गाथामां चारेय चरणमां जोवा मळतो 'लावण्ण' शब्द कर्ताना नामर्नु ज सूचन करे छे तेम मान्युं छे. तेमना गुरु श्रीमेरुविजयजी छे तेवू प्रथम अने ३९मी-बे गाथाओ थकी स्पष्ट छे. कर्तानो समय १८मो शतक होवानो सम्भव छे. विशेष विगत मळी शकी नथी. आ स्तोत्रनी २ पानांनी प्रतनी नकल मुनिश्री धुरन्धरविजयजी तरफथी प्राप्त छे, तेना आधारे आ सम्पादन थयेल छे. एकाद जग्याए लखाण खण्डित छे, बाकी शुद्धप्राय लखावट छे, जे जोतां कर्तानो स्वहस्त होवानी शक्यता छे. श्रीअजितशान्तिस्तोत्रम् ॥ मेरुविजयविबुहाणं विबुहाणं जणिअवंछिअसुहाणं । पयजुअलं नमिऊणं थुणामि सिरिअजिअ-संतीणं ॥१॥ गाहा ॥ विणया णमिरणरिंदे गुणगणरयणाण रोहणगिरिंदे । जय जयजणणसुरिंदे णमामि ते णं जिणवरिंदे ॥२॥ गाहा ॥ Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मई २०११ सिलोगपुण्णलोयाणं ताणं समवलोअणं । ताणं निम्मललोआणं कयनिम्मललोअणं ॥३॥ सिलोगो ॥ अरयमयप्पयारणे मह विबुहप्पडिबोहकारणे । कणयकयकयप्पयारणे पणिवइमो सइ जिणिदवारणे ॥४॥ मागहिआ ॥ मयणुम्मयणुग्गमणुम्महणे मयणासहणं अजिअस्स य संतिजिणस्स अवस्स गुणग्गहणं । पकुणंति जणाण गणा विहिणा णिरया सहणं सहलं इह होइ हु ताण सपा(या?)णसमुव्वहणं ॥५॥ आलिंगणयं ॥ अजिअं जिअमोहजालयं कलिमस्स जलणुव्व जालयं । पुण संतिजिणं गुणालयं सइ समरेमि जिआण पालयं ॥५॥ मागहिआ ॥ रमणिमणिमणणविरमणजणयमणुअसरणं निअभणिअवयणविहणिअअमिअमणहचरणं । समणमणिगयणविमुणिअणहमणिअणुसरणं णमयमयपमयमजिअमहिलजणा जणमणहरणं ॥७॥ संगययं ॥ कारयकारयमारयवारयसारवई सावयतावयआवयलावयभावरई । दिज्जउ निव्वुइरज्जमवज्जविवज्जणई संतिवई विअ सेवयदेवयदेववई ॥८॥ सोवाणयं ॥ सम्मत्तवित्तिरत्तकित्तिअवरुत्तिजुत्तिसहिउत्तरुत्तमसुत्तयं अमिअकित्तिकंतं विहलिअलीलावईवरविलासहासणिवासभासि । पुण्णपण्णयं विण्णभिण्णदिण्णं देवदणुअमणुअणिअरमणरंजणं । अजिअतित्थणाहमह य संतितित्थणाहं विणयपणओ थुणामि सवणसवणिज्जरमणिज्जणामगहणुब्भ(?)यजणियसयलसिवं ॥९॥ वेढो ॥ अजिअस्स य संतिजिणस्स य सप्पणयं नर्मुसणयं । तुरिअं दुरिअं हरउ छज्जीवणिकायअहिवइणो ॥१०॥ रासालुद्धो ॥ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान-५५ सावत्थिअपत्थिवाण सत्थ --- त्थयमणिजिअसत्तु, पवित्तगुत्तसयवत्तपंतिप्पबोहणुत्तमसयवत्तमित्तदित्तयमणंतसत्तमजिअं । हत्थिणाउरणयरवइविस्ससेणणरवइपुत्तं संतितित्थयरं । पुण पणिवयामि पणयणयणिम्मिअ अमिअविणयपरिअरिओ मुणिअणगणमणिसमाणमणणं संमाणिअमसमाणणिउणेहिं णिम्मयणिव्वुइ णिव्वुइसाहणयं ॥११॥ वेढो ॥ अजिअं विजयातणयं अभिभूअरमातणयं । संतिं पुणो वि जिणं मणम्मि समरेमो ॥१२॥ रासानंदिअं ॥ अजिअ-संतीहिं जिणेहिं भणिअवयणगहणमणा अत्थि जो मणुअगणो सो ण कयावि हु हवइ विमणा । जो पुण अनिउणो तव्वयणअणुसरणं ण पकुणेइ पमणा सो पावइ अइबहुअं बहुसो दुक्खं णिरयगमणा ॥१३॥ चित्तलेहा ॥ भत्तिजुत्तअत्तसत्तकित्तपत्तवित्तसत्तवित्तसरण उत्तिमुत्तिमुत्तिजुत्तिपंत्तिसुत्तभंत्तिरत्तसरण । अत्तपत्तगुत्तसत्तसत्तिदित्तदित्तिजुत्त अजिअ सव्वसव्वभव्वनव्वनव्वभव्वपव्व संति सव्वणाह पुण पइस सिवं मे ॥१४॥ सयलसुहाणं विहायगाणं तमतिमिरक्खयपायणायगाणं । अजिअ-संति तित्थनायगाणं अइपणयाण य देवणायगाणं ॥१५॥ कुसुमलया ॥ विहणउ जिणाण वयणं मह दुरिआणि अमिअवयणं ।। मह गव्वकयव्वयणं कुण य गणविरइआवयणं ॥१६॥ भुअगपरिरिंगिअं ।। तेअमईहिं भाविअरई जय अजिअवई वेअमईहिं भाविअरई जय अजिअवई । भेअमईहिं भाविअरई जय अजिअवई गेअमईहिं भाविअरई जय अजिअवई ॥१७॥ खिज्जिअयं ॥ तित्थवइणिसावई जय जयइवई संती विव सहगई हणिअरइवई । Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मई २०११ संजइणिम्मिअरई विरइअविरई संति रसां रसावई अइवरपयई ॥१८॥ ललिअयं ॥ सुमुहप्पह सलिलरुहपहाविहसणसाहणप्पहिअं पणयाणयमणुअमणुअवइणिम्माविअअणप्पहिअं । चउतीसणिरतिसा(सया)इसयअइसयविसररमासहिअं अजिअं पुण संतिजिणं पणिवइमो सुर[र]मणीमहि ॥१९॥ किसलयमाला ॥ णयणजुअविजिअखंजणं मोहजोहकयभंजणं । माणवाण मणरंजणं विहिअसिद्धिअहिसंजणं ॥२०॥ सुमुहं ॥ अहयं अहयं अहयं अहयं सुहयं उहयं पि जिणाण णया ॥२१॥ विज्जुविलसिअं ॥ जुअलं ॥ सावया साविआय सुद्धभावभाविआ, अजिअ-संतिजिणचलणजुअलपूअणमणुदिणं पकुव्वंता पणया ण वडंति अवारभवकूवमज्झे ॥२२॥ वेढो ॥ जलरुहगेहा सोहणपेहा निहिलअगेहा मयकयवेहा । बहुविहमेहा हणिअसिणेहा बहुदुहलेहा विहिअसिणेहा । मयदवमेहा मोहणपेहा गुणिअणरेहा जणिअजणेहा । णयणरलेहा महिअअदेहा णिरुवमदेहा हयसंदेहा ॥२३॥ रयणमाला ॥ अजिअसंति परमिट्ठिणायगा हुंतु ते मह सुहस्स दायगा । वयणणिज्जिअरयणिणायगा दाणसीलतवभाववायगा ॥२४॥ खित्तयं ॥ जुअलं ॥ मंगलावलिलयाबलाहगा सव्वुदग्गउवसग्गसाहगा । संजमाण ण मणा विराहगा सग्गमुत्तिवरमग्गवाहगा ॥२५॥ खित्तयं ॥ माणवाण मयभेअविहाणा रोगसोगहिंसगअभिहाणा । मोहजोहमुहरोहपिहाणा सोहमाण वरनाणपहाणा ॥२६॥ दीवयं ॥ अमिअअमिअसमवाया विहणिअणिरयअवाया । जाण अमाणव-माणव-दाणवपणमिअपाया । Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान-५५ मुणिअणगणगयणंगणि गयणमणीसमकाया संतु अजिअसंति जिणवरराया विरइअसाया ॥२७॥ चित्तक्खरा ॥ त्रिभिः कुलकम् ॥ पाव पाव भाव आव आव वाव आव गाव नाव नाम जावए सव्वदेव सारसेव णेगहेव णेगदेव देवदेव पुहविदेव पावबहुललेवखवए। तिलोगलोगरोगसोगविप्पओगभोगजोगसोवओग जोग संगदायए अजिअसंतिणायए ॥२८॥ नाराओ ॥ निमिमो निरवाए, महिमासमवाए । मम यारयवाए अमिओवमवाए ॥२९॥ नंदिअयं ॥ युग्मम् ॥ समवीसवाया - - - - - आवणा सिअ परमेसरया णीसरिअअसाया ॥ सुविहिअवीसा वीसु असिसा, सारयससिसमभासिअआसा । अजिअमुणीसर-संतिमुणीसा, दितु सुहं मह पूरिअआसा ॥३०॥ भासुरयं ।। रोसदोसपोसमोसघोसकोसजोसजोसमोसतोसपोसया, असमसदेसदेसआसिअ सुविसेसलेसभासिअ सुवसेस सुसमदेसईसतोसया। अभंगमंगुलंगसागरंगजंगजम्मरंगआगरंगनंगवग्गुवंगसंगसारवंगचंगभंगभंगलिंगमंगअंतरंगरंगरंगरंजिआ, लसंतु वंतु वेत जंतु मंतु प(पं)तिसंति पसिअ अजिअ-संतितित्थवा अनंतसत्तिकित्तिजुत्तिराजिआ ॥३१॥ नाराओ ॥ तुम्ह नामेहिं मह अब्भहिअसंपया, तुम्ह नामेहिं मह आमनिवहा हया । तुम्ह नामेहिं चिंता महमभिहया, तुम्ह नामेहिं मह अंतहिअ आवया ॥३२॥ ललिअयं ॥ जुअलं ॥ अजिअसुसंती असिवुवसंती संचिअसंती अवहयसंती । सेवे संतीकयभयपंती गइहयदंती स(सु)रवरकंती ॥३३॥ वाणवासिआ ॥ जेहिं मोहनिवहा समाहया जे अ सिद्धिपहसत्थवाहया । संतु ते अजिअसंतिनाहया अम्ह कम्ममहणप्पसाहया ॥३४॥ अपरांतिका ॥ नाणाणं आवरणं आवरणं दंसणाणमिह बीअं । वेअणिअं अह तइअं तुरिअं तह होइ मोहणिअं ॥३५॥ गाहा ॥ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मई 2011 आउं पुण पंचमयं नामं कम्मम्मि कम्ममह छटुं / तह गुत्तं सत्तमयं विग्घं तह होइ अट्ठमयं // 36 // गाहा // पण-नव-दु-अट्ठवीसा चउरो तह तिगहिअं सयं दो अ / पंच य इअ भेएहिं कमसो अडवन्नसयमेसि // 37 // गाहा // एआणं कम्माणं पहावओ अजिअ-संतिजिणनाहा ! / भमिओ भवम्मि संपइ तुम्हं सरणं पवन्नो हं // 38 // गाहा // चतुर्भिः कलापकम् // मेहाविहिमपहाणं विबुहाणं मेरुविजयअभिहाणं / संथुअमिअ सीसेणं जुअलं सिरिअजिअ-संतीणं // 39 / / एअं अयलावण्णं मंगलमालं सयाउलावण्णं / कुणउण्णयलावण्णं विहिअमहाणंदलावण्णं // 40 // इतिश्रीअजितशान्तिस्तोत्र समाप्तम् //