Book Title: Vallabhacharyaji Mahaprabhuji ka Jivan Vrutt
Author(s): Keshavlal Shastri
Publisher: Z_Agarchand_Nahta_Abhinandan_Granth_Part_2_012043.pdf

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Page 12
________________ समक्ष अपनी पूर्वकी विज्ञप्तिका पुनरुच्चारण किया, किन्तु आपने सविवेक अनिच्छा बताई, आगे बढ़कर अब तो स्वतन्त्र निर्गुण भक्ति मार्ग-पुष्टिमार्गके प्रचारकी ही अपनी भावना व्यक्त की। भिन्न-भिन्न वनोंकी परिक्रमा करके आप फिर श्रीगोवर्धन गिरिपर आये वहाँ श्रीनाथजीका प्रथम अन्नकूटोत्सव संपन्न किया। दूसरे दिन भाई दूजको मथुरा प्रातः कालमें पहुँचकर विश्राम घाटपर परिक्रमा पूर्ण करके अपने गोर उजागर चौबेको एक सौ रुपये दक्षिणामें दिये, यों श्रीयमुनाजोका और यमद्वितीयाके दिनका आपने माहात्म्य बढ़ाया। काशी निवास : सुबोधिनी लेखन श्रीगोबर्धन पर्वतपर श्रीनाथजीके सेवा क्रमकी व्यवस्था करके, एवं द्वादशवनी परिक्रमा और श्रीयमुनाजीके माहात्म्यको बल देकर-यों नयी प्रणालियोंके साथ पुष्टिमार्गका नये स्वरूपमें आविष्कार करके अपनी चालू भारतवर्षकी परिक्रमा आगे बढ़ाने के लिए आप झारखण्ड में वापस जा पहुंचे वहाँसे आगे अनेक तीर्थ करते करते तीसरी दफे श्रीजगन्नाथ पुरी आये और वहाँ पूर्वके नगर द्वारके नजदीक एक सुन्दर स्थानपर श्रीमद्भागवत पाराणयका श्रवण कराया। आगे दूसरे महत्त्वके तीर्थ करते करते आप माताजी और सेवकोंके साथ काशीमें वापस आ पहुँचे। काशीमें पुरुषोत्तमदास सेठके यहाँ रहनेकी व्यवस्था थी ही, यहाँ आनेके बाद पत्नीका द्विरागमन संपन्न हुआ और स्वस्थता प्राप्त करके श्रीमद्भागवतकी दूसरी टीका 'सुबोधिनी' लिखनेका आरम्भ किया। आपका नियम था कि आप बोलते जाँय और उनके शिष्य माधवभट्ट काश्मीरी लिखते जाँय। प्रवासमें भी यही क्रम चालू था। दूसरे भी पुष्टिमार्गपर छोटे छोटे प्रकरण ग्रन्थमें यहाँ बनते जाते थे। काशीके निवास दरम्यान विद्वानोंके साथ वाद विवाद और चर्चाओंकी झंझट रहती थी, सुबोधिनी लेखनमें यह बाधारूप था। इस कारण आपने प्रयाग त्रिवेणी नजदीक पश्चिम तीरपर अडेलके पासका एक स्थान पसन्द किया और पारंपरिक चले आते अग्निहोत्रको भी वहाँ स्थिर किया। बीच बीच यात्राके लिए आप ब्रजमें आते थे । ऐसे ही एक समय गौरांग श्रीचैतन्य महाप्रभुका मिलाप हो गया था। वि० सं० १५६८ (ई० स०१५११)में फागुण सुदि६ के दिन आप वृन्दावन आये तब वहाँ चार मास ठहरे थे। और दो स्कन्धोंकी सुबोधिनी टीकाका लोगोंको श्रवण करवाया था; भाण्डीरवनकी कुज्जोंमें रूप, सनातन और जीव गोस्वामीके साथ भगवच्चा भी हुई थी। आप अपने कूटुम्बको वृन्दावन में ही रखकर उत्तराखण्डकी यात्रामें गये थे । सं० १५६८ (शक १४३३-ई० स० १५११) के अन्त में आप बदरी नारायण पहुँचे थे। और वहाँके गोर वासुदेवको वृत्तिपत्र लिख दिया था। वृन्दावन वापस जाकर आ गये तब बारंबार प्रकाण्ड भगवद्भक्त श्रीमधुसूदन सरस्वतीका आवागमन और भगवच्चर्चा चालू थी। एक प्रसंगपर गौरांग श्रीचैतन्य महाप्रभुजी अडैलके पाससे निकले और श्रीआचार्यजीके वहाँ मिलने के लिए आये। उस समय मध्याह नका था और श्री" का राजभोग हो गया था। सब लोग प्रसाद लेकर निवृत्त हो बैठे थे। श्री आचार्यजीने पत्नीको सामग्री तुरन्त तैयार करनेको कहा। एक ओर भगवच्चर्चा होती रही और दूसरी ओर पाक संपन्न होता चला । तयारीपर पत्नीने श्री...'को जगाने के लिये विज्ञप्ति की, जिससे सामग्नी श्री.""को समर्पित की जाय और बादमें श्रीचैतन्यजीको प्रसाद लिवाया जाय-क्या भगवद्भाव ! आचार्यजीने कहा कि 'श्री'को जगानेकी कोई जरूरत नहीं है। श्रीचैतन्यजीके हृदयमें निरन्तर बिराजते हुए भक्ताधीन भगवान् साक्षात् अरोगेंगे; अतः सब सामग्री उनके समक्ष ही घर दो', इस प्रसंगके बाद भी एक दो दफे श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीआचार्यजी महाप्रभुका मिलाप हुआ था। अड़ेल में स्थिर होने के बाद विजयनगरमें राज्यमें जमा रखी हुई ४००० मोहरोंकी रकम मंगवा ली विविध : २८७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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